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जय द्वारकाधीश
।।जातक के जीवन मे पुनर्विवाह के योग ज्योतिष शास्त्र पर कैसा फ़लप्रदान होता है ।।
।।जातक के जीवन मे पुनर्विवाह के योग ज्योतिष शास्त्र पर कैसा फ़लप्रदान होता है ।।
★★* जातक का जीवन मे पुनर्विवाह के योग है ? जातक को ज्योतिष शास्त्र से कैसा फ़लप्रदान होता है !*
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर से पुनर्विवाह के योग कैसे देखें ?
वैदिक ज्योतिष, नक्षत्र - पद्धति, कृष्णमूर्ति पद्धति, अंकशास्त्र, हस्तरेखा, सामुद्रिक तथा वास्तु परंपरा का तुलनात्मक विवेचन !
भारतीय ज्योतिष परंपरा में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं माना गया, बल्कि दांपत्य, परिवार, संतान, सामाजिक उत्तरदायित्व और जीवनसाथी के साथ कर्म - संबंध के रूप में देखा गया है।
इसी कारण किसी जातक के जीवन में पहला विवाह, वैवाहिक बाधा, विवाह - विच्छेद तथा पुनर्विवाह के विषय को देखने के लिए अनेक ज्योतिषीय पद्धतियों में अलग - अलग नियम विकसित हुए हैं।
✍🏻 1️⃣ ज्योतिषशास्त्र के अनुसार दूसरे विवाह को देखने के लिए सप्तम, नवम तथा सप्तम से छठे अर्थात द्वादश भावों पर विशेष विचार करना चाहिए ज्योतिषाचार्य पं. प्रभु राज्यगुरु ने बताया कि यदि लग्न, सप्तम स्थान और चंद्र लग्न द्विस्वभाव राशि में हों, तो जातक के दो विवाह होते हैं।
2️⃣ इसी प्रकार लग्नेश, सप्तमेश तथा शुक्र द्विस्वभाव राशि में हों, तो जातक के दो विवाह होते हैं।
3️⃣ यदि सप्तम और अष्टम में पापी ग्रह हों और मंगल द्वादश स्थान में हो, तो जातक के दो विवाह होते हैं।
4️⃣ सप्तम स्थान का कारक यदि पापी ग्रह से युत अथवा नीच नवांश अथवा शत्रु नवांश अथवा अष्टमेश के नवांश में हो, तो भी जातक के दो विवाह होते हैं।
5️⃣ यदि सप्तमेश और एकादशेश साथ हों अथवा एक दूसरे पर दृष्टि रखते हों, तो जातक के कई विवाह होते हैं
6️⃣लग्नेश एवं पंचमेश का संबंध ( चतुर्विध ) प्रेम संबंध का द्योतक होता है।
7️⃣पंचमेश तथा सप्तमेश की एकादश भाव में युति भी प्रेम संबंध को बढ़ावा देती है।
8️⃣ पंचमेश भाव में शुभकर्तरी तथा सप्तम भाव का पापी प्रभाव में होना एवं लग्नेश की पंचम भाव पर दृष्टि यह सारी ग्रह स्थिति प्रेम संबंध को बढ़ावा देती है.!!
जय श्री कृष्ण
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लेकिन आरंभ में एक अत्यंत आवश्यक बात समझना चाहिए—
किसी भी ज्योतिषीय पद्धति से पुनर्विवाह की घटना को 100 प्रतिशत निश्चित और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भविष्यवाणी कहना उचित नहीं है।
जन्मकुंडली पारंपरिक ज्योतिषीय व्याख्या का साधन है।
वेद और पुराण मुख्यतः धर्म, कर्म, आचार, यज्ञ, जीवन-मूल्यों और आध्यात्मिक विषयों पर प्रकाश डालते हैं; आधुनिक अर्थ में “दूसरा विवाह निश्चित होगा”
जैसी भविष्यवाणी के लिए उनसे कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक सूत्र प्राप्त नहीं होता।
1. पुनर्विवाह देखने का प्रथम आधार—सप्तम भाव
वैदिक जन्मकुंडली में सप्तम भाव को विवाह, पति-पत्नी, दांपत्य संबंध और साझेदारी का प्रमुख भाव माना जाता है।
इस लिए पुनर्विवाह का विचार करते समय सबसे पहले:
सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, द्वितीय भाव और नवांश कुंडली को देखा जाता है।
द्वितीय भाव परिवार और कुटुंब से संबंधित माना जाता है।
इसलिए पारंपरिक ज्योतिष में विवाह की निरंतरता और नए पारिवारिक संबंध के संदर्भ में द्वितीय भाव को भी देखा जाता है।
इसके साथ अष्टम भाव दांपत्य की स्थिरता, संकट और जीवनसाथी से जुड़े गहरे परिवर्तन के लिए तथा द्वादश भाव अलगाव, दूरी और हानि जैसे विषयों के लिए विचार में लिया जाता है।
इसलिए केवल सप्तम भाव में कोई एक ग्रह बैठा देखकर “दूसरा विवाह होगा” कहना शास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत अधूरा निष्कर्ष होगा।
2. क्या सप्तम भाव के दोष से पुनर्विवाह निश्चित होता है?
नहीं।
सप्तम भाव में पापग्रह, सप्तमेश की कमजोरी, शुक्र की पीड़ा अथवा सप्तम भाव पर अशुभ प्रभाव होने से वैवाहिक जीवन में कठिनाई की संभावना के बारे में पारंपरिक ज्योतिषीय विचार किया जा सकता है, लेकिन इससे अपने-आप पुनर्विवाह सिद्ध नहीं होता।
उदाहरण के लिए किसी कुंडली में सप्तम भाव पीड़ित हो सकता है, परंतु उसी समय:
- सप्तमेश मजबूत हो,
- शुक्र शुभ स्थिति में हो,
- नवांश में दांपत्य संकेत अच्छे हों,
- गुरु की शुभ दृष्टि हो,
- दशा अनुकूल हो,
तो जातक वैवाहिक कठिनाइयों के बावजूद विवाह को बचा सकता है।
इसलिए एक योग नहीं, योगों का समूह देखना आवश्यक है।
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3. द्वितीय और एकादश भाव का महत्व
पारंपरिक ज्योतिषीय व्याख्या में दूसरे विवाह के संदर्भ में द्वितीय भाव और उसके स्वामी को विशेष महत्व देने की परंपरा मिलती है, क्योंकि द्वितीय भाव कुटुंब और परिवार का सूचक माना जाता है।
एकादश भाव इच्छा की पूर्ति, लाभ और प्राप्ति से संबंधित माना जाता है।
इस कारण विवाह संबंधी प्रश्नों में कई आधुनिक ज्योतिषीय परंपराएँ 2-7-11 भावों को महत्वपूर्ण मानती हैं।
यदि विवाह टूटने के बाद पुनः विवाह का प्रश्न पूछा जाए, तो इन भावों के स्वामी, उनके नक्षत्र स्वामी, उपस्वामी, दशा तथा गोचर को मिलाकर निर्णय किया जाता है।
लेकिन फिर वही सावधानी आवश्यक है—
इन भावों की सक्रियता केवल विवाह ही नहीं, अन्य पारिवारिक अथवा सामाजिक घटनाओं को भी दर्शा सकती है। इसलिए संदर्भ के बिना निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
4. नवांश कुंडली का विशेष महत्व
वैदिक ज्योतिष में नवांश अर्थात D-9 को विवाह और दांपत्य जीवन के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण विभाजित कुंडली माना जाता है।
जन्मकुंडली से दिखाई देने वाले विवाह संकेतों को नवांश में दोबारा जांचना उपयोगी माना जाता है।
विशेष रूप से देखा जाता है:
1. नवांश लग्न और लग्नेश।
2. नवांश का सप्तम भाव।
3. नवांश सप्तमेश।
4. शुक्र की स्थिति।
5. गुरु की स्थिति।
6. जन्मकुंडली और नवांश में ग्रहों की शक्ति।
7. विवाह-संबंधी दशा में इन ग्रहों की सक्रियता।
यदि जन्मकुंडली में वैवाहिक समस्या का संकेत हो लेकिन नवांश मजबूत हो, तो कठिनाइयों के बाद संबंध बचने की संभावना के रूप में परंपरागत ज्योतिषी विचार कर सकते हैं।
इसके विपरीत दोनों स्तरों पर गंभीर वैवाहिक पीड़ा हो तो संबंध-विच्छेद की संभावना पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
फिर भी इसे “निश्चित तलाक” या “निश्चित पुनर्विवाह” नहीं कहना चाहिए।
5. दशा और अंतरदशा से घटना का समय
किसी योग का जन्मकुंडली में होना और उसका जीवन में घटना—दो अलग बातें हैं।
विम्शोत्तरी दशा सहित विभिन्न दशा प्रणालियों में विवाह-संबंधी घटना के समय को देखने की परंपरा है।
पुनर्विवाह के लिए परंपरागत ज्योतिषी ऐसे समय को खोजते हैं जब दशा या अंतरदशा में:
- सप्तमेश,
- सप्तम भाव से संबंधित ग्रह,
- शुक्र,
- द्वितीय भाव/भावेश,
- एकादश भाव/भावेश,
या विवाह संबंधी महत्वपूर्ण नक्षत्र-सूचक ग्रह सक्रिय हों।
यदि पहले विवाह का संबंध समाप्त हो चुका है और उसके बाद ऐसी दशा सक्रिय होती है, तो परंपरागत ज्योतिष में उस समय को पुनर्विवाह के लिए संभावित अवधि माना जा सकता है।
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6. गोचर से पुनर्विवाह का समय
गोचर को अकेले निर्णायक नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषकर गुरु और शनि के गोचर को जन्मकुंडली की दशा के साथ मिलाकर देखने की परंपरा है।
यदि गोचर किसी महत्वपूर्ण विवाह भाव, भावेश, शुक्र या संबंधित ग्रह को सक्रिय कर रहा हो और उसी समय दशा भी विवाह-संबंधी संकेत दे रही हो, तो विवाह की संभावना बढ़ने की पारंपरिक व्याख्या की जाती है।
इसका सिद्धांत सरल रूप में:
जन्मकुंडली योग देती है → दशा समय सक्रिय करती है → गोचर घटना को ट्रिगर कर सकता है।
इसलिए केवल यह कहना कि “गुरु सप्तम भाव में आया है, इसलिए दूसरा विवाह निश्चित है”—उचित नहीं है।
7. प्रश्नकुंडली से पुनर्विवाह
जब कोई व्यक्ति विवाह-विच्छेद के बाद प्रश्न करता है—
“क्या मेरा पुनर्विवाह होगा?”
तो प्रश्न पूछे जाने के वास्तविक समय और स्थान से प्रश्नकुंडली बनाई जाती है।
परंपरागत प्रश्न ज्योतिष में प्रश्न का लग्न, सप्तम भाव, उनके स्वामी, चंद्रमा तथा शुभ-अशुभ ग्रहों की स्थिति देखी जाती है।
यदि प्रश्न विशेष रूप से दूसरे विवाह का हो तो प्रश्न की प्रकृति और पूर्व विवाह की स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है।
यहाँ भी केवल एक ग्रह देखकर निर्णय नहीं किया जाना चाहिए।
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8. कृष्णमूर्ति पद्धति का दृष्टिकोण
कृष्णमूर्ति पद्धति यानी KP में विवाह संबंधी प्रश्नों में 2, 7 और 11 भावों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
परंपरागत KP विश्लेषण में:
- 2 = परिवार में जुड़ना,
- 7 = विवाह/जीवनसाथी,
- 11 = इच्छा और प्राप्ति,
के रूप में विचार किया जाता है।
पुनर्विवाह के प्रश्न में संबंधित cusp का sub-lord तथा वह किन भावों का significator है, इसका परीक्षण किया जाता है।
यदि विवाह के पक्ष में 2-7-11 की मजबूत significations मिलती हैं तो विवाह की संभावना मानी जाती है। यदि 1-6-10-11 जैसी विरोधी significations प्रमुख हों, तो विवाह में बाधा अथवा असहमति की संभावना देखी जाती है।
यह KP की अपनी तकनीकी परंपरा है; इसे ऋग्वेद या पुराणों का मूल नियम बताना सही नहीं होगा।
9. नक्षत्र-पद्धति
नक्षत्र ज्योतिष में ग्रह किस नक्षत्र में स्थित है और उस नक्षत्र का स्वामी कौन है, इसका विशेष महत्व माना जाता है।
इस पद्धति में केवल ग्रह की राशि नहीं, बल्कि उसका नक्षत्र स्वामी और संबंधित भावों से संबंध भी देखा जाता है।
इसलिए पुनर्विवाह के लिए:
सप्तमेश → किस नक्षत्र में?
नक्षत्र स्वामी → किन भावों से संबंधित?
शुक्र → किस नक्षत्र में?
दशा स्वामी → कौन से भाव सक्रिय करता है?
इन प्रश्नों का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।
10. शुक्र और गुरु का महत्व
पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु को विवाह के पारंपरिक कारक के रूप में देखने की परंपरा है, यद्यपि आधुनिक ज्योतिषीय दृष्टिकोण में दोनों लिंगों के लिए शुक्र, गुरु तथा सप्तम भाव का समग्र अध्ययन करना अधिक उचित है।
शुक्र प्रेम, दांपत्य, आकर्षण और संबंधों का प्रमुख कारक माना जाता है।
गुरु विवाह, धर्म, संरक्षण, ज्ञान और पारिवारिक विस्तार से जुड़े शुभ तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है।
लेकिन शुक्र या गुरु अकेले यह निर्णय नहीं देते कि जातक का दूसरा विवाह होगा।
11. अंकशास्त्र की भूमिका
अंकशास्त्र में जन्मांक, भाग्यांक और नामांक आदि के आधार पर विवाह संबंधी व्याख्या की जाती है।
परंतु अंकशास्त्र को जन्मकुंडली के बराबर प्रमाणित शास्त्रीय विधि मानना उचित नहीं है।
यदि कोई ज्योतिषी इसे सहायक संकेत के रूप में प्रयोग करता है तो उसे उसी रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
अंकशास्त्र से “पुनर्विवाह निश्चित” कहना विश्वसनीय प्रमाण नहीं माना जा सकता।
12. हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र
हस्तरेखा परंपरा में विवाह रेखा अथवा संबंध रेखाओं का अध्ययन किया जाता है।
सामुद्रिक परंपरा में शरीर के विभिन्न लक्षणों से व्यक्ति के स्वभाव और जीवन के संकेतों की व्याख्या की जाती है।
लेकिन हाथ की रेखाओं में परिवर्तन भी होते रहते हैं।
इसलिए किसी एक रेखा को देखकर यह कहना कि “दूसरा विवाह अवश्य होगा”, सावधानी के बिना किया गया निष्कर्ष होगा।
सबसे अच्छा पारंपरिक तरीका यह माना जा सकता है कि जन्मकुंडली, नवांश और प्रश्नकुंडली के संकेतों को प्राथमिकता देकर हस्तरेखा को केवल सहायक संकेत के रूप में देखा जाए।
13. वास्तु का पुनर्विवाह से संबंध
वास्तु परंपरा मुख्यतः भवन की दिशा, स्थान-विन्यास, प्रकाश, वायु और उपयोग से संबंधित है।
आधुनिक लोकप्रिय वास्तु साहित्य में वैवाहिक जीवन के लिए शयनकक्ष, दिशा, वस्तुओं की व्यवस्था आदि के अनेक उपाय बताए जाते हैं।
लेकिन किसी व्यक्ति का पुनर्विवाह केवल घर की दिशा बदलने से निश्चित हो जाएगा—ऐसा दावा शास्त्रीय रूप से सिद्ध नहीं है।
वास्तु उपाय को मानसिक शांति, सकारात्मक वातावरण और धार्मिक आस्था के उपाय के रूप में लेना अधिक उचित है।
14. ऋग्वेद और पुराणों के संदर्भ में सावधानी
ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक साहित्य में विवाह, गृहस्थ जीवन, दांपत्य और परिवार के संबंध में महत्वपूर्ण मंत्र और विचार मिलते हैं।
भविष्यपुराण, गर्ग संहिता, भृगु संहिता आदि के नाम से अनेक ज्योतिषीय एवं भविष्यवाणी संबंधी परंपराएँ प्रचलित हैं।
लेकिन आज उपलब्ध सभी लोकप्रिय उद्धरणों को सीधे मूल ग्रंथ का प्रमाण मान लेना उचित नहीं है।
विशेषकर इंटरनेट या सोशल मीडिया पर चलने वाले कथित “भृगु संहिता नियम” या “पुराण में लिखा है कि यह ग्रह दूसरे विवाह का कारण है” जैसे दावों को मूल संस्कृत पाठ, अध्याय और श्लोक के बिना प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए।
इसलिए शास्त्रीय लेखन में यह अंतर रखना आवश्यक है:
मूल ग्रंथ का प्रमाण अलग है और बाद की ज्योतिषीय परंपरा अलग।
15. पुनर्विवाह के पारंपरिक संकेतों का समग्र परीक्षण
किसी जातक के पुनर्विवाह का अध्ययन करते समय एक व्यवस्थित क्रम अपनाया जा सकता है:
पहला चरण: जन्मकुंडली का सप्तम भाव।
दूसरा चरण: सप्तमेश की स्थिति, शक्ति और संबंध।
तीसरा चरण: शुक्र और गुरु का परीक्षण।
चौथा चरण: द्वितीय और एकादश भाव का परीक्षण।
पाँचवाँ चरण: अष्टम और द्वादश भाव से वैवाहिक संकट या अलगाव के संकेत देखना।
छठा चरण: नवांश कुंडली से पुष्टि।
सातवाँ चरण: दशा-अंतरदशा से संभावित समय।
आठवाँ चरण: गुरु, शनि तथा अन्य महत्वपूर्ण गोचर से समय की पुष्टि।
नौवाँ चरण: यदि प्रश्नकुंडली उपलब्ध हो तो उससे स्वतंत्र पुष्टि।
दसवाँ चरण: KP अथवा नक्षत्र-पद्धति का उपयोग करके सूक्ष्म परीक्षण।
इन सभी स्तरों पर समान दिशा में संकेत मिलें तो पारंपरिक ज्योतिषी पुनर्विवाह की संभावना को अपेक्षाकृत मजबूत मान सकता है।
16. पुनर्विवाह के लिए पारंपरिक धार्मिक उपाय
उपायों को भविष्यवाणी का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। ये श्रद्धा और धार्मिक परंपरा पर आधारित हैं।
जातक अपनी श्रद्धा के अनुसार:
- भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना,
- सोमवार को शिव-पार्वती पूजन,
- महामृत्युंजय मंत्र का जाप,
- शुक्रवार को देवी अथवा लक्ष्मी-उपासना,
- गुरु के लिए गुरुवार को धार्मिक सेवा,
- जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता,
- गौसेवा अथवा अन्नदान,
- माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान,
जैसे सात्त्विक कार्य कर सकता है।
किसी भी उपाय में भय पैदा करके महंगे रत्न, तांत्रिक क्रिया या अनिवार्य भुगतान करवाना उचित नहीं है।
17. सबसे महत्वपूर्ण नियम
पुनर्विवाह का निर्णय केवल इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि:
“सप्तम भाव खराब है।”
या:
“शुक्र पर शनि की दृष्टि है।”
या:
“राहु सप्तम भाव में है।”
ऐसे एकल योगों से निश्चित भविष्यवाणी करना उचित नहीं।
सच्चा ज्योतिषीय विवेचन योग + भाव + भावेश + कारक + नवांश + दशा + गोचर + प्रश्नकुंडली—इन सबके संयुक्त परीक्षण से किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारतीय ज्योतिष परंपरा में पुनर्विवाह को देखने के लिए सप्तम भाव सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक आधार है, लेकिन अकेला पर्याप्त नहीं।
द्वितीय भाव परिवार, एकादश भाव प्राप्ति, नवांश दांपत्य की सूक्ष्म स्थिति, शुक्र और गुरु कारकत्व, दशा घटना का समय तथा गोचर संभावित सक्रियता को समझने में सहायक माने जाते हैं।
KP पद्धति में 2-7-11 भावों की significations, नक्षत्र पद्धति में नक्षत्र स्वामी तथा प्रश्न ज्योतिष में प्रश्न के समय की कुंडली का परीक्षण किया जाता है।
अंकशास्त्र, हस्तरेखा, सामुद्रिक और वास्तु को सहायक परंपराओं के रूप में लिया जा सकता है, लेकिन इनके आधार पर पुनर्विवाह की 100 प्रतिशत निश्चित घोषणा करना उचित नहीं।
सबसे बड़ा शास्त्रीय नियम यही है कि किसी एक ग्रह, एक भाव या एक योग से जीवन का अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण मानवीय नियम यह है कि विवाह-विच्छेद अथवा पुनर्विवाह का वास्तविक निर्णय केवल कुंडली पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की इच्छा, वर्तमान परिस्थितियों, पारिवारिक स्थिति, कानूनी स्थिति, मानसिक तैयारी और भावी जीवनसाथी के साथ वास्तविक समझ पर भी आधारित होना चाहिए।
इस प्रकार ज्योतिष को निश्चित भाग्यादेश के बजाय परंपरागत संकेतों और आत्मचिंतन की एक पद्धति के रूप में समझना अधिक संतुलित और जिम्मेदार दृष्टिकोण है। !!!!! शुभमस्तु !!!
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