।। श्री अथर्वेद के अनुसार नवग्रहों के वृक्ष और जड़े धारण करने से मिलने वाले फल ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री अथर्वेद के अनुसार नवग्रहों के वृक्ष और जड़े धारण करने से मिलने वाले फल ।।

नवग्रहों के वृक्ष और जड़ों को धारण करने का वैदिक ज्योतिषीय रहस्य !

श्रीअथर्वेद के अनुसार नवग्रहों के वृक्ष  मतलब पौधा और जड़े धारण करने की सम्पूर्ण विधि ।

भारतीय परंपरा में वृक्ष केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं माने गए, बल्कि उन्हें देवत्व, ग्रह - ऊर्जा, औषधीय गुण और आध्यात्मिक साधना से भी जोड़ा गया है। 

वैदिक ज्योतिष, नक्षत्र - विचार, प्रश्नकुंडली, गोचर - विचार, अंकशास्त्र, हस्तरेखा तथा सामुद्रिक परंपराओं में मनुष्य और प्रकृति के बीच एक सूक्ष्म संबंध की कल्पना की गई है। 

इसी परंपरा में कुछ वृक्षों की जड़ को विशेष ग्रहों से संबंधित मानकर विधिपूर्वक धारण करने की प्रथा भी मिलती है।

प्राचीन काल से नवग्रह की अनुकूलता के लिये रत्न पहनने का प्रचलन रहा है।

सम्पन्न लोग महंगे से महंगे रत्न धारण कर लेते है। 


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यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है कि अलग - अलग ज्योतिषीय ग्रंथों, क्षेत्रीय परंपराओं और आचार्यों में ग्रहों से संबंधित वृक्ष और जड़ों की सूची अलग हो सकती है। 

इस लिए नीचे दिया गया विवरण परंपरागत ज्योतिषीय मान्यताओं और लोकाचार के रूप में समझना चाहिए, आधुनिक विज्ञान द्वारा सिद्ध चिकित्सा या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

लेकिन इन रत्नों का संबंध ग्रह के शुभाशुभ प्रभावको बढ़ाने केकारण इनकी माँग और भी ज्यादा बढ़ गई है।

परन्तु सभी व्यक्ति इतने सक्षम नहीं होते कि वे ग्रह के आधिकारिक महंगे रत्न पहन सकें।

हमारे शास्त्रों में ऋषि मुनियों ने प्राचीन कालसे में ही ग्रह राशियों के आधिकारिक वृक्ष उनके गुण देखकर निर्धारित किये थे।

प्रारम्भ में सभी लोगों को महंगे रत्न उपलब्ध नहीं होते थे। 

तब वे पेड़ की जड़धारण करते थे। 

आज भी कुछ मूर्धन्य सज्जन वृक्ष की जड़ को रत्नों की जगह अपनाते है। 

रत्नों की तरह ही पेड़ की जड़ भी पूर्ण लाभ देती है। 

वृक्ष की जड़ पहनने के लिए सर्वप्रथम आपको अपने जन्मनाम की राशि का पता होना चाहिए।

और अपनीराशि के स्वामी ग्रह का भी ज्ञान होना चाहिए।
 





नीचे दिया हुवा सारणी में आपको ग्रह और राशि के साथ आधिकारिक वृक्ष की जड़ का विवरण दिया जा रहा है।


     राशि ----ग्रह ---- वृक्ष

     मेष ------- मंगल---खदिर

     वृष---------शुक्र ---- गूलर

     मिथुन------बुध-----अपामार्ग

     कर्क -------चंद्र -----पलाश

     सिंह--------सूर्य -----आक

     कन्या-------बुध ----अपामार्ग

     तुला--------शुक्र ----गूलर

     वृश्चिक------मंगल---खदिर

     धनु--------- गुरु ----पीपल

     मकर--------शनि---शमी

     कुम्भ--------शनि ---शमी

     मीन --------गुरु -- -पीपल



पेड़ से जड़ लेने की प्रक्रिया : -

आपको जिस ग्रह या नक्षत्र से संबंधित पेड़ की जड़ लेनी हो ।

उस ग्रह या नक्षत्र के आधिकारिक दिन से एक दिन पहले 

अर्थात : -

मेष या वृश्चिक राशि हो तो उसके स्वामी मंगल की जड़ पहनने के लिए मंगलवार से एक दिन पहले सोमवार को ।








वृष या तुला राशि हो तो उसके स्वामी शुक्र की जड़ पहनने के लिए शुक्रवार से एक दिन पहले गुरुवार को ।

यदि मिथुन या कन्या राशि हो तो उसके स्वामी बुध की जड़ पहनने के लिए बुधवार से एक दिन पहले मंगलवार को ।

यदि कर्क राशि हो तो उसके स्वामी चन्द्रमा की जड़ पहनने के लिए सोमवार से एक दिन पहले रविवार को ।

यदि सिंह राशि हो तो उसके स्वामी सूर्य की जड़ पहनने के लिए रविवार से एक दिन पहले शनिवार को ।

यदि धनु - मीन राशि हो तो  स्वामी गुरु की जड़ पहनने के लिए गुरुवार से एक दिन पहले बुधवार को ।

यदि मकर - कुम्भ राशि हो तो  उसके स्वामी शनि की जड़ पहनने के लिए शनिवार से एक दिन पहले शुक्रवार को ।
        
शुभ मुहूर्त देखकर उस वृक्ष के पास जाएँ और वृक्ष से निवेदन करें कि....!

मैं आपके आधकारिक ग्रह की शांति और शुभ फल प्राप्ति हेतु ।

आपकी जड़ धारण करना चाहता हूँ ।

जिसे कल शुभ मुहूर्त में आपसे लेने आऊंगा। 

इसके लिए मुझे अनुमति प्रदान करें। 

इसके बाद अगले दिन उस ग्रह के वार को धूपबत्ती , जल का लोटा , पुष्प , प्रसाद आदि सामग्री लेकर शुभ मुहूर्त में उस वृक्ष के पास जाएँ और हाथ जोड़कर जल चढ़ाएं। 

फिर धूपबत्ती जलाकर पुष्प चढ़ाएं।  

उसके बाद प्रसाद का भोग लगाएं। 

फिर प्रणाम करके उसकी जड़ खोदकर निकाल लें। 

और घर ले आएं।
  
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Size
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Item type name
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Country of Origin
India }








{ About this item

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🌞 सूर्य और वृक्ष की जड़ :


सूर्य को आत्मबल, पिता, प्रतिष्ठा, शासन, नेतृत्व, तेज और जीवनशक्ति का कारक माना जाता है। 

पारंपरिक ग्रह - वृक्ष संबंधों में सूर्य के लिए आक ( मदार ) अथवा कुछ परंपराओं में बेल का संबंध बताया जाता है।

यदि जन्मकुंडली में सूर्य कमजोर हो, लग्नेश के साथ शुभ संबंध हो लेकिन फल देने में बाधा आ रही हो, अथवा गोचर में सूर्य से संबंधित आत्मविश्वास और प्रतिष्ठा के विषय सामने आ रहे हों, तो परंपरागत उपायों में सूर्य की उपासना, सूर्य को अर्घ्य, आदित्य मंत्र और संबंधित वृक्ष की सेवा को महत्व दिया जाता है।

जड़ धारण करने की परंपरा में इसे रविवार, शुक्ल पक्ष और सूर्य के अनुकूल मुहूर्त में शुद्ध करके धारण करने की बात कही जाती है। 

किंतु केवल सूर्य कमजोर है इसलिए हर व्यक्ति को जड़ धारण कर लेनी चाहिए— ऐसा नियम नहीं है। 
कुंडली में सूर्य की स्थिति, भाव, राशि, नक्षत्र और दशा का विचार पहले किया जाना चाहिए।

🌙 चंद्रमा और वृक्ष :


चंद्रमा मन, माता, भावनाएँ, स्मृति, कल्पना, यात्रा, जल और मानसिक शांति का प्रतिनिधि माना जाता है। 

चंद्रमा के साथ पलाश अथवा कुछ परंपराओं में अन्य शीतल प्रकृति वाले वृक्षों का संबंध जोड़ा जाता है।

चंद्रमा पीड़ित होने की स्थिति में सोमवार को शिव - उपासना, जलाभिषेक, माता का सम्मान, सफेद वस्तुओं का दान और चंद्र मंत्र का जाप पारंपरिक उपाय माने जाते हैं।

जड़ धारण करने से पहले प्रश्नकुंडली या जन्मकुंडली में चंद्रमा का वास्तविक बल देखना आवश्यक माना जाता है। 

केवल मन अशांत होने को ग्रहदोष मानकर कोई भी जड़ पहनना उचित नहीं।

🔴 मंगल और वृक्ष की जड़ :


मंगल साहस, भूमि, भाई, पराक्रम, अग्नि, शारीरिक शक्ति और संघर्ष का कारक माना जाता है। 

मंगल के लिए खैर वृक्ष का संबंध कई पारंपरिक ज्योतिषीय मतों में मिलता है।

कुंडली में मंगल शुभ होकर कमजोर हो तो परंपरागत रूप से हनुमानजी की उपासना, मंगलवार का व्रत, रक्तदान जैसे सामाजिक सेवा कार्य तथा वृक्षारोपण को मंगल से संबंधित सकारात्मक कर्म माना जा सकता है।

मंगल की जड़ धारण करने की बात हो तो मंगलवार, मंगल के अनुकूल नक्षत्र तथा कुंडली में मंगल की स्थिति पर विचार करना चाहिए। 

विशेषकर यदि मंगल पहले से ही अत्यधिक प्रबल और उग्र हो, तो बिना ज्योतिषीय परीक्षण के मंगल संबंधी वस्तु धारण करना उचित नहीं माना जाता।


🌿 बुध और हरे वृक्ष :


बुध बुद्धि, वाणी, गणना, व्यापार, लेखन, शिक्षा, तर्क, संचार और कौशल का कारक माना जाता है। 

बुध से संबंधित परंपराओं में अपामार्ग जैसे पौधों का उल्लेख मिलता है।

बुध कमजोर होने पर बुधवार को गणेश उपासना, विद्यार्थियों की सहायता, हरी वस्तुओं का दान, मधुर वाणी और ज्ञान का सदुपयोग करने को श्रेष्ठ माना जाता है।

अंकशास्त्र में भी बुध का संबंध सामान्यतः अंक 5 से जोड़ा जाता है। 

इस लिए यदि किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, भाग्यांक और कुंडली में बुध के संकेत एक - दूसरे को पुष्ट करते हों, तो ज्योतिषी बुध से संबंधित साधना का सुझाव दे सकता है।

🟡 गुरु और पवित्र वृक्ष :


बृहस्पति ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, विवाह, धन, सदाचार और आध्यात्मिक उन्नति का कारक माना जाता है। 

गुरु के साथ पीपल अथवा कुछ परंपराओं में अन्य पवित्र वृक्षों का संबंध स्थापित किया जाता है।

गुरु की कृपा के लिए गुरुवार को गुरु, देवता और आचार्य का सम्मान, पीले पदार्थों का दान, ज्ञान का प्रसार तथा जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता अत्यंत सुंदर पारंपरिक उपाय हैं।

गुरु की जड़ धारण करने की अपेक्षा कई परंपराएँ गुरु से जुड़े वृक्ष की सेवा और उसके संरक्षण को अधिक श्रेष्ठ कर्म मानती हैं। 

वृक्ष की जड़ निकालकर प्रकृति को नुकसान पहुँचाना किसी भी आध्यात्मिक दृष्टि से आदर्श उपाय नहीं माना जाना चाहिए।

💎 शुक्र और सुगंधित वनस्पतियाँ :


शुक्र सौंदर्य, प्रेम, विवाह, कला, संगीत, भौतिक सुख, वाहन, आभूषण और आकर्षण का कारक माना जाता है। 

शुक्र से जुड़े पारंपरिक वनस्पति संबंधों में उदुम्बर आदि का उल्लेख विभिन्न परंपराओं में मिलता है।

शुक्र कमजोर होने पर शुक्रवार को लक्ष्मी - उपासना, स्त्री का सम्मान, सुगंधित वस्तुओं का दान, स्वच्छता और कला का सदुपयोग शुभ माना जाता है।

शुक्र की जड़ धारण करने से पहले यह देखना चाहिए कि शुक्र कुंडली में शुभ है या अशुभ, किस भाव का स्वामी है, किस नक्षत्र में है और वर्तमान दशा-गोचर क्या संकेत दे रहे हैं।

⚫ शनि और वृक्ष :


शनि कर्म, श्रम, अनुशासन, विलंब, न्याय, सेवा, भूमि, निर्धन वर्ग और जीवन के कठिन अनुभवों का कारक माना जाता है। 

शनि से शमी वृक्ष का संबंध भारतीय धार्मिक परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है।

शनिवार को शमी वृक्ष का पूजन, श्रमिकों और जरूरतमंद लोगों की सहायता, ईमानदार कर्म, अनुशासन तथा अहंकार का त्याग शनि से संबंधित श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपाय माने जा सकते हैं।

शनि की जड़ धारण करने के बजाय शमी का पौधा लगाना और उसकी रक्षा करना प्रकृति तथा धर्म—दोनों दृष्टियों से अधिक सकारात्मक उपाय हो सकता है।

☊ राहु और वनस्पति परंपरा :


राहु को छाया ग्रह माना जाता है। 

आधुनिक जीवन में भ्रम, अचानक परिवर्तन, विदेशी संबंध, तकनीक, असामान्य परिस्थितियाँ और मानसिक उलझन जैसे विषयों को ज्योतिषीय व्याख्या में राहु से जोड़ा जाता है।

राहु के लिए विभिन्न परंपराओं में अलग - अलग वनस्पतियों का उल्लेख मिलता है। 

इस लिए राहु की जड़ के विषय में किसी एक सूची को सार्वभौमिक नियम मानना उचित नहीं।

राहु के उपायों में गलत संगति छोड़ना, नशे और छल - कपट से दूर रहना, जरूरतमंदों की सहायता करना तथा मन को अनुशासित रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

☋ केतु और आध्यात्मिक वृक्ष :


केतु वैराग्य, आध्यात्मिकता, रहस्य, तपस्या, पूर्व संस्कार और अंतर्मुखी चेतना का कारक माना जाता है। 

केतु से संबंधित वनस्पति और जड़ की परंपराएँ भी अलग - अलग क्षेत्रों में अलग मिलती हैं।

केतु के लिए गणेशजी की उपासना, ध्यान, सेवा, अहंकार का त्याग और आध्यात्मिक अध्ययन को विशेष महत्व दिया जाता है।

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⭐ नक्षत्र-पद्धति से वृक्ष का संबंध :


नक्षत्र ज्योतिष की परंपरा में प्रत्येक नक्षत्र का अपना देवता, प्रतीक, शक्ति और वनस्पति संबंध माना जाता है। 

इस लिए केवल राशि देखकर वृक्ष चुनना अधूरा हो सकता है।

यदि किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान उपलब्ध हों तो जन्म नक्षत्र, नक्षत्र स्वामी, लग्न, चंद्र राशि और वर्तमान दशा - गोचर का अध्ययन करके संबंधित वृक्ष की सेवा या पौधारोपण को अधिक व्यक्तिगत बनाया जा सकता है।

यही विचार कृष्णमूर्ति पद्धति के दृष्टिकोण से भी रोचक बन जाता है। 

KP पद्धति में ग्रह के नक्षत्र स्वामी और उप - स्वामी को अत्यंत महत्व दिया जाता है। 

इस लिए किसी ग्रह का केवल राशि में होना पर्याप्त नहीं; वह किन भावों का संकेतक बन रहा है, इसका विचार भी आवश्यक है।


✋ हस्तरेखा और सामुद्रिक संकेत :


हस्तरेखा में सूर्य पर्वत, चंद्र पर्वत, मंगल क्षेत्र, बुध पर्वत, गुरु पर्वत, शुक्र पर्वत और शनि क्षेत्र को अलग-अलग ग्रहों से जोड़ा जाता है। 

यदि किसी व्यक्ति की हथेली में किसी ग्रह से संबंधित रेखाएँ कमजोर दिखाई दें, तो पारंपरिक हस्तरेखा - विचार में उसी ग्रह के गुणों को विकसित करने की सलाह दी जा सकती है।

लेकिन हस्तरेखा और जन्मकुंडली को एक - दूसरे का पूर्ण विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। 

दोनों प्रणालियाँ अलग परंपराओं पर आधारित हैं।

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🏠 वास्तु में वृक्ष का महत्व :


वास्तुशास्त्र में वृक्षों का स्थान भी महत्वपूर्ण माना जाता है। 

घर में वृक्ष लगाते समय दिशा, भवन की संरचना, प्रकाश, हवा, जड़ों के फैलाव और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।

धार्मिक विश्वास के कारण ऐसा वृक्ष घर में नहीं लगाना चाहिए जिसकी जड़ें भवन की नींव को नुकसान पहुँचाएँ। 

वास्तु का उद्देश्य प्रकृति और निवास के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। 

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🔢 अंकशास्त्र और ग्रह :


अंकशास्त्र में सामान्यतः सूर्य को 1, चंद्रमा को 2, गुरु को 3, राहु को 4, बुध को 5, शुक्र को 6, केतु को 7, शनि को 8 और मंगल को 9 से जोड़ा जाता है।

इस दृष्टि से जन्मांक और भाग्यांक देखकर किसी ग्रह की प्रधानता का पारंपरिक अनुमान लगाया जाता है। 

लेकिन अंकशास्त्र और कुंडली दोनों के निष्कर्ष अलग हो सकते हैं। 

इस लिए केवल अंक देखकर जड़ धारण करना उचित नहीं।







🌳 सबसे बड़ा उपाय— वृक्ष की जड़ नहीं, वृक्ष की सेवा :


इन सभी परंपराओं का सबसे सुंदर संदेश यह है कि ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए प्रकृति का सम्मान किया जाए।

यदि सूर्य कमजोर माना जाए तो सूर्य को अर्घ्य दें और वृक्ष लगाएँ।

चंद्रमा के लिए जल की रक्षा करें।

मंगल के लिए साहस के साथ सेवा करें।

बुध के लिए शिक्षा और ज्ञान बाँटें।

गुरु के लिए किसी विद्यार्थी की सहायता करें।

शुक्र के लिए सुंदरता और कला का सम्मान करें।

शनि के लिए श्रमिक और गरीब व्यक्ति की सहायता करें।

राहु के लिए भ्रम और छल से दूर रहें।

केतु के लिए ध्यान, सेवा और आध्यात्मिक चिंतन करें।

इस प्रकार ग्रह-उपाय केवल धातु, रत्न या जड़ पहनने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवनशैली का सुधार बन जाता है।
 
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जड़ धारण करने की विधि : -

जड़ को घर लाकर शुभ मुहूर्त में भगवान के सामने आसन पर बैठ कर उसे पंचामृत और गंगाजल से धोकर धूपबत्ती दिखाकर उसके आधिकारिक ग्रह के मंत्र का यथा सामर्थ्य अधिक से अधिक या कम से कम एक माला का जाप करें।  

फिर उसे गले में पहनना हो तो ताबीज़ में डाल ले और हाथ पर बांधना हो तो कपड़े में सिलकर पुरुष दाएं हाथ में और स्त्री बाएं हाथ में बांध ले। 

धारण करते समय निम्न मंत्र बोले   : -

सूर्य ----- ॐ घृणि: सूर्याय नमः 

चन्द्रमा -ॐ चं चन्द्रमसे नमः 

मंगल - ॐ भौम भौमाय नमः 

बुध ----ॐ बुं बुधाय नमः 

गुरु ----ॐ गुं गुरुवे नमः 

शुक्र ---ॐ शुं शुक्राय नमः 

शनि ---ॐ शं शनये नमः  

🙏 जड़ धारण करने के पारंपरिक नियम :


परंपरागत मान्यता के अनुसार जड़ धारण करने से पहले जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली, दशा, गोचर, ग्रहबल, नक्षत्र और भावों का विचार करना चाहिए। 

जड़ प्राकृतिक और सही पहचान वाली होनी चाहिए। उसे किसी जीवित वृक्ष को अनावश्यक रूप से नुकसान पहुँचाकर निकालना उचित नहीं।

धारण करने से पहले उसे स्वच्छ जल से शुद्ध करना, संबंधित ग्रह के मंत्र का जाप करना और ईश्वर से सद्बुद्धि की प्रार्थना करना पारंपरिक विधि मानी जाती है।

यदि किसी व्यक्ति को एलर्जी, त्वचा संबंधी समस्या या अन्य शारीरिक परेशानी हो सकती हो तो जड़ को त्वचा से बाँधने के बजाय केवल धार्मिक प्रतीक के रूप में पूजा करना बेहतर है।

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🌸 संदेश :


वैदिक परंपरा में नवग्रह केवल आकाश में दिखाई देने वाले ग्रहों के रूप में नहीं, बल्कि मानव जीवन के विभिन्न गुणों के प्रतीक के रूप में भी देखे गए हैं। 

वृक्ष पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश—

पंचमहाभूतों के साथ मनुष्य को जोड़ते हैं। 

इस लिए ग्रह और वृक्ष का संबंध एक गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में समझा जा सकता है।

भृगु संहिता, गर्ग परंपरा, पुराणों, ज्योतिषीय ग्रंथों, नक्षत्र - विचार, हस्तरेखा और वास्तु परंपराओं में प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव अलग - अलग रूपों में दिखाई देता है; 

लेकिन किसी विशेष जड़ को पहनने से निश्चित धन, विवाह, संतान, स्वास्थ्य या सफलता मिलेगी—

ऐसा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है।

अतः सर्वोत्तम उपाय है—

कुंडली का विचार करें, योग्य परंपरागत विद्वान से सलाह लें, वृक्षों की रक्षा करें, पौधे लगाएँ, सत्कर्म करें और अपने कर्म को ग्रह-उपाय से भी अधिक महत्वपूर्ण समझें।

“वृक्ष की जड़ धारण करने से पहले वृक्ष का सम्मान करना सीखिए; क्योंकि प्रकृति की सेवा ही ग्रह - शांति की सबसे सुंदर साधना है।” 🌳🙏🏻🌸

!!!!! शुभमस्तु !!!
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ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) :

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