सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। ज्योतिष ने श्राद्ध का महत्व : - 13।।
ज्योतिष ने श्राद्ध का महत्व : - 13
पितृ तर्पण विधि के स्थान या स्थल का भी बहुत बड़ा महत्व होता है ?
त्रिवेणी संगम ( तीन नदी या समुद्र का मिलान / संगम ) दो संगम ( दो नदी या समुद्र के संगम ) के पास पितृ कार्य करने का महत्व क्या होता है ;
पितृ - तर्पण विधि में स्थान एवं स्थल का महत्त्व — त्रिवेणी संगम, द्विवेणी संगम तथा नदी - समुद्र के संगम पर पितृकर्म का शास्त्रोक्त विवेचन ;
सनातन धर्म में श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान तथा पितृयज्ञ केवल परंपरागत धार्मिक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि इन्हें पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, स्मरण और धर्मपालन के महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है।
पितृकर्म में जिस प्रकार तिथि, पक्ष, अमावस्या, संकल्प, श्रद्धा, शुद्धता तथा विधि का महत्त्व बताया गया है, उसी प्रकार पितृ - तर्पण के लिए चुने गए स्थान या तीर्थ का भी विशेष धार्मिक महत्त्व है।
इसी संदर्भ में प्रश्न उठता है कि त्रिवेणी संगम अर्थात तीन नदियों के मिलन - स्थल पर पितृकर्म करने का क्या महत्त्व है?
दो नदियों के संगम पर तर्पण करने से क्या धार्मिक फल बताया गया है ?
नदी और समुद्र के संगम पर पितरों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा क्यों प्रचलित हुई ?
क्या सभी संगमों का महत्त्व समान है, अथवा किसी विशेष तीर्थ की अपनी अलग धार्मिक प्रतिष्ठा है?
इन प्रश्नों का विवेचन करते समय वेद, स्मृति, पुराण तथा धर्मशास्त्रीय परंपरा के प्रमाणों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
साथ ही, जहाँ किसी ग्रंथ में किसी विशेष संगम की महिमा स्पष्ट रूप से कही गई हो, वहीं उसका उल्लेख करना चाहिए।
जिस बात का निश्चित शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न हो, उसे किसी पुराण का कथन बताकर प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
इस लेख में इसी दृष्टि से पितृकर्म के स्थान - माहात्म्य का विवेचन किया जा रहा है।
श्राद्ध में स्थान का महत्त्व शास्त्रों में क्यों बताया गया है ?
श्राद्ध के विषय में एक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय आधार मत्स्य महापुराण, अध्याय 22 है।
इस अध्याय में ऋषिगण सूतजी से प्रश्न करते हैं कि श्राद्ध किस समय करना चाहिए तथा किन तीर्थों में किया गया श्राद्ध विशेष फल प्रदान करता है।
सूतजी के उत्तर में पितृकर्म के लिए अनेक पवित्र तीर्थों का वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि पुराण - परंपरा में श्राद्ध के साथ तीर्थस्थान का विचार भी जुड़ा हुआ है।
तीर्थ का अर्थ केवल नदी में स्नान करना नहीं है।
धार्मिक दृष्टि से तीर्थ वह पवित्र स्थल है जहाँ स्नान, देवपूजन, जप, दान, तप, श्राद्ध तथा तर्पण जैसे कर्म करने की परंपरा हो।
पितृकर्म में स्थान के महत्त्व को तीन दृष्टियों से समझा जा सकता है।
धार्मिक दृष्टि से:
तीर्थ को देवताओं, ऋषियों और पितरों के स्मरण तथा उपासना का पवित्र स्थल माना गया है।
कर्मकाण्ड की दृष्टि से:
तीर्थश्राद्ध में स्थान के अनुसार संकल्प, स्नान, तर्पण, पिण्डदान तथा अन्य अनुष्ठान किए जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से: तीर्थयात्रा मनुष्य को संयम, त्याग, सेवा, श्रद्धा तथा पूर्वजों के प्रति कर्तव्य का स्मरण कराती है।
यहाँ एक बात विशेष रूप से समझनी चाहिए।
किसी तीर्थ की महिमा का अर्थ यह नहीं कि वहाँ पहुँचते ही प्रत्येक कर्म अपने आप पूर्ण हो जाता है।
श्राद्ध की विधि, संकल्प, श्रद्धा, पात्रता और परंपरा का पालन भी आवश्यक माना गया है।
त्रिवेणी संगम क्या है और इसका पितृकर्म में क्या महत्त्व है ?
त्रिवेणी संगम का सामान्य अर्थ तीन नदियों का संगम है।
प्रयागराज का त्रिवेणी संगम सनातन धर्म की सबसे प्रसिद्ध तीर्थपरंपराओं में गिना जाता है।
वहाँ गंगा और यमुना का दृश्य संगम दिखाई देता है, जबकि सरस्वती का संगम धार्मिक परंपरा में अदृश्य रूप से माना जाता है।
तीन नदियों के मिलन को धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व देने के पीछे तीर्थ - माहात्म्य की परंपरा है।
प्रयाग को पितृकर्म के लिए महत्त्वपूर्ण तीर्थ मानने का उल्लेख मत्स्य महापुराण के तीर्थ - वर्णन में भी मिलता है।
त्रिवेणी संगम पर पितृ - तर्पण क्यों किया जाता है ?
पितृ - तर्पण में जल अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है।
यह कर्म पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।
जब यही कर्म किसी प्रसिद्ध तीर्थ में किया जाता है, तब तीर्थ की धार्मिक प्रतिष्ठा भी उस अनुष्ठान से जुड़ती है।
त्रिवेणी संगम पर पितृकर्म के महत्त्व को निम्न प्रकार समझा जा सकता है।
पहला —
तीर्थ - स्नान और शुद्धि की भावना।
तीर्थ पर स्नान को धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी तथा शारीरिक - मानसिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
स्नान के बाद संकल्प लेकर पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है।
दूसरा —
पितृ - स्मरण और कृतज्ञता।
संगम पर तर्पण करने वाला व्यक्ति अपने पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातृवंश के पूर्वजों को स्मरण कर सकता है।
संबंधित कर्म की वास्तविक विधि अपने कुल की परंपरा तथा पुरोहित के निर्देशानुसार निर्धारित करनी चाहिए।
तीसरा —
दान और सत्कर्म।
तीर्थयात्रा के साथ अन्नदान, वस्त्रदान तथा यथाशक्ति अन्य सत्कर्म करने की परंपरा है।
दान में अहंकार, दिखावा या आर्थिक दबाव नहीं, बल्कि श्रद्धा और सामर्थ्य का विचार उचित है।
चौथा —
तीर्थ - माहात्म्य।
पुराणों में प्रयाग जैसे तीर्थों की प्रशंसा पितृकर्म के संदर्भ में भी की गई है।
इस लिए अनेक परिवारों में विशेष अवसर पर वहाँ जाकर तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है।
हालाँकि, यह दावा करना कि त्रिवेणी संगम पर किया गया प्रत्येक तर्पण निश्चित रूप से पितरों को मोक्ष दिला देता है, शास्त्रीय कथनों की सावधानीपूर्ण व्याख्या नहीं होगी।
पुराणों में वर्णित पुण्यफल धार्मिक विश्वास और तीर्थ - माहात्म्य की परंपरा के अंतर्गत समझे जाने चाहिए।
द्विवेणी संगम — दो नदियों के मिलन पर पितृकर्म का महत्त्व ;
द्विवेणी संगम का अर्थ दो नदियों का मिलन है।
जहाँ दो पवित्र नदियाँ मिलती हैं, वहाँ के जल, भूगोल और धार्मिक परंपरा के आधार पर उस स्थान को तीर्थ की प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है।
उदाहरण के लिए, देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा का संगम प्रसिद्ध है, जहाँ से गंगा नाम की धारा आगे प्रवाहित होती है।
इस प्रकार के संगमों का महत्त्व उनके स्थानीय तीर्थ - माहात्म्य, देवस्थानों और धार्मिक परंपराओं से भी जुड़ा होता है।
क्या दो नदियों के संगम पर तर्पण करना उचित है ?
हाँ, यदि वह स्थल धार्मिक परंपरा में मान्य तीर्थ है और वहाँ संबंधित कर्म करने की सुविधा तथा अनुमति है, तो वहाँ पितृ - तर्पण किया जा सकता है।
लेकिन प्रत्येक द्विवेणी संगम के लिए समान फल या समान धार्मिक विधान घोषित करना उचित नहीं है।
पितृकर्म में दो नदियों के संगम का महत्त्व समझते समय तीन बातें ध्यान में रखनी चाहिए।
स्थल की धार्मिक मान्यता: क्या वह संगम किसी पुराण, स्थानीय तीर्थ - माहात्म्य या प्रचलित धर्मपरंपरा में पितृकर्म के लिए प्रसिद्ध है?
विधि का पालन:
क्या वहाँ तर्पण, श्राद्ध या पिण्डदान के लिए आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध है?
संकल्प और श्रद्धा: क्या कर्म निर्धारित विधि के अनुसार, पितरों को उद्देश्य करके किया जा रहा है?
दो नदियों का मिलन धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जा सकता है, लेकिन केवल नदी की संख्या के आधार पर उसके फल को तीन नदियों के संगम से कम या अधिक घोषित नहीं करना चाहिए।
शास्त्रों में विशिष्ट तीर्थों की अपनी अलग महिमा मिलती है।
इस लिए त्रिवेणी और द्विवेणी की तुलना केवल संख्या के आधार पर करने के बजाय संबंधित तीर्थ के प्रमाणित माहात्म्य को देखना चाहिए।
| Bowl Material | Brass |
| Number of Pieces | 1 |
| Brand | Two Moustaches |
| Colour | Antique Yellow |
| Style | Modern |
नदी और समुद्र के संगम पर पितृकर्म का महत्त्व ;
नदी और समुद्र के मिलन - स्थल को भी अनेक धार्मिक परंपराओं में विशेष तीर्थ माना गया है।
यहाँ नदी का प्रवाह समुद्र से मिलता है।
इस प्रकार के स्थानों को संगम - तीर्थ कहा जाता है, और कुछ प्रसिद्ध संगमों पर स्नान, दान तथा पितृकर्म करने की परंपरा प्राचीन है।
इस विषय में पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 170 — संगमतीर्थ का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
इस अध्याय में साबरमती गंगा और समुद्र के संगम का वर्णन करते हुए स्नान, दान और अपने संबंधियों के कल्याण के लिए श्राद्ध करने की बात कही गई है।
इस प्रकार नदी - समुद्र संगम पर श्राद्ध का महत्त्व केवल लोकपरंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि संगम - तीर्थ के पुराणीय वर्णन में भी इसका आधार मिलता है।
गंगासागर का महत्त्व ;
गंगा और समुद्र के संगम से संबंधित गंगासागर तीर्थ का उल्लेख मत्स्य महापुराण के श्राद्ध - तीर्थ वर्णन में मिलता है।
वहाँ गंगासागर को पितरों के प्रिय तीर्थों में गिना गया है।
गंगासागर की धार्मिक प्रतिष्ठा के कारण वहाँ स्नान, दान और पितृस्मरण की परंपरा प्रचलित है।
तीर्थयात्री अपने पूर्वजों के निमित्त जल अर्पित करते हैं तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान - पुण्य करते हैं।
इस का भाव यह है कि नदी-समुद्र संगम को धार्मिक दृष्टि से पवित्र मानकर वहाँ किया गया श्राद्ध एक विशेष तीर्थकर्म के रूप में देखा जाता है।
लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर नदी का समुद्र से मिलने वाला स्थान अपने आप समान धार्मिक महत्त्व प्राप्त नहीं कर लेता।
किसी स्थान की तीर्थ - प्रतिष्ठा उसके शास्त्रीय उल्लेख और मान्य धार्मिक परंपरा से निर्धारित होती है।
मत्स्य महापुराण में पितृतीर्थों का विशेष उल्लेख ;
श्राद्ध के स्थान के विषय में मत्स्य महापुराण का अध्याय 22 इस लेख के लिए सबसे उपयोगी प्रमाणों में से एक है।
इस अध्याय में सूतजी अनेक पितृप्रिय तीर्थों का वर्णन करते हैं।
उनमें गया, प्रयाग, वाराणसी, गंगाद्वार, गंगासागर, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, द्वारका तथा दक्षिण समुद्र जैसे तीर्थों का उल्लेख मिलता है।
विभिन्न तीर्थों के संबंध में अलग - अलग धार्मिक फल भी बताए गए हैं।
इससे दो महत्त्वपूर्ण बातें समझ में आती हैं।
पहली बात:
पितृकर्म के लिए केवल एक ही तीर्थ को अनिवार्य नहीं बताया गया है।
पुराणीय परंपरा अनेक पितृतीर्थों को महत्त्व देती है।
दूसरी बात:
तीर्थ - माहात्म्य में प्रत्येक स्थान की अपनी प्रतिष्ठा है।
किसी नदी, संगम या समुद्रतट का महत्त्व उसके शास्त्रीय वर्णन के अनुसार समझना चाहिए।
उदाहरण के लिए, मत्स्य महापुराण में नर्मदा और कावेरी के साथ कुछ विशिष्ट संगमों का भी उल्लेख है।
इस का अर्थ यह नहीं कि इन दोनों नदियों के प्रत्येक मिलन - बिंदु के लिए एक ही फल का दावा किया जा सकता है।
जिस विशिष्ट तीर्थ का उल्लेख है, उसी के संदर्भ में शास्त्रीय कथन को समझना चाहिए।
इसी प्रकार द्वारका और दक्षिण समुद्र का उल्लेख भी यह दिखाता है कि पितृकर्म की तीर्थपरंपरा केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है।
भारत के विभिन्न भागों में अलग - अलग पवित्र नदियों, समुद्रतटों और तीर्थक्षेत्रों से श्राद्ध की परंपराएँ जुड़ी हुई हैं।
क्या त्रिवेणी संगम पर किया गया श्राद्ध द्विवेणी संगम से अधिक फलदायी होता है ?
यह प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सामान्य धारणा में तीन नदियों का संगम दो नदियों के संगम से अधिक पुण्यदायक मान लिया जाता है।
लेकिन शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर इसका उत्तर सावधानीपूर्वक देना चाहिए।
केवल नदियों की संख्या के आधार पर श्राद्ध का फल निर्धारित करने का कोई सार्वभौमिक नियम यहाँ स्थापित नहीं किया जा सकता।
किसी विशेष तीर्थ के लिए पुराण में जो महिमा बताई गई है, वह उस तीर्थ के माहात्म्य से संबंधित है।
इस लिए तीन नदियों का संगम होने मात्र से हर त्रिवेणी को हर द्विवेणी से श्रेष्ठ कहना प्रमाणित निष्कर्ष नहीं होगा।
तीर्थ की महत्ता का निर्धारण करते समय इन बातों को देखना चाहिए:
संबंधित स्थान का शास्त्रीय तीर्थ-माहात्म्य।
उस तीर्थ में पितृश्राद्ध और तर्पण की मान्य परंपरा।
कुलाचार तथा संबंधित कर्मकाण्ड की विधि।
श्राद्धकर्ता की श्रद्धा, संकल्प और यथाशक्ति दान।
इस दृष्टि से प्रयागराज का त्रिवेणी संगम अपनी विशिष्ट धार्मिक प्रतिष्ठा रखता है।
वहीं किसी दूसरे संगम का अपना स्वतंत्र पुराणीय महत्त्व हो सकता है।
अतः उचित निष्कर्ष यह है कि संगम का महत्त्व केवल दो या तीन नदियों के मिलने से नहीं, बल्कि उस तीर्थ की शास्त्रसम्मत प्रतिष्ठा से भी संबंधित है।
Visit the ASTRODIDI Store https://link.amazon/B0466iLGx
- { 5 Mukhi Rudraksha Mala With Lab Certificate And Gomukhi Jap Bag
- Natural And Real 108+1 Beads Panch Mukhi Rudraksh Mala.
- Rudraksha Rosary Mala for Japa and Unisex Wearing.
- Gomukhi Bag With Mala for Jaap.
- Beads Size Approx 7-8 mm Anybody Can Wear this Mala.
पितृ - तर्पण की सामान्य विधि और संगम पर आवश्यक सावधानियाँ ;
संगम पर तर्पण करते समय केवल पवित्र जल में खड़े होकर जल अर्पित करना ही संपूर्ण श्राद्धविधि नहीं है।
तर्पण और पूर्ण श्राद्ध अलग - अलग अनुष्ठान हो सकते हैं।
उनकी विधि कुलपरंपरा, संप्रदाय तथा अवसर के अनुसार भिन्न हो सकती है।
सामान्य रूप से तीर्थ पर पितृकर्म करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाता है।
1. स्नान और शुद्धता:
स्थानीय नियमों के अनुसार सुरक्षित स्थान पर स्नान करके कर्म के लिए तैयार होना चाहिए।
2. संकल्प:
जिस उद्देश्य से तर्पण या श्राद्ध किया जा रहा है, उसके अनुसार संकल्प किया जाता है। इसमें पितरों के प्रति श्रद्धा तथा कर्म का उद्देश्य स्पष्ट होता है।
3. पितृ - तर्पण: निर्धारित विधि ;
पितृ - तर्पण: निर्धारित विधि के अनुसार पितरों को जल अर्पित किया जाता है।
तिल, कुश आदि का उपयोग संबंधित परंपरा और अनुष्ठान के विधान के अनुसार किया जा सकता है।
4. पिण्डदान और श्राद्ध:
पिण्डदान और श्राद्ध यदि अवसर पूर्ण श्राद्ध या पिण्डदान का है, तो उसकी विधि योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में पूरी करनी चाहिए। प्रत्येक तर्पण में पिण्डदान आवश्यक हो, ऐसा नहीं है।
5. दान और सेवा:
दान और सेवा यथाशक्ति अन्नदान, वस्त्रदान या अन्य उचित दान किया जा सकता है।
दान में सामर्थ्य का ध्यान रखना चाहिए; कर्ज लेकर या किसी दबाव में दान करना आवश्यक नहीं है।
6. जल और पर्यावरण की सुरक्षा:
जल और पर्यावरण की सुरक्षा नदी या समुद्र में प्लास्टिक, कपड़े, पूजा - सामग्री अथवा ऐसी वस्तुएँ न डालें जिनसे जल प्रदूषित होता हो।
स्थानीय तीर्थ-नियमों का पालन करें और बहाव वाले स्थानों में सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें।
इन सामान्य बातों के साथ यह भी समझना आवश्यक है कि तर्पण की प्रत्येक परंपरा के मंत्र, जल अर्पण की दिशा, तिल - कुश का प्रयोग तथा अन्य नियम एक जैसे नहीं होते।
इस लिए स्थानीय पुरोहित या अपने कुलाचार के जानकार आचार्य से विधि की पुष्टि करना उचित है।
ज्योतिष की दृष्टि से पितृकर्म के स्थान का महत्त्व ;
ज्योतिष में पितृकर्म पर विचार करते समय तिथि, पक्ष, अमावस्या, सूर्य की स्थिति तथा जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों और ग्रहों का अध्ययन किया जाता है।
परंतु यहाँ एक भेद समझना आवश्यक है।
श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार धर्मशास्त्रीय कर्मविधान है, जबकि जन्मकुण्डली के आधार पर पितृदोष आदि का विश्लेषण ज्योतिषीय परंपरा का विषय है।
किसी व्यक्ति की कुण्डली में किसी ग्रह की स्थिति देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि उसे अनिवार्य रूप से किसी खास संगम पर ही पितृकर्म करना चाहिए, अपने आप में सार्वभौमिक शास्त्रीय नियम नहीं है।
ऐसा निर्णय यदि कोई ज्योतिषाचार्य देता है, तो उसके पीछे संबंधित शास्त्रीय या परंपरागत आधार स्पष्ट होना चाहिए।
इसी प्रकार हर पारिवारिक कठिनाई को पितृदोष का परिणाम मानना या यह कहना कि केवल किसी विशेष संगम पर तर्पण करने से सभी कठिनाइयाँ दूर हो जाएँगी, उचित नहीं है।
धार्मिक दृष्टि से पितृकर्म का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति कर्तव्य, श्रद्धा और कृतज्ञता का निर्वाह करना है।
ज्योतिषीय विचार इस धार्मिक कर्म के समय या व्यक्तिगत परंपरा को समझने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन उन्हें बिना प्रमाण के भय उत्पन्न करने का साधन नहीं बनाना चाहिए।
+++
+++
क्या घर पर किया गया तर्पण कम महत्त्व का है ?
नहीं।
तीर्थश्राद्ध का विशेष महत्त्व स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि घर पर विधिपूर्वक किया गया श्राद्ध या तर्पण व्यर्थ है।
सभी व्यक्ति तीर्थयात्रा करने में सक्षम नहीं होते।
वृद्धावस्था, आर्थिक कठिनाई, स्वास्थ्य, दूरी या अन्य कारणों से हर किसी के लिए संगम तक पहुँचना संभव नहीं होता।
ऐसी परिस्थिति में अपनी परंपरा के अनुसार घर पर श्राद्ध, तर्पण, पितृस्मरण तथा यथाशक्ति दान करना भी धार्मिक कर्तव्य के निर्वाह का मार्ग है।
मत्स्य महापुराण के अध्याय 22 में अनेक तीर्थों का उल्लेख होने से यह भी स्पष्ट होता है कि पितृकर्म की परंपरा विविध तीर्थों में प्रचलित रही है।
इस से किसी एक स्थान को सभी के लिए अनिवार्य मान लेना उचित नहीं होगा।
तीर्थ पर जाना एक विशेष धार्मिक अवसर हो सकता है, लेकिन तीर्थयात्रा न कर पाने वाले व्यक्ति को हीन भावना में डालना या उसके श्रद्धापूर्वक किए गए कर्म को निरर्थक बताना उचित नहीं है।
शास्त्रोक्त विवेचन का निष्कर्ष ;
पितृ - तर्पण में स्थान का महत्त्व सनातन धर्म की तीर्थपरंपरा से जुड़ा हुआ है।
त्रिवेणी संगम, द्विवेणी संगम तथा नदी - समुद्र के संगम का धार्मिक महत्त्व उनके शास्त्रीय वर्णन, स्थानीय तीर्थ - माहात्म्य और पितृकर्म की परंपरा के आधार पर समझना चाहिए।
इस विषय में तीन प्रमाण विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं:
मत्स्य महापुराण, अध्याय 22: श्राद्ध के योग्य समय और पितृप्रिय तीर्थों का विस्तृत वर्णन।
पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 170: साबरमती और समुद्र के संगम पर स्नान, दान तथा संबंधियों के निमित्त श्राद्ध का उल्लेख।
+++
+++
धर्मशास्त्रीय तीर्थश्राद्ध परंपरा:
धर्मशास्त्रीय तीर्थश्राद्ध परंपरा तीर्थयात्रा के अवसर पर निर्धारित विधि से श्राद्ध करने की मान्यता।
इन प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि तीर्थ पर किया गया पितृकर्म सनातन धर्म में विशेष धार्मिक प्रतिष्ठा रखता है।
किंतु किसी भी संगम की महिमा बताते समय उसके वास्तविक शास्त्रीय आधार का उल्लेख करना चाहिए, न कि बिना प्रमाण के सभी संगमों के फल की तुलना करनी चाहिए।
अंततः पितृकर्म का सार केवल किसी प्रसिद्ध तीर्थ तक पहुँच जाना नहीं है।
श्रद्धा, शुद्ध आचरण, विधिपूर्वक कर्म, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सामर्थ्य के अनुसार दान—
ये सभी उसके महत्त्वपूर्ण अंग हैं।
जहाँ शास्त्र किसी तीर्थ की महिमा बताते हैं, वहाँ उस महिमा का सम्मान करना चाहिए; और जहाँ कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है, वहाँ अपनी ओर से कोई नया शास्त्रीय दावा नहीं जोड़ना चाहिए।
यही पितृकर्म के विषय में शुद्ध, सच्चोट और प्रमाण-आधारित विवेचन का उचित मार्ग है।
॥ ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः ॥ ॥ सर्वे पितरः प्रीयन्ताम् ॥ जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण......!!!
!!!!! शुभमस्तु !!!
+++
+++
+++
+++

















