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जय द्वारकाधीश
वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है इस के देवता कौन है जन्म कुंडली के अनुसार क्या फल मिलता है:
वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र वैदिक ज्योतिष में *27 नक्षत्रों में से 25वां नक्षत्र* है।
विस्तार: यह नक्षत्र कुंभ राशि के 20° 00' से लेकर मीन राशि के 03° 20' तक फैला हुआ है।
इसके पहले तीन चरण कुंभ राशि में और अंतिम चरण मीन राशि में आता है।
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अर्थ: 'पूर्वा' का अर्थ है पहले और 'भाद्रपद' का अर्थ है शुभ पद या भाग्यशाली पैर।
प्रतीक: इसके प्रतीकों में दो मुख वाला व्यक्ति, तलवार, या शव का अग्रभाग शामिल है, जो परिवर्तन, द्वैत और आध्यात्मिक अग्नि को दर्शाता है।
शासक ग्रह: इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह बृहस्पति (गुरु) है।
इसके देवता कौन हैं ?
पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अजैकपाद हैं।
अजैकपाद को भगवान शिव के रुद्र रूपों में से एक माना जाता है, जो एक पैर वाले अजन्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इन्हें आध्यात्मिक अग्नि, तीव्रता और तूफान से भी जोड़ा जाता है।
यह देवता जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और भ्रम के विनाश की शक्ति प्रदान करते हैं।
जन्म कुंडली के अनुसार क्या फल मिलता है ?
पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों में सामान्यतः निम्नलिखित विशेषताएं और फल देखे जाते हैं:
सकारात्मक फल और स्वभाव :
ईमानदार और सच्चे: ये जातक अपने कार्यों में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी को बहुत महत्व देते हैं।
दार्शनिक और ज्ञानी: गुरु के प्रभाव के कारण इनमें गहन समझ, बुद्धिमत्ता और दार्शनिक दृष्टिकोण होता है।
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ये ज्योतिष, खगोल शास्त्र और विज्ञान में रुचि रख सकते हैं।
उदार और मददगार: ये स्वभाव से दयालु, उदार और शांतिप्रिय होते हैं, और दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।
प्रभावशाली वक्ता: इनमें उत्कृष्ट संचार कौशल और नेतृत्व की क्षमता होती है, जिससे वे दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं।
आध्यात्मिक विकास: इनमें आध्यात्मिक गहराई होती है और ये भौतिकता से परे सत्य की खोज में लगे रहते हैं।
साहसी: ये अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हैं और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल इच्छा रखते हैं।
चुनौतियाँ और अन्य फल :
अत्यधिक तीव्रता: इस नक्षत्र में *तीव्र और उग्र* ऊर्जा होती है, जिसके कारण कभी - कभी जातक भावुक या क्रोधित हो सकते हैं।
द्वैत का प्रदर्शन: इन में दो विपरीत व्यक्तित्वों का समन्वय दिख सकता है— एक ओर नम्र, सभ्य, तो दूसरी ओर हिंसक या विनाशकारी।
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पारिवारिक जीवन: कुछ मामलों में, इन जातकों को माता के स्नेह में कमी या उनसे वैचारिक मतभेद का सामना करना पड़ सकता है।
स्वतंत्रता: ये सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहना पसंद करते हैं।
करियर: ये शिक्षण, लेखन, अनुसंधान, समाज सुधारक या व्यापार जैसे क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं।
क्या आप पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र के किसी विशेष चरण ( पाद ) या उससे जुड़े किसी और पहलू के बारे में जानना चाहेंगे ?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र का खगोल शास्त्र अनुसार सब से बड़ा गृह और नक्षत्र कौनसा है ?
वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र के अनुसार:
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सबसे बड़ा ग्रह :
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ( गुरु ) को सबसे बड़ा ग्रह माना जाता है।
खगोलीय आधार: सौर मंडल में बृहस्पति वास्तव में सबसे बड़ा ग्रह है।
ज्योतिषीय महत्व: बृहस्पति ( गुरु ) को विशालता , विकास , ज्ञान , धर्म , और विस्तार का कारक माना जाता है।
यह नवग्रहों में अत्यधिक शुभ ग्रह है और इन्हें देवगुरु भी कहा जाता है।
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सब से बड़ा नक्षत्र :
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सभी 27 नक्षत्रों को आकाश में समान रूप से विभाजित किया गया है, और प्रत्येक नक्षत्र का चाप विस्तार $13^\circ 20'$ होता है।
इस हिसाब से कोई भी नक्षत्र दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं होता है।
हालाँ कि, एक अतिरिक्त नक्षत्र है जिसे अभिजीत नक्षत्र कहा जाता है, जिसे कभी - कभी गणना में शामिल किया जाता है।
नक्षत्रों का विस्तार: सभी 27 नक्षत्रों में से प्रत्येक का विस्तार $13^\circ 20'$ है, जो कुल $360^\circ$ के राशिचक्र को पूरा करता है।
अभिजीत नक्षत्र: यह उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के अंतिम भाग और श्रवण नक्षत्र के शुरुआती भाग के बीच आता है।
यह एक छोटा नक्षत्र है, जो केवल लगभग $4^\circ 14'$ का होता है, और यह मुख्य 27 नक्षत्रों के समान नहीं है।
इस लिए, यदि 'सबसे बड़ा' से तात्पर्य 'सबसे अधिक चाप विस्तार' से है, तो सभी 27 नक्षत्रों का विस्तार समान है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र और वैदिक खगोल शास्त्र के अनुसार सब से बड़ा तारा कौनसा है ?
यह प्रश्न आधुनिक खगोल विज्ञान और वैदिक ज्योतिष/खगोल शास्त्र के बीच अंतर के कारण जटिल है।
आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार सबसे बड़ा तारा आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड में ज्ञात सबसे बड़ा तारा है:
स्टीफेंसन 2 - 18 : यह एक लाल महा दानव तारा है।
कुछ समय पहले तक यूवाई स्कूटी को सबसे बड़ा माना जाता था, लेकिन नए शोध के अनुसार स्टीफेंसन 2 - 18 ज्ञात तारों में सबसे बड़ा है।
इसका आकार इतना विशाल है कि यदि इसे सूर्य के स्थान पर रखा जाए, तो इस का घेरा शनि ग्रह की कक्षा को भी पार कर जाएगा।
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वैदिक ज्योतिष/खगोल शास्त्र का दृष्टिकोण :
वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र में, "सबसे बड़ा तारा" की अवधारणा मुख्य रूप से आकार के बजाय महत्व , चमक , या दृष्टिगत उपस्थिति पर आधारित होती थी, क्योंकि उस समय दूरबीनें उपलब्ध नहीं थीं।
सूर्य : पृथ्वी के सबसे निकटतम तारा होने के कारण, सूर्य वैदिक ज्योतिष में सबसे महत्वपूर्ण खगोलीय पिंड है, जिसे नवग्रहों का राजा माना जाता है।
इसे अक्सर आत्मा, शक्ति और जीवन का कारक माना जाता है।
लुब्धक या मृगव्याध : इसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में सिरियस ए कहा जाता है।
यह रात के आकाश में सबसे चमकीला तारा है।
इस की चमक और महत्व के कारण वैदिक खगोल शास्त्र में इसका विशेष स्थान है, जहाँ इसे शिकारी तारामंडल के साथ जोड़ा जाता है।
3. अगस्त्य तारा : इसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में कैनोपस कहा जाता है।
यह रात के आकाश में दूसरा सबसे चमकीला तारा है।
इस का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में समुद्र मंथन और ऋषि अगस्त्य से संबंधित है, जो इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है, खासकर दक्षिणी भारत के ज्योतिष और खगोल विज्ञान में।
चूंकि आधुनिक वैज्ञानिक मापन के आधार पर स्टीफेंसन 2 - 18 सबसे बड़ा है, इस लिए वैदिक ग्रंथों में सीधे तौर पर इसका उल्लेख होना संभव नहीं है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र का क्या महत्व है ?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र का महत्वपूर्ण स्थान है।
यह 27 नक्षत्रों में से 19वां नक्षत्र है और इसका संबंध जड़ से है, जो किसी भी चीज़ के आधार या केंद्र को दर्शाता है।
मूल नक्षत्र से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें और इसका महत्व इस प्रकार है:
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मूल नक्षत्र का परिचय :
राशि विस्तार: यह नक्षत्र धनु राशि में $0^{\circ}00^{\prime}$ से $13^{\circ}20^{\prime}$ तक फैला हुआ है।
प्रतीक: एक साथ बंधी हुई जड़ों का गुच्छा या शेर की पूंछ।
यह गहराई में जाने, सत्य को खोजने और पुरानी चीजों को उखाड़ फेंकने का प्रतीक है।
स्वामी ग्रह : इस नक्षत्र का स्वामी केतु है, जो आध्यात्मिकता, वैराग्य, और गहन अनुसंधान से जुड़ा है।
अधिष्ठात्री देवी : इस की अधिष्ठात्री देवी निरृति हैं, जिन्हें विनाश, विघटन और परिवर्तन की देवी माना जाता है।
हालाँकि, यह विनाश केवल नकारात्मक नहीं है, बल्कि यह नई शुरुआत और सत्य की स्थापना के लिए अनावश्यक या मिथ्या चीजों को हटाने का कार्य करता है।
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ज्योतिषीय महत्व और प्रभाव :
1. गहन अनुसंधान और सत्य की खोज :
मूल का अर्थ 'जड़' होता है, इस लिए इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक हर चीज़ की तह तक जाने वाले , जिज्ञासु और सत्य की खोज करने वाले होते हैं।
इन में पुरानी मान्यताओं और भ्रमों को उखाड़ फेंकने की जबरदस्त शक्ति होती है, जिससे आध्यात्मिक या बौद्धिक परिवर्तन आता है।
2. व्यक्तित्व :
ये जातक अक्सर साहसी, दृढ़ निश्चयी, और महान प्रशासक होते हैं।
केतु के प्रभाव के कारण इनमें एक मजबूत आध्यात्मिक गहराई और अंतर्ज्ञान होता है।
वे स्वतंत्र विचार वाले और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक केंद्रित होते हैं।
3. गंडमूल' दोष की अवधारणा :
पारंपरिक ज्योतिष में, मूल नक्षत्र को गंडमूल नक्षत्रों में से एक माना जाता है ( अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती )।
ऐसी मान्यता है कि इन नक्षत्रों में बच्चे का जन्म होना, विशेष रूप से कुछ चरणों में, बच्चे के माता - पिता या स्वयं के लिए कुछ शुरुआती कष्ट या संघर्ष ला सकता है, जिसे 'मूल दोष' कहा जाता है।
हालांकि, आधुनिक और उन्नत ज्योतिषियों का मानना है कि यह दोष स्थायी नहीं होता और उचित मूल शांति पूजा या कर्मकांड से इसके नकारात्मक प्रभावों को शांत किया जा सकता है।
यह नक्षत्र महान सफलता और आध्यात्मिक उत्थान भी देता है।
4. परिवर्तन और मुक्ति :
निरृति और केतु के प्रभाव के कारण, मूल नक्षत्र विघटन और परिवर्तन का प्रतीक है।
यह जीवन के अंत से जुड़ा है, जो नई शुरुआत का अग्रदूत है और आत्मा को मुक्ति की ओर मार्गदर्शन करता है।
संक्षेप में, मूल नक्षत्र एक शक्तिशाली और तीव्र नक्षत्र है जो जीवन में गहरे परिवर्तन, सत्य की खोज और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करता है।
क्या आप मूल नक्षत्र के उपाय या शांति पूजा के बारे में जानना चाहेंगे ?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग कैसे बनता है ?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में किसी स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग का निर्माण कई ग्रहों और भावों की विशेष स्थितियों और उनके आपसी संबंधों से होता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ज्योतिष केवल संभावनाओं को इंगित करता है, न कि किसी व्यक्ति के चरित्र का निश्चित निर्धारण करता है, क्योंकि अंतिम आचरण व्यक्ति के संस्कार और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
व्यभिचारी योग बनाने वाले मुख्य ग्रह और भाव निम्नलिखित हैं :
व्यभिचारी योग के प्रमुख कारक ग्रह वैदिक ज्योतिष शास्त्र में वासना, आकर्षण, और अनैतिक संबंधों के लिए कुछ ग्रहों को प्रमुखता से देखा जाता है:
शुक्र : प्रेम, कामवासना, भोग - विलास और वैवाहिक सुख का मुख्य कारक ग्रह है।
इस का पीड़ित होना या पाप ग्रहों से संबंध बनाना इस योग को प्रबल करता है।
मंगल : उत्साह, कामुकता, आक्रामकता और शारीरिक ऊर्जा का कारक है।
शुक्र के साथ इसका संबंध अत्यंत कामुकता को दर्शाता है।
राहु : अपारंपरिक संबंध, वर्जित चीजों के प्रति आकर्षण, भ्रम और गुप्त संबंधों का कारक है।
शुक्र और राहु का योग इस योग को अत्यंत बल देता है।
शनि : गुप्तता, अलगाव और कभी - कभी अनैतिक आचरण को भी बढ़ावा देता है, विशेषकर जब यह राहु या मंगल के साथ हो।
चन्द्रमा : मन और भावनाओं का कारक है।
यदि चन्द्रमा पीड़ित हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो, तो मन की चंचलता बढ़ती है।
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व्यभिचारी योग के प्रमुख भाव :
जन्म कुंडली के कुछ भावों को विशेष रूप से प्रेम, विवाह और कामवासना से संबंधित माना जाता है, जिन्हें काम त्रिकोण कहा जाता है:
तृतीय भाव : इच्छाएँ, साहस और गुप्त प्रेम संबंधों का भाव।
पंचम भाव : प्रेम, रोमांस और पहले के संबंधों का भाव।
सप्तम भाव : विवाह, जीवनसाथी और सार्वजनिक संबंधों का भाव।
सप्तम भाव या इसके स्वामी का पीड़ित होना विवाह में अस्थिरता लाता है।
अष्टम भाव : गुप्तता, रहस्यों और अनैतिक/अचानक होने वाली घटनाओं का भाव।
इस भाव में पाप ग्रहों का प्रभाव गुप्त संबंधों का संकेत हो सकता है।
द्वादश भाव : शयन सुख और गुप्त शत्रुओं का भाव।
व्यभिचारी योग बनाने वाले मुख्य ज्योतिषीय संयोजन।
स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग बनाने वाले कुछ विशिष्ट संयोजन निम्नलिखित हैं:
शुक्र और मंगल का संबंध:
शुक्र और मंगल का एक साथ सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होना।
शुक्र और मंगल का एक - दूसरे को दृष्टि देना या एक - दूसरे की राशियों में होना ( नवांश कुंडली में)।
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राहु का प्रभाव:
राहु का सप्तम भाव में होना, खासकर यदि यह चन्द्रमा या शुक्र से संबंधित हो।
राहु और शुक्र की युति होना, विशेषकर वृश्चिक, मेष, तुला या मिथुन राशि में।
राहु का काम त्रिकोण (3, 7, 11) या द्वादश भाव में होना।
अन्य महत्वपूर्ण योग:
सप्तम भाव के स्वामी का राहु, केतु, शनि या मंगल जैसे पाप ग्रहों के साथ युति होना और पीड़ित होना।
बुध और शुक्र का सप्तम, अष्टम या दशम भाव में होना।
शनि, मंगल और शुक्र का सप्तम भाव में युति या दृष्टि संबंध।
कुंडली में लग्न या लग्नेश का कमजोर होना और पाप ग्रहों से दृष्ट होना, जिससे व्यक्ति का चरित्र कमजोर होता है।
नोट: किसी भी एक योग के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र का योगों की प्रबलता, गुरु जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि, नवांश कुंडली में ग्रहों की स्थिति और व्यक्ति की चल रही दशा को देखकर ही किसी संभावना का आकलन करते हैं।
यदि गुरु की शुभ दृष्टि इन योगों पर हो, तो अनैतिक आचरण की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏


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