वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश 

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है इस के देवता कौन है जन्म कुंडली के अनुसार क्या फल मिलता है:

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र वैदिक ज्योतिष में *27 नक्षत्रों में से 25वां नक्षत्र* है।

विस्तार: यह नक्षत्र कुंभ राशि के 20° 00' से लेकर मीन राशि के 03° 20' तक फैला हुआ है। 

इसके पहले तीन चरण कुंभ राशि में और अंतिम चरण मीन राशि में आता है।



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अर्थ: 'पूर्वा' का अर्थ है पहले और 'भाद्रपद' का अर्थ है शुभ पद या भाग्यशाली पैर।

प्रतीक: इसके प्रतीकों में दो मुख वाला व्यक्ति, तलवार, या शव का अग्रभाग शामिल है, जो परिवर्तन, द्वैत और आध्यात्मिक अग्नि को दर्शाता है।

शासक ग्रह: इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह बृहस्पति (गुरु) है।

इसके देवता कौन हैं ?

पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अजैकपाद हैं।

अजैकपाद को भगवान शिव के रुद्र रूपों में से एक माना जाता है, जो एक पैर वाले अजन्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इन्हें आध्यात्मिक अग्नि, तीव्रता और तूफान से भी जोड़ा जाता है।

यह देवता जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और भ्रम के विनाश की शक्ति प्रदान करते हैं।

जन्म कुंडली के अनुसार क्या फल मिलता है ?

पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों में सामान्यतः निम्नलिखित विशेषताएं और फल देखे जाते हैं:

सकारात्मक फल और स्वभाव :

ईमानदार और सच्चे: ये जातक अपने कार्यों में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी को बहुत महत्व देते हैं।

दार्शनिक और ज्ञानी: गुरु के प्रभाव के कारण इनमें गहन समझ, बुद्धिमत्ता और दार्शनिक दृष्टिकोण होता है। 
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ये ज्योतिष, खगोल शास्त्र और विज्ञान में रुचि रख सकते हैं।

उदार और मददगार: ये स्वभाव से दयालु, उदार और शांतिप्रिय होते हैं, और दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।

प्रभावशाली वक्ता: इनमें उत्कृष्ट संचार कौशल और नेतृत्व की क्षमता होती है, जिससे वे दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं।

आध्यात्मिक विकास: इनमें आध्यात्मिक गहराई होती है और ये भौतिकता से परे सत्य की खोज में लगे रहते हैं।

साहसी: ये अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हैं और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल इच्छा रखते हैं।

चुनौतियाँ और अन्य फल :

अत्यधिक तीव्रता: इस नक्षत्र में *तीव्र और उग्र* ऊर्जा होती है, जिसके कारण कभी - कभी जातक भावुक या क्रोधित हो सकते हैं।

द्वैत का प्रदर्शन: इन में दो विपरीत व्यक्तित्वों का समन्वय दिख सकता है— एक ओर नम्र, सभ्य, तो दूसरी ओर हिंसक या विनाशकारी।
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पारिवारिक जीवन: कुछ मामलों में, इन जातकों को माता के स्नेह में कमी या उनसे वैचारिक मतभेद का सामना करना पड़ सकता है।

स्वतंत्रता: ये सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहना पसंद करते हैं।

करियर: ये शिक्षण, लेखन, अनुसंधान, समाज सुधारक या व्यापार जैसे क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं।

क्या आप पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र के किसी विशेष चरण ( पाद ) या उससे जुड़े किसी और पहलू के बारे में जानना चाहेंगे ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का खगोल शास्त्र अनुसार सब से बड़ा गृह और नक्षत्र कौनसा है ?

वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र के अनुसार:
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सबसे बड़ा ग्रह :

वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ( गुरु ) को सबसे बड़ा ग्रह माना जाता है।

खगोलीय आधार: सौर मंडल में बृहस्पति वास्तव में सबसे बड़ा ग्रह है।

ज्योतिषीय महत्व: बृहस्पति ( गुरु ) को विशालता , विकास , ज्ञान , धर्म , और विस्तार का कारक माना जाता है। 

यह नवग्रहों में अत्यधिक शुभ ग्रह है और इन्हें देवगुरु भी कहा जाता है। 
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सब से बड़ा नक्षत्र :

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सभी 27 नक्षत्रों को आकाश में समान रूप से विभाजित किया गया है, और प्रत्येक नक्षत्र का चाप विस्तार $13^\circ 20'$ होता है। 

इस हिसाब से कोई भी नक्षत्र दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं होता है।

हालाँ कि, एक अतिरिक्त नक्षत्र है जिसे अभिजीत नक्षत्र कहा जाता है, जिसे कभी - कभी गणना में शामिल किया जाता है।

नक्षत्रों का विस्तार: सभी 27 नक्षत्रों में से प्रत्येक का विस्तार $13^\circ 20'$ है, जो कुल $360^\circ$ के राशिचक्र को पूरा करता है।

अभिजीत नक्षत्र: यह उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के अंतिम भाग और श्रवण नक्षत्र के शुरुआती भाग के बीच आता है। 

यह एक छोटा नक्षत्र है, जो केवल लगभग $4^\circ 14'$ का होता है, और यह मुख्य 27 नक्षत्रों के समान नहीं है।

इस लिए, यदि 'सबसे बड़ा' से तात्पर्य 'सबसे अधिक चाप विस्तार' से है, तो सभी 27 नक्षत्रों का विस्तार समान है।

वैदिक ज्योतिष शास्त्र और वैदिक खगोल शास्त्र के अनुसार सब से बड़ा तारा कौनसा है ?

यह प्रश्न आधुनिक खगोल विज्ञान और वैदिक ज्योतिष/खगोल शास्त्र के बीच अंतर के कारण जटिल है।

आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार सबसे बड़ा तारा आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड में ज्ञात सबसे बड़ा तारा है:

स्टीफेंसन 2 - 18 : यह एक लाल महा दानव तारा है। 

कुछ समय पहले तक यूवाई स्कूटी को सबसे बड़ा माना जाता था, लेकिन नए शोध के अनुसार स्टीफेंसन 2 - 18 ज्ञात तारों में सबसे बड़ा है। 

इसका आकार इतना विशाल है कि यदि इसे सूर्य के स्थान पर रखा जाए, तो इस का घेरा शनि ग्रह की कक्षा को भी पार कर जाएगा।
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वैदिक ज्योतिष/खगोल शास्त्र का दृष्टिकोण :

वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र में, "सबसे बड़ा तारा" की अवधारणा मुख्य रूप से आकार के बजाय महत्व , चमक , या दृष्टिगत उपस्थिति पर आधारित होती थी, क्योंकि उस समय दूरबीनें उपलब्ध नहीं थीं।

सूर्य : पृथ्वी के सबसे निकटतम तारा होने के कारण, सूर्य वैदिक ज्योतिष में सबसे महत्वपूर्ण खगोलीय पिंड है, जिसे नवग्रहों का राजा माना जाता है। 

इसे अक्सर आत्मा, शक्ति और जीवन का कारक माना जाता है।

लुब्धक या मृगव्याध : इसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में सिरियस ए कहा जाता है। 

यह रात के आकाश में सबसे चमकीला तारा है।

इस की चमक और महत्व के कारण वैदिक खगोल शास्त्र में इसका विशेष स्थान है, जहाँ इसे शिकारी तारामंडल के साथ जोड़ा जाता है। 

3. अगस्त्य तारा : इसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में कैनोपस कहा जाता है। 

यह रात के आकाश में दूसरा सबसे चमकीला तारा है। 

इस का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में समुद्र मंथन और ऋषि अगस्त्य से संबंधित है, जो इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है, खासकर दक्षिणी भारत के ज्योतिष और खगोल विज्ञान में।

चूंकि आधुनिक वैज्ञानिक मापन के आधार पर स्टीफेंसन 2 - 18 सबसे बड़ा है, इस लिए वैदिक ग्रंथों में सीधे तौर पर इसका उल्लेख होना संभव नहीं है।



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वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र का क्या महत्व है ?


वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। 


यह 27 नक्षत्रों में से 19वां नक्षत्र है और इसका संबंध जड़ से है, जो किसी भी चीज़ के आधार या केंद्र को दर्शाता है।

मूल नक्षत्र से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें और इसका महत्व इस प्रकार है:
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मूल नक्षत्र का परिचय :

राशि विस्तार: यह नक्षत्र धनु राशि में $0^{\circ}00^{\prime}$ से $13^{\circ}20^{\prime}$ तक फैला हुआ है।

प्रतीक: एक साथ बंधी हुई जड़ों का गुच्छा या शेर की पूंछ। 

यह गहराई में जाने, सत्य को खोजने और पुरानी चीजों को उखाड़ फेंकने का प्रतीक है।

स्वामी ग्रह : इस नक्षत्र का स्वामी केतु है, जो आध्यात्मिकता, वैराग्य, और गहन अनुसंधान से जुड़ा है।

अधिष्ठात्री देवी : इस की अधिष्ठात्री देवी निरृति हैं, जिन्हें विनाश, विघटन और परिवर्तन की देवी माना जाता है। 

हालाँकि, यह विनाश केवल नकारात्मक नहीं है, बल्कि यह नई शुरुआत और सत्य की स्थापना के लिए अनावश्यक या मिथ्या चीजों को हटाने का कार्य करता है।
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ज्योतिषीय महत्व और प्रभाव :

1. गहन अनुसंधान और सत्य की खोज :

मूल का अर्थ 'जड़' होता है, इस लिए इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक हर चीज़ की तह तक जाने वाले , जिज्ञासु और सत्य की खोज करने वाले होते हैं।

इन में पुरानी मान्यताओं और भ्रमों को उखाड़ फेंकने की जबरदस्त शक्ति होती है, जिससे आध्यात्मिक या बौद्धिक परिवर्तन आता है।

2.  व्यक्तित्व :

ये जातक अक्सर साहसी, दृढ़ निश्चयी, और महान प्रशासक होते हैं।

केतु के प्रभाव के कारण इनमें एक मजबूत आध्यात्मिक गहराई और अंतर्ज्ञान होता है।

वे स्वतंत्र विचार वाले और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक केंद्रित होते हैं।

3.  गंडमूल' दोष की अवधारणा :

पारंपरिक ज्योतिष में, मूल नक्षत्र को गंडमूल नक्षत्रों में से एक माना जाता है ( अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती )।

ऐसी मान्यता है कि इन नक्षत्रों में बच्चे का जन्म होना, विशेष रूप से कुछ चरणों में, बच्चे के माता - पिता या स्वयं के लिए कुछ शुरुआती कष्ट या संघर्ष ला सकता है, जिसे 'मूल दोष' कहा जाता है।

हालांकि, आधुनिक और उन्नत ज्योतिषियों का मानना है कि यह दोष स्थायी नहीं होता और उचित मूल शांति पूजा या कर्मकांड से इसके नकारात्मक प्रभावों को शांत किया जा सकता है। 

यह नक्षत्र महान सफलता और आध्यात्मिक उत्थान भी देता है।

4.  परिवर्तन और मुक्ति :

निरृति और केतु के प्रभाव के कारण, मूल नक्षत्र विघटन और परिवर्तन का प्रतीक है। 

यह जीवन के अंत से जुड़ा है, जो नई शुरुआत का अग्रदूत है और आत्मा को मुक्ति की ओर मार्गदर्शन करता है।

संक्षेप में, मूल नक्षत्र एक शक्तिशाली और तीव्र नक्षत्र है जो जीवन में गहरे परिवर्तन, सत्य की खोज और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करता है।

क्या आप मूल नक्षत्र के उपाय या शांति पूजा के बारे में जानना चाहेंगे ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग कैसे बनता है ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में किसी स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग का निर्माण कई ग्रहों और भावों की विशेष स्थितियों और उनके आपसी संबंधों से होता है। 

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ज्योतिष केवल संभावनाओं को इंगित करता है, न कि किसी व्यक्ति के चरित्र का निश्चित निर्धारण करता है, क्योंकि अंतिम आचरण व्यक्ति के संस्कार और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

व्यभिचारी योग बनाने वाले मुख्य ग्रह और भाव निम्नलिखित हैं :


व्यभिचारी योग के प्रमुख कारक ग्रह वैदिक ज्योतिष शास्त्र में वासना, आकर्षण, और अनैतिक संबंधों के लिए कुछ ग्रहों को प्रमुखता से देखा जाता है:


शुक्र : प्रेम, कामवासना, भोग - विलास और वैवाहिक सुख का मुख्य कारक ग्रह है। 

इस का पीड़ित होना या पाप ग्रहों से संबंध बनाना इस योग को प्रबल करता है।

मंगल : उत्साह, कामुकता, आक्रामकता और शारीरिक ऊर्जा का कारक है। 

शुक्र के साथ इसका संबंध अत्यंत कामुकता को दर्शाता है।

राहु : अपारंपरिक संबंध, वर्जित चीजों के प्रति आकर्षण, भ्रम और गुप्त संबंधों का कारक है। 

शुक्र और राहु का योग इस योग को अत्यंत बल देता है।

शनि : गुप्तता, अलगाव और कभी - कभी अनैतिक आचरण को भी बढ़ावा देता है, विशेषकर जब यह राहु या मंगल के साथ हो।

चन्द्रमा : मन और भावनाओं का कारक है। 

यदि चन्द्रमा पीड़ित हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो, तो मन की चंचलता बढ़ती है।
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व्यभिचारी योग के प्रमुख भाव :


जन्म कुंडली के कुछ भावों को विशेष रूप से प्रेम, विवाह और कामवासना से संबंधित माना जाता है, जिन्हें काम त्रिकोण कहा जाता है:


तृतीय भाव : इच्छाएँ, साहस और गुप्त प्रेम संबंधों का भाव।


पंचम भाव : प्रेम, रोमांस और पहले के संबंधों का भाव।

सप्तम भाव : विवाह, जीवनसाथी और सार्वजनिक संबंधों का भाव। 

सप्तम भाव या इसके स्वामी का पीड़ित होना विवाह में अस्थिरता लाता है।

अष्टम भाव : गुप्तता, रहस्यों और अनैतिक/अचानक होने वाली घटनाओं का भाव। 

इस भाव में पाप ग्रहों का प्रभाव गुप्त संबंधों का संकेत हो सकता है।

द्वादश भाव : शयन सुख और गुप्त शत्रुओं का भाव।

व्यभिचारी योग बनाने वाले मुख्य ज्योतिषीय संयोजन 

स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग बनाने वाले कुछ विशिष्ट संयोजन निम्नलिखित हैं:

शुक्र और मंगल का संबंध:

शुक्र और मंगल का एक साथ सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होना।

शुक्र और मंगल का एक - दूसरे को दृष्टि देना या एक - दूसरे की राशियों में होना ( नवांश कुंडली में)।
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राहु का प्रभाव:


राहु का सप्तम भाव में होना, खासकर यदि यह चन्द्रमा या शुक्र से संबंधित हो।


राहु और शुक्र की युति होना, विशेषकर वृश्चिक, मेष, तुला या मिथुन राशि में।


राहु का काम त्रिकोण (3, 7, 11) या द्वादश भाव में होना।

अन्य महत्वपूर्ण योग:

सप्तम भाव के स्वामी का राहु, केतु, शनि या मंगल जैसे पाप ग्रहों के साथ युति होना और पीड़ित होना।

बुध और शुक्र का सप्तम, अष्टम या दशम भाव में होना।

शनि, मंगल और शुक्र का सप्तम भाव में युति या दृष्टि संबंध।

कुंडली में लग्न या लग्नेश का कमजोर होना और पाप ग्रहों से दृष्ट होना, जिससे व्यक्ति का चरित्र कमजोर होता है।

नोट: किसी भी एक योग के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र का योगों की प्रबलता, गुरु जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि, नवांश कुंडली में ग्रहों की स्थिति और व्यक्ति की चल रही दशा को देखकर ही किसी संभावना का आकलन करते हैं। 

यदि गुरु की शुभ दृष्टि इन योगों पर हो, तो अनैतिक आचरण की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏


आंशिक सूर्य ग्रहण शंका समाधान/प्रदोष व्रत की महत्ता/सूर्य का हमारे जीवन पर प्रभाव :

आंशिक सूर्य ग्रहण शंका समाधान/प्रदोष व्रत की महत्ता/सूर्य का हमारे जीवन पर प्रभाव :

आंशिक सूर्य ग्रहण शंका समाधान :

ग्रहण एक खगोलीय घटना है इसका वैज्ञानिक महत्व होने के साथ ही आध्यात्मिक रूप से भी बहुत महत्त्व माना गया है जगत के समस्त प्राणियों पर इसका किसी न किसी रूप में प्रभाव अवश्य पड़ता है। 


कब लगता है सूर्यग्रहण :

जब पृथ्वी चंद्रमा व सूर्य एक सीधी रेखा में हों तो उस अवस्था में सूर्य को चंद्र ढक लेता है जिस सूर्य का प्रकाश या तो मध्यम पड़ जाता है या फिर अंधेरा छाने लगता है इसी को सूर्य ग्रहण कहा जाता है।
 
कितने प्रकार का होता है सूर्य ग्रहण :

पूर्ण सूर्य ग्रहण : चंद्र जब सूर्य को पूर्ण रूप से ढक देता है और चारो दिशाओ में अंधेरा व्याप्त हो जाये तो इसे पूर्ण सूर्यग्रहण कहा जायेगा।

खंडग्रास या आंशिक सूर्य ग्रहण : जब चंद्रमा सूर्य को पूर्ण रूप से न ढ़क पाये तो तो इस अवस्था को खंड ग्रहण कहा जाता है। 

पृथ्वी के अधिकांश हिस्सों में अक्सर खंड सूर्यग्रहण ही देखने को मिलता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण : वहीं यदि चांद सूरज को इस प्रकार ढके की सूर्य वलयाकार दिखाई दे यानि बीच में से ढका हुआ और उसके किनारों से रोशनी का छल्ला बनता हुआ दिखाई दे तो इस प्रकार के ग्रहण को वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा जाता है। 




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खगोलशास्त्र के अनुसार ग्रहण :

खगोल शास्त्रियों नें गणित से निश्चित किया है कि 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। 

एक वर्ष में 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण तक हो सकते हैं। 

किन्तु एक वर्ष में 2 सूर्यग्रहण तो होने ही चाहिए। 

हाँ, यदि किसी वर्ष 2 ही ग्रहण हुए तो वो दोनो ही सूर्यग्रहण होंगे। 

यद्यपि वर्षभर में 7 ग्रहण तक संभाव्य हैं, तथापि 4 से अधिक ग्रहण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। 
प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुन: होता है। 

किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो यह निश्चित नहीं हैं, क्योंकि सम्पात बिन्दु निरन्तर चल रहे हैं।

सूर्य ग्रहण है या नहीं शंका समाधान :

भारतीय समयानुसार 21 सितम्बर 2025 को ग्रहण की शुरुआत रात 11 बजे होगी और इसका समापन 22 सितंबर की अर्धरात्रि में 3 बजकर 23 मिनट पर होगा। 

सूर्य ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले सूतक लग जाता है। 

यह ग्रहण न्यूजीलैण्ड, पूर्वी मेनालेशिया, दक्षिणी पोलिनेशिया, पश्चिमी अंटार्कटिका आदि क्षेत्रों में दिखाई देगा, यह ग्रहण भारत में कही भी दिखाई नही देगा।

भारत में यह ग्रहण नहीं दिखेगा, अतः इसका सूतक भी भारत में नहीं लगेगा।

शुक्र प्रदोष व्रत परिचय एवं विस्तृत विधि :

प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है. प्रदेशों के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है।

ऐसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए।


यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है. भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है।

प्रदोष व्रत की महत्ता :

शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि " एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा।


उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है।

व्रत से मिलने वाले फल :

अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है।

जैसे : सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है। 

सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है। 

जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है एवं बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है।

गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है। 

शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख - शान्ति के लिये किया जाता है। 

अंत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए। 

अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।

व्रत विधि :

सुबह स्नान के बाद भगवान शिव, पार्वती और नंदी को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। फिर गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्र, गंध, अक्षत ( चावल ), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य ( भोग ), फल, पान, सुपारी, लौंग और इलायची चढ़ाएं। 

फिर शाम के समय भी स्नान करके इसी प्रकार से भगवान शिव की पूजा करें। 


फिर सभी चीजों को एक बार शिव को चढ़ाएं।

और इसके बाद भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजन करें। 

बाद में भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। 

इस के बाद आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। 

जितनी बार आप जिस भी दिशा में दीपक रखेंगे, दीपक रखते समय प्रणाम जरूर करें। 

अंत में शिव की आरती करें और साथ ही शिव स्त्रोत, मंत्र जाप करें। रात में जागरण करें।

प्रदोष व्रत समापन पर उद्धापन :

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

उद्धापन करने की विधि :

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है. "ऊँ उमा सहित शिवाय नम:" मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है।



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हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है। 

और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है।

शुक्र प्रदोष व्रत :

सूत जी बोले-“अभीष्ट सिद्धि की कामना, यदि हो ह्रदय विचार ।

धर्म, अर्थ, कामादि, सुख, मिले पदारथ चार ॥”

व्रत कथा :

प्राचीनकाल की बात है, एक नगर में तीन मित्र रहते थे – 

एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण कुमार और तीसरा धनिक पुत्र । 

राजकुमार व ब्राह्मण कुमार का विवाह हो चुका था । 

धनिक पुत्र का भी विवाह हो गया था, किन्तु गौना शेष था । 

एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे । 

ब्राह्मण कुमार ने स्त्रियों की प्रशंसा करते हुए कहा- ‘नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है।’ 

धनिक पुत्र ने यह सुना तो तुरन्त ही अपनी पत्‍नी को लाने का निश्‍चय किया । 

माता - पिता ने उसे समझाया कि अभी शुक्र देवता डूबे हुए हैं । 

ऐसे में बहू-बेटियों को उनके घर से विदा करवा लाना शुभ नहीं होता । 

किन्तु धनिक पुत्र नहीं माना और ससुराल जा पहुंचा । 

ससुराल में भी उसे रोकने की बहुत कोशिश की गई, मगर उसने जिद नहीं छोड़ी । 

माता - पिता को विवश होकर अपनी कन्या की विदाई करनी पड़ी । 

ससुराल से विदा हो पति-पत्‍नी नगर से बाहर निकले ही थे कि उनकी बैलगाड़ी का पहिया अलग हो गया और एक बैल की टांग टूट गई । 

दोनों को काफी चोटें आईं फिर भी वे आगे बढ़ते रहे । 

कुछ दूर जाने पर उनकी भेंट डाकुओं से हो गई । 

डाकू धन - धान्य लूट ले गए । 

दोनों रोते - पीटते घर पहूंचे । 

वहां धनिक पुत्र को सांप ने डस लिया । 

उसके पिता ने वैद्य को बुलवाया । 

वैद्य ने निरीक्षण के बाद घोषणा की कि धनिक पुत्र तीन दिन में मर जाएगा  जब ब्राह्मण कुमार को यह समाचार मिला तो वह तुरन्त आया । 

उसने माता - पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने का परामर्ष दिया और कहा- 

‘इसे पत्‍नी सहित वापस ससुराल भेज दें । 

यह सारी बाधाएं इसलिए आई हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में पत्‍नी को विदा करा लाया है । 

यदि यह वहां पहुंच जाएगा तो बच जाएगा।’ 

धनिक को ब्राह्मण कुमार की बात ठीक लगी । 

उसने वैसा ही किया । 

ससुराल पहुंचते ही धनिक कुमार की हालत ठीक होती चली गई । 

शुक्र प्रदोष के महात्म्य से सभी घोर कष्ट टल गए।

प्रदोषस्तोत्रम् :

।। श्री गणेशाय नमः।। 


जय देव जगन्नाथ जय शङ्कर शाश्वत । 

जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥ १॥ 

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । 
जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥ २॥ 
जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण । 
जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ॥ ३॥ 
जय कोट्यर्कसङ्काश जयानन्तगुणाश्रय । 
जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन ॥ ४॥ 
जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन । 
जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ॥ ५॥ 
प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः । 
सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ॥ ६॥ 
महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च । 
महाशोकनिविष्टस्य महारोगातुरस्य च ॥ ७॥ 
ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः । 
ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शङ्कर ॥ ८॥ 
दरिद्रः प्रार्थयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् । 
अर्थाढ्यो वाऽथ राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम् ॥ ९॥ 
दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः । 
ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शङ्कर ॥ १०॥ 
शत्रवः संक्षयं यान्तु प्रसीदन्तु मम प्रजाः । 
नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः सन्तु निरापदः ॥ ११॥ 
दुर्भिक्षमरिसन्तापाः शमं यान्तु महीतले । 
सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः ॥ १२॥ 
एवमाराधयेद्देवं पूजान्ते गिरिजापतिम् । 
ब्राह्मणान्भोजयेत् पश्चाद्दक्षिणाभिश्च पूजयेत् ॥ १३॥ 
सर्वपापक्षयकरी सर्वरोगनिवारणी । 
शिवपूजा मयाऽऽख्याता सर्वाभीष्टफलप्रदा ॥ १४॥ 

॥ इति प्रदोषस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

कथा एवं स्तोत्र पाठ के बाद महादेव जी की आरती करें

ताम्बूल, दक्षिणा, जल - आरती 

तांबुल का मतलब पान है। 

यह महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है। 

फल के बाद तांबुल समर्पित किया जाता है। 

ताम्बूल के साथ में पुंगी फल ( सुपारी ), लौंग और इलायची भी डाली जाती है । 

दक्षिणा अर्थात् द्रव्य समर्पित किया जाता है। 

भगवान भाव के भूखे हैं। 

अत: उन्हें द्रव्य से कोई लेना - देना नहीं है। 

द्रव्य के रूप में रुपए, स्वर्ण, चांदी कुछ भी अर्पित किया जा सकता है।

आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। 

इस के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। 

आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है।

भगवान शिव जी की आरती :

ॐ जय शिव ओंकारा,भोले हर शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव...॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
तीनों रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भोले शशिधारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालन करता ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा ।
पार्वती अर्धांगनी, शिवलहरी गंगा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
पर्वत सौहे पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
जटा में गंगा बहत है, गल मुंडल माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
ॐ जय शिव ओंकारा भोले हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर हर महादेव।।

कर्पूर आरती :

कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि॥
मंगलम भगवान शंभू
मंगलम रिषीबध्वजा ।
मंगलम पार्वती नाथो
मंगलाय तनो हर ।।

मंत्र पुष्पांजलि :

मंत्र पुष्पांजली मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। भाव यह है कि इन पुष्पों की सुगंध की तरह हमारा यश सब दूर फैले तथा हम प्रसन्नता पूर्वक जीवन बीताएं।

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे स मे कामान्कामकामाय मह्यम् कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु।
कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नम:
ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं
पारमेष्ठ्यं राज्यं माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी सार्वायुष आंतादापरार्धात्पृथिव्यै समुद्रपर्यंता या एकराळिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन्गृहे आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवा: सभासद इति।
ॐ विश्व दकचक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात संबाहू ध्यानधव धिसम्भत त्रैत्याव भूमी जनयंदेव एकः।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
नाना सुगंध पुष्पांनी यथापादो भवानीच
पुष्पांजलीर्मयादत्तो रुहाण परमेश्वर
ॐ भूर्भुव: स्व: भगवते श्री सांबसदाशिवाय नमः। मंत्र पुष्पांजली समर्पयामि।।

प्रदक्षिणा :

नमस्कार, स्तुति -प्रदक्षिणा का अर्थ है परिक्रमा। 

आरती के उपरांत भगवन की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा हमेशा क्लॉक वाइज ( clock - wise ) करनी चाहिए। 

स्तुति में क्षमा प्रार्थना करते हैं, क्षमा मांगने का आशय है कि हमसे कुछ भूल, गलती हो गई हो तो आप हमारे अपराध को क्षमा करें।
 
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। 
तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।

अर्थ: जाने अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के भी सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाए। 

सूर्य का हमारे जीवन पर प्रभाव :

सूर्य का हमारे जीवन पर प्रभाव और अन्य ग्रहों से युति का फल द्वितीय भाग :

सूर्य मंगल और चन्द्र की युति फल :

सूर्य के साथ मंगल और चन्द्र के होने से पिता पराक्रमी और जिद्दी स्वभाव का माना जाता है...!

जातक या पिता के पास पानी की मशीने और खेती करने वाली मशीने भी हो सकती है...!

जातक पानी का व्यवसाय कर सकता है,जातक के भाई के पास यात्रा वाले काम होते है...!

जातक या पिता का किसी न किसी प्रकार का सेना या पुलिस से लगाव होता है।

सूर्य मंगल और बुध युति फल :

सूर्य के साथ मन्गल और बुध के होने से तीन भाई का योग होता है...!

अगर तीनो ग्रह पुरुष राशि में हो तो,सूर्य और मन्गल मित्र है...!

इस लिये जातक के दो भाई आज्ञाकारी होते है...!

बुध मन्गल के सामने एजेन्ट बन जाता है...!

अत: इस प्रकार के कार्य भी हो सकते है...!

मंगल कठोर और बुध मुलायम होता है....!

जातक के भाई के साथ किसी प्रकार का धोखा भी हो सकता है।

सूर्य मंगल और गुरु युति फल :

सूर्य मन्गल और गुरु के साथ होने पर जातक का पिता प्रभावशाली होता है...!

जातक का समाज में स्थान उच्च का होता है...!

जीवात्मा संयोग भी बन जाता है...!

सूर्य और गुरु मिलकर जातक को मंत्री वाले काम भी देते है...!

अगर किसी प्रकार से राज्य या राज्यपरक भाव का मालिक हो....!

जातक का भाग्योदय उम्र की चौबीसवें साल के बाद चालू हो जाता है...!

जातक के पिता को अधिकार में काफ़ी कुछ मिलता है...!

जमीन और जागीरी वाले ठाठ पूर्वजों के जमाने के होते है।

सूर्य मंगल और शुक्र की युति का फल :

सूर्य मन्गल और शुक्र से पिता के पास एक भाई और एक बहिन का संयोग होता है...!

पिता की सहायतायें एक स्त्री के लिये हुआ करती है...!

जातक का चाचा अपने बल से पिता का धन प्राप्त करता है...!

जातक की पत्नी के अन्दर अहम की भावना होती है...!

और वह अपने को दिखाने की कोशिश करती है...!

एक बहिन या जातक की पुत्री के पास अकूत धन की आवक होती है...!

जातक के एक भाई की उन्नति शादी के बाद होती है।

सूर्य मंगल और शनि की युति का फल :

सूर्य के साथ मंगल और शनि के होने से जातक की सन्तान को कष्ट होता है...!

पिता के कितने ही दुश्मन होते है,और पिता से हारते भी है...!

जातक की उन्नति उम्र की तीस साल के बाद होती है...!

जीवन के अन्दर संघर्ष होता है...!

और जितने भी अपने सम्बन्धी होते है वे ही हर काम का विरोध करते है...!

भाई को अनिष्ट होता है...!

स्थान परिवर्तन समस्याओं के चलते रहना होता रहता है...!

कार्य कभी भी उंची स्थिति के नही हो पाते है,कारण सूर्य दिन का राजा है और शनि रात का राजा है दोनो के मिलने से कार्य केवल सुबह या शाम के रह जाते है...!

केवल पराक्रम से ही जीवन की गाडी चलती रहती है।

सूर्य मंगल और राहु की युति का फल :

सूर्य मन्गल के साथ राहु के होने से इन तीनो का योग पिता की कामों में किसी प्रकार की इन्डस्ट्री की बात का इशारा देता है...!

जातक की एक भाई की दुर्घटना किसी तरह से होती है...!

जातक का अन्तिम जीवन परेशानी में होता है,पुत्र से जातक को कष्ट होता है...!

कम्प्यूटर या फ़ोटोग्राफ़ी का काम भी जातक के पास होता है।

सूर्य मंगल और केतु की युति का फल :

सूर्य मन्गल और केतु के साथ होने से जातक के परिवार में हमेशा अनबन रहती है....!

जातक को कानून का ज्ञान होता है...!

और जातक का जीवन आनन्द मय नही होता है उसका स्वभाव रूखापन लिये होता है...!

नेतागीरी वाले काम होते है,एक पुत्र को परेशानी ही रहती है...!

जातक के शरीर में रक्त विकार हुआ करते है।

सूर्य बुध और चन्द्र की युति का फल :

सूर्य के साथ बुध और चन्द्रमा की युति होने से पिता का जीवन बुद्धि जीवी कामो में गुजरता है...!

पिता कार्य के संचालन में माहिर होता है...!

जातक या जातक का पिता दवाइयों वाले कामों के अन्दर माहिर होते है...!

चन्द्रमा फ़ल फ़ूल या आयुर्वेद की तरफ़ भी इशारा करता है...!

इस लिये बुध व्यापार की तरफ़ भी इशारा करता है...!

जातक की शिक्षा में एक बार बाधा जरूर आती है लेकिन वह किसी न किसी प्रकार से अपनी बाधा को दूर कर देता है।

सूर्य बुध और मंगल की युति का फल :

सूर्य के साथ बुध और मन्गल के होने से जातक के पिता को भूमि का लाभ होता है...!

जातक की शिक्षा मे अवरोध पैदा होता है...!

जातक के भाइयों के अन्दर आपसी मतभेद होते है...!

जो आगे चलकर शत्रुता में बदल जाते है।

सूर्य बुध और गुरु की युति का फल :

सूर्य बुध और गुरु का साथ होने से जातक जवान से ज्ञान वाली बातों का प्रवचन करता है...!

योग और उपासना का ज्ञानी होता है,पिता को उसके जीवन के आरम्भ मे कठिनाइयों का सामना करना पडता है...!

लेकिन जातक के जन्म के बाद पिता का जीवन सफ़ल होना चालू हो जाता है...!

जातक का एक भाई लोकप्रिय होता है...!

पिता को समाज का काम करने मे आनन्द आता है और वह अपने को सन्यासी जैसा बना लेता है।

सूर्य बुध और शुक्र की युति का फल :

सूर्य के साथ बुध और शुक्र के होने से जातक की एक संतान बहुत ही शिक्षित होती है...!

उसके पास भूमि भवन और सवारी के अच्छे साधन होते है...!

पिता के जीवन में दलाली बाले काम होते है...!

वह शेयर या भवन या भूमि की दलाली के बाद काफ़ी धन कमाता है...!

जातक या जातक के पिता को दो स्त्री या दो पति का सुख होता है...!

जातक समाज सेवी और स्त्री प्रेमी होता है।

सूर्य बुध और शनि की युति का फल :

सूर्य बुध के साथ शनि के होने पर जातक के पिता के साथ सहयोग नही होता है...!

पिता के पास जो भी काम होते है वे सरकारी और बुद्धि से जुडे होते है...!

बुद्धि के साथ कर्म का योग होता है....!

जातक को सरकार से किसी न किसी प्रकार की सहायता मिलती है...!

राजकीय सेवा में जाने का पूरा पूरा योग होता है।

सूर्य बुध और राहु की युति का फल :

सूर्य बुध के साथ राहु के होने से जातक एक पिता और पितामह दोनो ही प्रसिद्ध रहे होते है...!

पिता के पास धन और भूमि भी होती है...!

लेकिन वह जातक के जन्म के बाद धन को दवाइयों या आकस्मिक हादसों मे अथवा शराब आदि में उडाना चालू कर देता है...!

एयर लाइन्स वाले काम या उनसे सम्बन्धित एजेन्सी वाले काम भी मिलते है...!

यात्राओं को अरेन्ज करने वाले काम और सडकॊ की नाप जोख के काम भी मिलते है...!

जातक को पैतृक सम्पत्ति कम ही मिल पाती है।

सूर्य बुध और केतु की युति का फल :

सूर्य के साथ बुध और केतु होने से जातक के मामा का परिवार प्रभावी होता है...!

पिता या जातक को कोर्ट केशो से और बेकार के प्रत्यारोंपो से कष्ट होता है...!

पिता के अवैद्य संबन्धों के कारण परिवार में तनाव रहता है...!

जातक को इन बातो से परेशानी होती है।
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!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits, Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
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वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...