सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। पितृदोष प्रेत बाधा दोष और श्रापित दोष कुंडली ।।
पितृदोष प्रेत बाधा दोष और श्रापित दोष कुंडली
★★जातक की कुंडली मे पितृदोष , प्रेत बाधा दोष और श्रापित कुंडली के योग ।
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोलशास्त्रविद्या, श्री ऋग्वेद एवं श्री यजुर्वेद के अनुसार जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली एवं गोचर के ग्रहों से पितृदोष, बाधा, श्रापित दोष तथा दान का संपूर्ण महत्व, नियम, फल एवं उपाय
जातक की जन्म कुंडली मे पितृदोष को सहज समझने वाला योग नही समझा जा सकता इसके परिणाम जटिल ही गिने जाते है।
इसके बारे शास्त्र सम्मत विस्तारपूर्ण विवरण जानने को मिलना ओर बहुत सी स्वभाविक व सार्वजनिक हो चुकी कम्पलेन्टस जो जीवन के हर काम मे हिचकोले देकर सम्पूर्ण होने में अटकले ओर चिड़चिड़ापन देता है।
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सनातन वैदिक परंपरा में मनुष्य का जीवन केवल उसके वर्तमान कर्मों का परिणाम नहीं माना गया है, बल्कि पूर्वजों के संस्कार, पूर्वजन्म के कर्म, देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण का भी उस पर गहरा प्रभाव बताया गया है।
श्री ऋग्वेद, श्री यजुर्वेद, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों तथा वैदिक ज्योतिष के सिद्धांतों में पितरों के सम्मान, दान, यज्ञ, तर्पण और सदाचार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
मेनली राहु ग्रह के तीनो त्रिकोनो यानी लगन,पँचम ओर नवम से तगड़ा पितृ दोष जो सब रिश्तों से मिले जुले पुर्वजो की निराशा का अवलोकन देता है।
खासम खास भी पितृ दोष भी होते है जो प्रायः किसी एक रिशते से ही सम्बंधित होते है।
वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर के माध्यम से यह देखा जाता है कि किसी व्यक्ति के जीवन में बार - बार आने वाली बाधाओं का कारण सामान्य ग्रहदोष है, पितृदोष है, श्रापित दोष है अथवा कर्मजन्य अवरोध।
उचित ज्ञान, श्रद्धा, दान, जप और सत्कर्म द्वारा इन दोषों की शांति का प्रयास किया जाता है।
पितृदोष का वास्तविक अर्थ
पितृदोष का अर्थ केवल यह नहीं है कि पूर्वज नाराज हैं।
वैदिक दृष्टि से इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि परिवार में पूर्वजों से जुड़े अधूरे धार्मिक कर्तव्य, अनुष्ठानों की उपेक्षा, असमय मृत्यु, कुल परंपराओं का त्याग अथवा पूर्वजन्म के कर्मों का प्रभाव जीवन में बाधा उत्पन्न कर रहा है।
जब परिवार अपने पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, सेवा और धर्मपालन करता है तब पितरों की कृपा से वंश में सुख, समृद्धि और उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
सूर्य + राहु = पिता,दादा,परदादा की पुर्वजो द्बारा अवज्ञा,जो आज तक परछाई की तरह पीछा किये किसी बड़े परिवारिक सदस्य से बेवजह हानि ही देता है।
चन्द्र + राहु = माता,दादी,परदादी का पुर्वजो का इश्चा के विरुद्ब किया ।
एसा महत्वपुर्ण काम जो आज तक मानसिक तनाव देकर पजल व नर्वस किये बगैर ।
आज तक भी कदम आगे ही करने देने मे रोक करे।
मंगल + राहु = भाई की जायदाद या पैसा पुर्वजो से हड़पने पर,जो आजतक पराक्रम को दबाये ।
आराम ही आराम में दिलचस्पी देकर तन,मन के बल को तोड़ टालमटोल से जिन्दगी के मुकामो को निकाल देता है।
बुध + राहु = ऐसा पितृ दोष जो पुर्वजो द्बारा बहन,बेटी ओर बुआ को बनता सम्मान न देने और दुख पहुचाने से बनता है ।
जन्मकुंडली में पितृदोष के संकेत
वैदिक ज्योतिष में अनेक योगों का विचार किया जाता है। उदाहरणस्वरूप—
- नवम भाव या नवमेश का गंभीर रूप से पीड़ित होना।
- सूर्य का राहु अथवा केतु से अत्यधिक प्रभावित होना।
- पंचम भाव या पंचमेश पर पापग्रहों का प्रभाव।
- गुरु की दुर्बल स्थिति।
- राहु-केतु का महत्वपूर्ण त्रिकोण या धर्मभावों पर प्रभाव।
- सूर्य ग्रहण अथवा चंद्र ग्रहण जैसे योगों का जन्मकुंडली में विशेष प्रभाव।
इन संकेतों का निर्णय केवल एक योग देखकर नहीं किया जाता। संपूर्ण कुंडली, दशा, अंतरदशा, नवांश तथा अन्य वर्ग कुंडलियों का भी विचार आवश्यक होता है।
इस का परिणाम आज तक भी ऐन समय दिमाग को चककर देकर बुद्बि को नाश कर गलत फैसला देने से भविष्य धुमिल होने वाला योग निर्मित होता है।
गुरु + राहु = पुर्वजो द्बारा धार्मिक चन्दा,प्रोप्टी पर कब्जा या विद्बान,गुरु को धोखा या दुख देने से उतपन्न हुआ पितृ दोष है ।
जो आज तक भी ब्राहमण या गुरु पीर का आर्शीवाद पूरा नही होने देता।
शुक्र + राहु = किसी भी स्त्री या पत्नी भी हो लगातार सताये जाने से मिली बददुआ से जुड़ा पितृ दोष जिसका असर आज तक भी पत्नी या स्त्रियो से विरोधभास बिना कारण दिलाये रखता है ।
ओर नकारात्मक फल दिलाता है।
शनि + राहु = पुर्वजो से अधीनस्थ कर्मचारियो की अमानत में खयानत या मजदुरी का हक न देने से बनने वाला योग है ।
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जो आज भी नौकरों, मजदुरो से ठीक व्यहार से भी नुकसान ही देता है ओर ऐसे नुकसान देता है ।
जिसकी कल्पना ही नही की जा सकती।
पित्रदोष की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध एवं पितृदोष निवारण निवारण पूजन अवश्य करावे ।
ऊपर बताए गई अपनी बुरी आदत हो अपने बुरे कामों को सुधार लेना भी इन दोनों से बचने का बहुत बढ़िया साधन है...!
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कब से शुरू होंगे पितृपक्ष? जानें तिथि :
पितृ पक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे कर्म किए जाते हैं....!
इस समय पितर धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा रखते हैं...!
इस अवधि में पवित्र नदियों में स्नान करना और जरूरतमंदों को दान देना विशेष फलदायी माना जाता है...!
पितृ पक्ष में विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है और पितरों की कृपा जीवन में सुख - शांति लाती है....!
इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत को हो रही है....!
भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि बजे प्रारंभ होगी और इसी दिन रात बजे समाप्त हो जाएगी...!
ऐसे में से ही पितृ पक्ष की विधिवत शुरुआत मानी जाएगी....!
पितृ पक्ष का समापन को सर्व पितृ अमावस्या के दिन होगा, पितृ पक्ष की तारीखें निम्नलिखित हैं।
प्रश्नकुंडली से पितृबाधा का विचार:
जब किसी व्यक्ति की जन्मतिथि या जन्मसमय उपलब्ध न हो, तब प्रश्नकुंडली उपयोगी मानी जाती है।
यदि प्रश्नकुंडली में नवम भाव, अष्टम भाव, सूर्य, शनि, राहु अथवा केतु विशेष प्रकार से पीड़ित दिखाई दें तथा प्रश्नकर्ता लगातार पूर्वजों, रुकावटों, संतान, विवाह अथवा आर्थिक संकट से संबंधित प्रश्न करे, तब अनुभवी ज्योतिषी पितृसंबंधी बाधाओं का विचार कर सकता है।
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गोचर के ग्रहों का प्रभाव
गोचर में शनि, राहु, केतु, गुरु और सूर्य की विशेष भूमिका मानी जाती है।
जब गोचर का शनि जन्मकुंडली के सूर्य, नवम भाव अथवा पंचम भाव को प्रभावित करता है, तब पूर्वजों से जुड़े कर्मों का फल अधिक प्रबल होकर सामने आ सकता है।
राहु-केतु के गोचर के समय व्यक्ति को मानसिक अशांति, पारिवारिक विवाद, कार्यों में विलंब अथवा अचानक बाधाओं का अनुभव हो सकता है। यदि उसी समय शुभ गुरु की दृष्टि प्राप्त हो जाए तो कठिनाइयों में भी राहत मिलती है।
- पूर्णिमा श्राद्ध
- प्रतिपदा श्राद्ध
- द्वितीया श्राद्ध
- तृतीया श्राद्ध, चतुर्थी श्राद्ध
- पंचमी श्राद्ध, महा भरणी
- षष्ठी श्राद्ध
- सप्तमी श्राद्ध
- अष्टमी श्राद्ध
- नवमी श्राद्ध
- दशमी श्राद्ध
- एकादशी श्राद्ध
- द्वादशी श्राद्ध
- त्रयोदशी श्राद्ध, मघा श्राद्ध
- चतुर्दशी श्राद्ध
- सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध
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श्रापित दोष क्या है?
वैदिक ज्योतिष में जब शनि और राहु का विशेष संबंध बनता है अथवा अन्य गंभीर ग्रहयोग निर्मित होते हैं, तब कुछ ज्योतिषाचार्य उसे श्रापित दोष कहते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अवश्य ही किसी श्राप का शिकार है। यह केवल एक ज्योतिषीय संकेत है कि जीवन में कर्मफल अपेक्षाकृत कठिन रूप में अनुभव हो सकते हैं।
ऐसे व्यक्तियों को धैर्य, सत्य, सेवा, संयम और धर्मपालन पर विशेष बल देना चाहिए।
पितृ पक्ष का महत्व - पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, एक 16 दिनों की अवधि है जो हिंदू धर्म में पूर्वजों को समर्पित है....!
यह भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलता है....!
इस दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं....!
इन दिनों पितर पृथ्वी पर अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा लेकर आते हैं.....!
पितृदोष एवं श्रापित दोष के संभावित प्रभाव
यदि दोष सक्रिय हो तथा अन्य ग्रह भी प्रतिकूल हों, तो निम्न प्रकार की परिस्थितियाँ देखने को मिल सकती हैं—
- कार्यों में बार-बार विघ्न।
- विवाह में विलंब।
- संतान प्राप्ति में कठिनाई।
- आर्थिक अस्थिरता।
- परिवार में कलह।
- मानसिक चिंता।
- व्यवसाय में अचानक हानि।
- सम्मान में कमी।
- बिना कारण मुकदमे या विवाद।
- घर में धार्मिक वातावरण का अभाव।
ध्यान रहे कि ये फल निश्चित नहीं होते।
वास्तविक परिणाम संपूर्ण कुंडली के आधार पर ही निर्धारित किए जाते हैं।
जो संतान श्रद्धा भाव से उनका स्मरण और तर्पण करती है....!
उन्हें पितरों की कृपा प्राप्त होती है, इससे पितृ दोष दूर होता है और परिवार में सुख - शांति बनी रहती है....!
पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है....!
इस काल में गंगा स्नान, ब्राह्मण भोज और दान करना पुण्यदायी होता है....!
पितरों की संतुष्टि से वंश में समृद्धि, संतान सुख और कुल की उन्नति संभव होती है.....!
इस लिए पितृ पक्ष को श्रद्धा और आस्था से मनाना अत्यंत आवश्यक है।
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दान का वैदिक महत्व
ऋग्वेद और यजुर्वेद में दान को धर्म का आधार माना गया है।
दान का उद्देश्य केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि अहंकार का त्याग, करुणा, सेवा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना है।
सात्विक भाव से किया गया दान मन को पवित्र करता है और शुभ कर्मों की वृद्धि करता है।
किन वस्तुओं का दान श्रेष्ठ माना गया है?
- अन्नदान।
- जलदान।
- गौसेवा एवं गौचारा।
- वस्त्रदान।
- विद्यादान।
- औषधिदान।
- दीपदान।
- तिलदान।
- छाता, जूते एवं आवश्यक वस्तुओं का दान।
- निर्धनों की आर्थिक सहायता।
- पक्षियों एवं पशुओं के लिए भोजन।
दान सदैव योग्य पात्र, उचित समय और श्रद्धा के साथ करना चाहिए।
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पितृदोष शांति के प्रमुख उपाय
1. प्रतिदिन प्रातः सूर्यदेव को जल अर्पित करें।
2. अपने माता-पिता एवं बुजुर्गों का सम्मान करें।
3. अमावस्या के दिन पितरों का स्मरण करें।
4. श्राद्ध पक्ष में विधिपूर्वक श्राद्ध एवं तर्पण करें।
5. गौ, कुत्ते, पक्षियों और जरूरतमंदों को भोजन कराएँ।
6. पीपल वृक्ष की सेवा करें।
7. विष्णु सहस्रनाम एवं आदित्य हृदय स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
8. भगवान शिव एवं भगवान विष्णु की उपासना करें।
9. ब्राह्मण, संत एवं जरूरतमंद व्यक्तियों का सम्मान करें।
10. परिवार में प्रेम, सत्य और सदाचार बनाए रखें।
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श्रापित दोष की शांति के उपाय
- शनिवार को शनि देव की श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
- भगवान शिव का रुद्राभिषेक कराएँ।
- महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
- "ॐ नमः शिवाय" का नियमित जाप करें।
- गरीबों की सेवा करें।
- श्रमजीवियों का सम्मान करें।
- कौओं, काले कुत्तों एवं गौमाता को भोजन दें।
- क्रोध, अहंकार और असत्य से दूर रहें।
ज्येष्ठा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में - बड़े भाई के लिए अशुभ
द्वितीय पद में - छोटे भाई के लिए अशुभ
तृतीय पद में - माता के लिए अशुभ
चतुर्थ पद में - स्वयं के लिए अशुभ
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क्या नहीं करना चाहिए?
- माता-पिता का अपमान।
- पूर्वजों का अनादर।
- झूठ, छल और अन्याय।
- नशा और हिंसा।
- धर्म का उपहास।
- जरूरतमंदों की उपेक्षा।
- दान करके उसका प्रदर्शन।
- बिना योग्य आचार्य के भय फैलाने वाली बातों पर विश्वास।
पितरों की कृपा प्राप्त करने के सरल उपाय
प्रतिदिन अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
यदि संभव हो तो प्रत्येक अमावस्या पर अन्नदान करें।
घर में धार्मिक वातावरण बनाए रखें।
रामायण, श्रीमद्भागवत, गीता अथवा वेद मंत्रों का नियमित श्रवण करें।
परिवार में एकता और प्रेम बनाए रखना भी पितरों की प्रसन्नता का महत्वपूर्ण साधन माना गया है।
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क्या नहीं करना चाहिए?
- माता-पिता का अपमान।
- पूर्वजों का अनादर।
- झूठ, छल और अन्याय।
- नशा और हिंसा।
- धर्म का उपहास।
- जरूरतमंदों की उपेक्षा।
- दान करके उसका प्रदर्शन।
- बिना योग्य आचार्य के भय फैलाने वाली बातों पर विश्वास।
पितरों की कृपा प्राप्त करने के सरल उपाय
प्रतिदिन अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
यदि संभव हो तो प्रत्येक अमावस्या पर अन्नदान करें।
घर में धार्मिक वातावरण बनाए रखें।
रामायण, श्रीमद्भागवत, गीता अथवा वेद मंत्रों का नियमित श्रवण करें।
परिवार में एकता और प्रेम बनाए रखना भी पितरों की प्रसन्नता का महत्वपूर्ण साधन माना गया है।
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वैदिक ज्योतिष हमें भय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, कर्म, श्रद्धा और धर्म का मार्ग दिखाता है। जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली तथा ग्रहों के गोचर केवल संभावित संकेत प्रदान करते हैं; वे मनुष्य के पुरुषार्थ का स्थान नहीं लेते।
यदि किसी कुंडली में पितृदोष, श्रापित दोष अथवा अन्य ग्रहदोष के संकेत हों, तो सबसे पहले योग्य एवं अनुभवी वैदिक ज्योतिषाचार्य से संपूर्ण विश्लेषण कराना चाहिए।
उसके बाद शास्त्रसम्मत उपाय, सात्विक जीवन, माता-पिता एवं गुरु की सेवा, दान, जप, तप, श्राद्ध, तर्पण और सत्कर्मों को अपनाना चाहिए।
याद रखें — सच्चा दान वही है जो निष्काम भाव से किया जाए, सच्ची पूजा वही है जिसमें करुणा हो, और सच्ची पितृसेवा वही है जिसमें परिवार, समाज और धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया जाए।
जब मनुष्य श्रद्धा, सेवा, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलता है, तब ग्रहों की प्रतिकूलता भी धीरे-धीरे अनुकूल होने लगती है और पितरों की कृपा से जीवन में शांति, समृद्धि, स्वास्थ्य, यश और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
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Superb
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