ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) :

ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) : 


भारतीय ज्योतिष शास्त्र में २७  नक्षत्रों में ६  नक्षत्र गंड मूल नक्षत्रों की श्रेणी में माने गये हैं-

चंद्र मण्डल से एक लाख योजन ऊपर नक्षत्र मण्डल है।

अश्वनी,- श्लेषा,- मघा -,ज्येष्ठा,- मूल और रेवती।

उपरोक्त नक्षत्रों में उत्पन्न जातक – 

जातिका गंड मूलक कहलाते हैं....!

इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातक स्वयं व् कुटुम्बी जनों के लिये अशुभ माने गये हैं।

''जातो न जीवतिनरो मातुरपथ्यो भवेत्स्वकुलहन्ता ''

लेकिन पहले यह जानना परम आवश्यक है कि गंड मूल किसे कहते हैं....! 

गंड कहते हैं जहाँ एक राशि और नक्षत्र समाप्त हो रहे हो उसे गंड कहते हैं।

मूल कहते हैं –

जहाँ दूसरी राशि से नक्षत्र का आरम्भ हो उसे मूल कहते हैं।

राशि चक्र और नक्षत्र चक्र दोनों में इन ६ नक्षत्रो पर संधि होती है और संधि समय को जितना लाभकारी माना गया है....! 

उतना ही हानिकारक भी है...!

संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं....! 

इसी प्रकार गंड मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से दुष्परिणाम देने वाले होते हैं और राशि चक्र में यह स्थिति तीन बार आती है।

अब यह समझने का प्रयास करे कि कैसे इन ६ नक्षत्रो को गंड मूल कहा गया है।

१ - आश्लेषा नक्षत्र और कर्क राशि का एक साथ समाप्त होना और यही से मघा नक्षत्र और सिंह राशि का प्रारम्भ।

२ - ज्येष्ठा नक्षत्र और वृश्चिक राशि का समापन और यही से मूल नक्षत्र और धनु राशि का प्रारम्भ।

३ - रेवती नक्षत्र और मीन राशि का समापन और यही से अश्वनी नक्षत्र और मेष राशि का प्रारम्भ।

यहाँ तीन गंड नक्षत्र हैं....!  

आश्लेषा ,ज्येष्ठा ,रेवती।

और तीन मूल नक्षत्र हैं....! 

मघा, मूल और अश्वनी।

जिस प्रकार एक ऋतु का जब समापन होता है और दूसरी ऋतु का आगमन होता है....! 

तो उन दोनों ऋतुओं का मोड स्वास्थ्य के लिये उत्तम् नहीं माना गया है....! 

इसी प्रकार नक्षत्रों का स्थान परिवर्तन जीवन और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक माना गया है।

गण्डमूल / मूल  नक्षत्र  :

इस श्रेणी में ६ नक्षत्र आते है !

१. रेवती, २. अश्विनी, ३. आश्लेषा, ४. मघा, ५. ज्येष्ठा, ६. मूल  यह ६ नक्षत्र

मूल संज्ञक / गण्डमूल संज्ञक नक्षत्र होते है !

रेवती, आश्लेषा, ज्येष्ठा का स्वामी बुध है ! 

अश्विनी, मघा, मूल का स्वामी केतु है !

इन्हें २ श्रेणी में विभाजित किया गया है -

बड़े मूल व छोटे मूल। मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा बड़े मूल कहलाते है....! 

अश्वनी, रेवती व मघा छोटे मूल कहलाते है। 

बड़े मूलो में जन्मे बच्चे के लिए २७ दिन के बाद जब चन्द्रमा उसी नक्षत्र में जाये तो शांति करवानी चाहिए ऐसा पराशर का मत भी है....! 

तब तक बच्चे के पिता को बच्चे का मुह नहीं देखना चाहिए ! 

जबकि छोटे मूलो में जन्मे बच्चे की मूल शांति उस नक्षत्र स्वामी के दूसरे नक्षत्र में करायी जा सकती है....! 

अर्थात १० वे या १९ वे दिन में !

यदि जातक के जन्म के समय चंद्रमा इन नक्षत्रों में स्थित हो तो मूल दोष होता है ; 

इसकी शांति नितांत आवश्यक होती है !

जन्म समय में यदि यह नक्षत्र पड़े तो दोष होता है !

दोष मानने का कारण यह है की नक्षत्र चक्र और राशी चक्र दोनों में इन नक्षत्रों पर संधि होती है ( चित्र में यह बात स्पष्टता से देखि जा सकती है ) !

और संधि का समय हमेशा से विशेष होता है ! 

उदाहरण के लिए रात्रि से जब दिन का प्रारम्भ होता है तो उस समय को हम ब्रम्हमुहूर्त कहते है। 

और ठीक इसी तरह जब दिन से रात्रि होती है तो उस समय को हम गदा बेला / गोधूली
कहते है ! 

इन समयों पर भगवान का ध्यान करने के लिए कहा जाता है -

जिसका सीधा सा अर्थ है की इन समय पर सावधानी अपेक्षित होती है !

संधि का स्थान जितना लाभप्रद होता है उतना ही हानि कारक भी होता है !

संधि का समय अधिकतर शुभ कार्यों के लिए अशुभ ही माना जाता है !

गण्डमूल में जन्म का फल :

गण्डमूल के विभिन्न चरणों में दोष विभिन्न लोगो को लगता है....! 

साथ ही इसका फल हमेशा बुरा ही

हो ऐसा नहीं है  !

अश्विनी नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - पिता के लिए कष्टकारी

द्वितीय पद में - आराम तथा सुख केलिए उत्तम

तृतीय पद में - उच्च पद

चतुर्थ पद में - राज सम्मान

आश्लेषा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - यदि शांति करायीं जाये तो शुभ

द्वितीय पद में - संपत्ति के लिए अशुभ

तृतीय पद में - माता को हानि

चतुर्थ पद में - पिता को हानि

मघा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - माता को हानि

द्वितीय पद में - पिता को हानि

तृतीय पद में - उत्तम

चतुर्थ पद में - संपत्ति व शिक्षा के लिए उत्तम

ज्येष्ठा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - बड़े भाई के लिए अशुभ

द्वितीय पद में - छोटे भाई के लिए अशुभ

तृतीय पद में - माता के लिए अशुभ

चतुर्थ पद में - स्वयं के लिए अशुभ

मूल  नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - पिता के जीवन में परिवर्तन

द्वितीय पद में - माता के लिए अशुभ

तृतीय पद में - संपत्ति की हानि

चतुर्थ पद में - शांति कराई जाये तो शुभ फल

रेवती नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - राज सम्मान

द्वितीय पद में - मंत्री पद

तृतीय पद में - धन सुख

चतुर्थ पद में - स्वयं को कष्ट

अभुक्तमूल :

ज्येष्ठा की अंतिम एक घडी तथा मूल की प्रथम एक घटी अत्यंत हानिकर हैं....!

इन्हें ही अभुक्तमूल कहा जाता है, शास्त्रों के अनुसार पिता को बच्चे से ८ वर्ष तक दूर रहना चाहिए ! 

यदि यह संभव ना हो तो कम से कम ६ माह तो अलग ही रहना चाहिए ! 

मूल शांति के बाद ही बच्चे से मिलना चाहिए !

अभुक्तमूल पिता के लिए अत्यंत हानिकारक होता है !

यह तो था नक्षत्र गंडांत इसी आधार पर लग्न और तिथि गंडांत भी होता है।

लग्न गंडांत :- 

मीन - मेष, कर्क - सिंह, वृश्चिक - धनु लग्न की आधी - २ प्रारंभ व अंत की घडी कुल २४ मिनट लग्न गंडांत होता है !

तिथि गंडांत :- 

५, १०, १५  तिथियों के अंत व ६, ११, १ तिथियों के प्रारम्भ की २ - २ घड़ियाँ तिथि गंडांत है रहता है !

जन्म समय में यदि तीनों गंडांत एक साथ पड़ रहे है तो यह महा - अशुभ होता है।

नक्षत्र गंडांत अधिक अशुभ, लग्न गंडांत मध्यम अशुभ व तिथि गंडांत सामान्य अशुभ होता है....! 

जितने ज्यादा गंडांत दोष लगेंगे किसी कुंडली में उतना ही अधिक अशुभ फल कारक होंगे।

गण्ड का परिहार :

१.  गर्ग के मतानुसार

रविवार को अश्विनी में जन्म हो या सूर्यवार बुधवार को ज्येष्ठ, रेवती, अनुराधा, हस्त, चित्रा, स्वाति हो तो नक्षत्र जन्म दोष कम होता है !

२.  बादरायण के मतानुसार गण्ड नक्षत्र में चन्द्रमा यदि लग्नेश से कोई सम्बन्ध, विशेषतया दृष्टि सम्बन्ध न बनाता हो तो इस दोष में कमी होती है !

३. वशिष्ठ जी के अनुसार दिन में मूल का दूसरा चरण हो और रात में मूल का पहला चरण हो तो माता - पिता के लिए कष्ट होता है इसलिए शांति अवश्य कराये!

४. ब्रम्हा जी का वाक्य है की चन्द्रमा यदि बलवान हो तो नक्षत्र गण्डांत व गुरु बलि हो तो लग्न गण्डांत का दोष काफी कम लगता है !

५. वशिष्ठ के मतानुसार अभिजीत मुहूर्त में जन्म होने पर गण्डांतादी दोष प्रायः नष्ट हो जाते है ! 

लेकिन यह विचार सिर्फ विवाह लग्न में ही देखें, जन्म में नहीं !
 

निम्नलिखित विशेष परिस्थितियों में गण्ड या गण्डांत का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है ( लेकिन फिर भी शांति अनिवार्य है ) !

इन नक्षत्रों में जिनका जन्म हुआ हो तो उस नक्षत्र की शान्ति हेतु जप और हवन अवश्य कर लेनी चाहिए --

१ अश्वनी के लिये ५०००  मन्त्र जप।

२ आश्लेषा के लिये १०००० मन्त्र जप।

३ मघा के लिये १००००  मन्त्र जप।

४ ज्येष्ठा के लिये ५०००  मन्त्र जप।

५ मूल के लिये ५०००  मन्त्र जप।

६ रेवती के लिये५०००  मन्त्र जप।

इन नक्षत्रों की शान्ति हेतु ग्रह, स्व इष्ट, कुल देवताओं का पूजन ,रुद्राभिषेक तथा नक्षत्र तथा नक्षत्र के स्वामी का पूजन अर्चन करने के बाद दशांश हवन किसी सुयोग्य ब्राह्मण से अवश्य करवाए । 

શુભ રાજયોગ સંયોગ

શુભ રાજયોગ સંયોગ : 

શુભ રાજયોગ સંયોગ, આ 4 રાશિના જાતકો પર વરસી પડશે રૂપિયા :

શ્રી વૈદિક જ્યોતિષશાસ્ત્ર, શ્રી ખગોળશાસ્ત્ર, શ્રી ઋગ્વેદ અને શ્રી યજુર્વેદ અનુસાર જન્મકુંડળી, પ્રશ્નકુંડળી અને ગોચરના ગ્રહોથી બનતા શુભ રાજયોગનું મહત્ત્વ, નિયમો, ફળ અને ઉપાય 

પંચ રાજયોગનું નિર્માણ થવાથી મિથુન, કર્ક, કન્યા અને મીન રાશિના જાતકોને તેમનું ધારેલું પરિણામ પ્રાપ્ત થશે.

વૈદિક જ્યોતિષશાસ્ત્રમાં "રાજયોગ" અત્યંત શુભ અને પ્રભાવશાળી યોગ માનવામાં આવે છે. રાજયોગનો અર્થ માત્ર રાજા બનવો એવો નથી, 

પરંતુ જીવનમાં માન - સન્માન, પ્રતિષ્ઠા, સંપત્તિ, સુખ, સફળતા, ઉચ્ચ હોદ્દો, સારા સંબંધો, ધાર્મિક પ્રગતિ અને લોકપ્રિયતા પ્રાપ્ત થવી એવો પણ થાય છે. 

ઋગ્વેદ અને યજુર્વેદમાં સદ્કર્મ, સત્ય, યજ્ઞ, દાન અને ધર્મને જીવનના ઉન્નતિના મૂળ આધાર તરીકે દર્શાવવામાં આવ્યા છે. 


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જ્યોતિષશાસ્ત્રમાં રાજયોગ ત્યારે વધુ ફળદાયી બને છે જ્યારે વ્યક્તિના કર્મ, સંસ્કાર અને ઈશ્વર પ્રત્યેની શ્રદ્ધા પણ મજબૂત હોય.

જ્યોતિષશાસ્ત્રમાં ગ્રહો સમયાંતરે ગોચર કરતા રહે છે, જેના કારણે રાજયોગનું નિર્માણ થાય છે. આ રાજયોગના કારણે માનવ જીવન અને પૃથ્વી પર અસર થાય છે. 

જન્મકુંડળીમાં જ્યારે કેન્દ્ર ( ૧, ૪, ૭, ૧૦ ) અને ત્રિકોણ ( ૧, ૫, ૯ ) ભાવોના સ્વામી પરસ્પર શુભ સંબંધ સ્થાપિત કરે, યુતિ કરે અથવા એકબીજાની દૃષ્ટિમાં આવે ત્યારે શુભ રાજયોગ રચાય છે.

પ્રશ્નકુંડળીમાં પણ જો પ્રશ્ન સમયે શુભ ગ્રહો બળવાન હોય અને લગ્ન, નવમ, દસમો તથા એકાદશ ભાવ મજબૂત હોય તો કાર્યમાં સફળતા અને શુભ પરિણામની સંભાવના વધે છે.

700 વર્ષ પછી આ પંચ રાજયોગનો સંયોગ બની રહ્યો છે, જે 28 માર્ચના રોજ સર્જાશે. આ પાંચ રાજયોગ કેદાર, હંસ, માલવ્ય, ચતુષ્ચક્ર અને મહાભાગ્ય છે, જેની તમામ રાશિના જાતકો પર અસર થાય છે. 

ગોચરમાં ગુરુ, શુક્ર અને બુધ જેવા શુભ ગ્રહો જ્યારે જન્મકુંડળીના શુભ સ્થાનોમાંથી પસાર થાય અથવા જન્મલગ્ન, નવમ, દસમો કે એકાદશ ભાવને શુભ દૃષ્ટિ આપે ત્યારે રાજયોગના ફળ વધુ પ્રબળ બની શકે છે. 

જો ગોચરમાં શનિ અથવા ગુરુ કર્મસ્થાનને મજબૂત બનાવે અને દશા પણ અનુકૂળ હોય તો વ્યક્તિને નવી નોકરી, વ્યવસાયમાં વૃદ્ધિ, પ્રમોશન, સમાજમાં માન-સન્માન અને આર્થિક લાભ પ્રાપ્ત થઈ શકે છે.

જ્યોતિષ શાસ્ત્ર અનુસાર અનેક રાજયોગ એકસાથે બને છે, જેની તમામ રાશિઓ પર અદભુત અસર થાય છે. 


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શુભ રાજયોગના મુખ્ય નિયમો :


- કેન્દ્ર અને ત્રિકોણના સ્વામી વચ્ચે શુભ સંબંધ હોવો.

- લગ્નેશ બળવાન હોવો અને પાપગ્રહોથી ગંભીર રીતે પીડિત ન હોવો.

- નવમ ભાવ અને દસમો ભાવ મજબૂત હોવા.

- ગુરુ અને શુક્ર શુભ સ્થાનમાં હોવા.

- ચંદ્ર મનોબળ આપતો અને નિર્બળ ન હોવો.

- મહાદશા, અંતર્દશા અને ગોચર રાજયોગને સમર્થન આપતા હોવા.

- નવાંશ કુંડળીમાં પણ શુભ બળ પ્રાપ્ત થવું.


શુભ રાજયોગનું મહત્ત્વ :


શુભ રાજયોગ વ્યક્તિને માત્ર ધનવાન બનાવતો નથી પરંતુ સન્માનિત, જવાબદાર અને પ્રભાવશાળી બનાવે છે. 

આવા યોગ ધરાવનાર વ્યક્તિ પોતાના પ્રયત્નોથી જીવનમાં આગળ વધે છે. તેને યોગ્ય માર્ગદર્શન, સારા મિત્રો, સારા ગુરુ અને યોગ્ય સમય પર તક પ્રાપ્ત થાય છે. સમાજમાં તેની વાતને મહત્વ મળે છે અને લોકો વિશ્વાસ કરે છે.


રાજયોગના પ્રભાવથી સરકારી સેવા, રાજકારણ, શિક્ષણ, ન્યાયક્ષેત્ર, વેપાર, ઉદ્યોગ, કૃષિ, આધ્યાત્મિક ક્ષેત્ર અથવા સમાજસેવામાં વિશેષ સફળતા મળી શકે છે. 

ઘણીવાર વ્યક્તિને પિતૃ આશીર્વાદ, ગુરુકૃપા અને પરિવારનું સહયોગ પણ પ્રાપ્ત થાય છે.


રાજયોગના સંયોગથી મિથુન, કર્ક, કન્યા અને મીન આ 4 રાશિના જાતકોના સૌથી સારા દિવસો શરૂ થશે.


શુભ રાજયોગના ફળ :

જો રાજયોગ પૂર્ણ બળવાન હોય તો વ્યક્તિને નીચે મુજબના શુભ ફળ મળવાની પરંપરાગત માન્યતા છે:


- જીવનમાં સતત પ્રગતિ.

- ધન અને સંપત્તિમાં વધારો.

- માન-સન્માન અને લોકપ્રિયતા.

- સરકારી અથવા પ્રતિષ્ઠિત ક્ષેત્રમાં સફળતા.

- સારા સંતાન અને પરિવારનું સુખ.

- ઘર, વાહન અને જમીનનો લાભ.

- વિદેશ યાત્રા અથવા વિદેશથી લાભ.

- ધાર્મિક કાર્યમાં રસ.

- ગુરુજનો અને વડીલોનો આશીર્વાદ.

- મુશ્કેલ સમયમાં યોગ્ય માર્ગદર્શન મળવું.

- શત્રુઓ ઉપર વિજય.

- આત્મવિશ્વાસ અને નિર્ણયશક્તિમાં વધારો.


જો રાજયોગ નબળો હોય અથવા પાપગ્રહોની અસર વધુ હોય તો સફળતા મોડી મળી શકે છે, મહેનત વધારે કરવી પડે અથવા મળેલા અવસરનો સંપૂર્ણ લાભ ન મળી શકે.


પ્રશ્નકુંડળીમાં રાજયોગ :

પ્રશ્નકુંડળીમાં શુભ રાજયોગ દર્શાવે છે કે પૂછાયેલ કાર્ય સફળ થઈ શકે છે. જો લગ્નેશ અને કાર્યભાવના સ્વામી વચ્ચે શુભ સંબંધ હોય, ચંદ્ર બળવાન હોય અને ગુરુની શુભ દૃષ્ટિ મળે તો અટકેલા કામ આગળ વધે છે. 

લગ્ન, નોકરી, ધંધો, મિલકત, કોર્ટ કેસ અથવા અન્ય મહત્વપૂર્ણ પ્રશ્નોમાં સકારાત્મક સંકેતો મળી શકે છે.


ગોચરનું વિશેષ મહત્ત્વ :

ગોચર જન્મકુંડળીના રાજયોગને સક્રિય બનાવે છે. ઘણા લોકોની કુંડળીમાં સારો રાજયોગ હોવા છતાં યોગ્ય ગોચર પહેલાં તેના સંપૂર્ણ ફળ મળતા નથી. 

જ્યારે ગુરુ શુભ સ્થાનમાં આવે, શનિ કર્મફળને મજબૂત બનાવે અને દશા અનુકૂળ હોય ત્યારે રાજયોગનું પરિણામ સ્પષ્ટ રીતે દેખાવા લાગે છે.


મિથુન :   

મિથુન રાશિના જાતકોને પંચ રાજયોગનું પરિણામ એકસાથે પ્રાપ્ત થશે. બેરોજગારને રોજગાર પ્રાપ્ત થશે અને ધન પ્રાપ્ત થશે. 

ઓફિસમાં નવી જવાબદારીઓ આપવામાં આવશે. કર્મચારીઓને પ્રમોશન મળવાની સંભાવના જોવા મળી રહી છે. આર્થિક પરિસ્થિતિમાં સુધારો થવાની સંભાવના છે અને પારિવારિક જીવનમાં પણ સુધારો થશે.


કર્ક : 

કર્ક રાશિના જાતકો માટે હંસ અને માલવ્ય રાજયોગ શુભ સાબિત થશે. આ રાજયોગથી નસીબ સાથ આપશે અને ઈચ્છા અનુસાર પરિણામ પ્રાપ્ત થશે. બેરોજગારને નવી નોકરી મળશે. વિદ્યાર્થીઓ માટે હાલનો સમય ખૂબ જ શાનદાર રહેશે. 

કામ બાબતે અથવા બિઝનેસ માટે ટ્રાવેલ કરવું પડી શકે છે. વેપારી વર્ગ માટે હાલનો સમય ખૂબ જ સારો સાબિત થશે. જે લોકો રોકાણ ક્ષેત્રે જોડાયેલા છે, 

તે લોકોને નાણાંકીય લાભ થઈ શકે છે અને સમાજમાં માન તથા સમ્માનમાં પણ વધારો થશે.


કન્યા : 

કન્યા રાશિના જાતકો માટે પંચ રાજયોગ ખૂબ જ શુભ સાબિત થશે. તમને તમારા જીવનસાથીનો સહયોગ મળશે. તમારા જીવનસાથીની તરક્કી પણ થઈ શકે છે. 

ભાગીદારીમાં કામ કરવા માટે હાલનો સમય સર્વશ્રેષ્ઠ છે. અવિવાહિત લોકો માટે સંબંધની વાત આવી શકે છે. દાંપત્ય જીવનમાં સુધારો આવશે.


મીન : 

મીન રાશિના જાતકો માટે હંસ અને માલવ્ય રાજયોગથી શુભ સંકેતની સંભાવના જોવા મળી રહી છે. તમારું માન અને સમ્માન વધશે અને સાહસમાં વૃદ્ધિ થશે. 

બિઝનેસમાં સારી સફળતા મળી શકે છે. તમને આકસ્મિક નાણાંકીય લાભ થઈ શકે છો. નોકરિયાત વ્યક્તિઓ માટે આ રાજયોગ વરદાનરૂપ સાબિત થશે અને ઓફિસમાં તેમના કામની પ્રશંસા કરવામાં આવશે. 

જે પણ કામ રોકાયેલા છે, તે કામ ઝડપથી પૂર્ણ થશે. આત્મવિશ્વાસમાં વધારો થશે અને આરોગ્યમાં પણ સુધારો થશે.


શુભ રાજયોગને મજબૂત બનાવવાના પરંપરાગત ઉપાય :

- દરરોજ પ્રાતઃકાળે ભગવાન સૂર્યને જળ અર્પણ કરવું.

- માતા-પિતા અને ગુરુનું સન્માન કરવું.

- સત્ય, નૈતિકતા અને ધર્મના માર્ગે ચાલવું.

- જરૂરિયાતમંદોને દાન કરવું.

- ગાયને લીલું ઘાસ અથવા ચારો ખવડાવવો.

- પીપળા અથવા વડના વૃક્ષનું સન્માન અને સંરક્ષણ કરવું.

- ગુરુવારે ભગવાન વિષ્ણુ અથવા બૃહસ્પતિની ઉપાસના કરવી.

- "ૐ નમો ભગવતે વાસુદેવાય" અથવા "ૐ બૃહસ્પતયે નમઃ" મંત્રનો નિયમિત જપ કરવો.

- શનિવારે જરૂરિયાતમંદોની સેવા કરવી.

- અહંકાર, અસત્ય અને અન્યાયથી દૂર રહેવું.

- નિયમિત પ્રાર્થના, જપ, ધ્યાન અને સદાચારનું પાલન કરવું.


માત્ર એક રાજયોગ જોઈને આખું જીવનફળ નક્કી કરી શકાય નહીં. જન્મકુંડળીમાં ગ્રહબળ, દશા, અંતર્દશા, ગોચર, નવાંશ, અષ્ટકવર્ગ અને સમગ્ર કુંડળીનું વિશ્લેષણ કર્યા પછી જ યોગ્ય નિષ્કર્ષ પર પહોંચવું જોઈએ. 

વૈદિક જ્યોતિષમાં કર્મને સર્વોપરી સ્થાન આપવામાં આવ્યું છે. શુભ કર્મ, ઈશ્વર પ્રત્યેની ભક્તિ, સદાચાર અને પુરુષાર્થ સાથે જ રાજયોગનું શ્રેષ્ઠ ફળ પ્રાપ્ત થાય છે.


આથી, શુભ રાજયોગને ઈશ્વરની કૃપા અને સારા કર્મોના આશીર્વાદ રૂપે માનવો જોઈએ. 

નિયમિત ઉપાસના, સદાચાર, દાન, સેવા અને ધર્માચરણ સાથે વ્યક્તિ પોતાના જીવનમાં સુખ, સમૃદ્ધિ, માન - સન્માન અને આધ્યાત્મિક ઉન્નતિ તરફ આગળ વધી શકે છે.

!!!!! शुभमस्तु !!!


🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 

नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश 

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है इस के देवता कौन है जन्म कुंडली के अनुसार क्या फल मिलता है:

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र वैदिक ज्योतिष में *27 नक्षत्रों में से 25वां नक्षत्र* है।

विस्तार: यह नक्षत्र कुंभ राशि के 20° 00' से लेकर मीन राशि के 03° 20' तक फैला हुआ है। 

इसके पहले तीन चरण कुंभ राशि में और अंतिम चरण मीन राशि में आता है।



वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ? http://Sarswatijyotish.com



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अर्थ: 'पूर्वा' का अर्थ है पहले और 'भाद्रपद' का अर्थ है शुभ पद या भाग्यशाली पैर।

प्रतीक: इसके प्रतीकों में दो मुख वाला व्यक्ति, तलवार, या शव का अग्रभाग शामिल है, जो परिवर्तन, द्वैत और आध्यात्मिक अग्नि को दर्शाता है।

शासक ग्रह: इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह बृहस्पति (गुरु) है।

इसके देवता कौन हैं ?

पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अजैकपाद हैं।

अजैकपाद को भगवान शिव के रुद्र रूपों में से एक माना जाता है, जो एक पैर वाले अजन्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इन्हें आध्यात्मिक अग्नि, तीव्रता और तूफान से भी जोड़ा जाता है।

यह देवता जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और भ्रम के विनाश की शक्ति प्रदान करते हैं।

जन्म कुंडली के अनुसार क्या फल मिलता है ?

पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों में सामान्यतः निम्नलिखित विशेषताएं और फल देखे जाते हैं:

सकारात्मक फल और स्वभाव :

ईमानदार और सच्चे: ये जातक अपने कार्यों में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी को बहुत महत्व देते हैं।

दार्शनिक और ज्ञानी: गुरु के प्रभाव के कारण इनमें गहन समझ, बुद्धिमत्ता और दार्शनिक दृष्टिकोण होता है। 
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ये ज्योतिष, खगोल शास्त्र और विज्ञान में रुचि रख सकते हैं।

उदार और मददगार: ये स्वभाव से दयालु, उदार और शांतिप्रिय होते हैं, और दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।

प्रभावशाली वक्ता: इनमें उत्कृष्ट संचार कौशल और नेतृत्व की क्षमता होती है, जिससे वे दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं।

आध्यात्मिक विकास: इनमें आध्यात्मिक गहराई होती है और ये भौतिकता से परे सत्य की खोज में लगे रहते हैं।

साहसी: ये अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हैं और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल इच्छा रखते हैं।

चुनौतियाँ और अन्य फल :

अत्यधिक तीव्रता: इस नक्षत्र में *तीव्र और उग्र* ऊर्जा होती है, जिसके कारण कभी - कभी जातक भावुक या क्रोधित हो सकते हैं।

द्वैत का प्रदर्शन: इन में दो विपरीत व्यक्तित्वों का समन्वय दिख सकता है— एक ओर नम्र, सभ्य, तो दूसरी ओर हिंसक या विनाशकारी।
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पारिवारिक जीवन: कुछ मामलों में, इन जातकों को माता के स्नेह में कमी या उनसे वैचारिक मतभेद का सामना करना पड़ सकता है।

स्वतंत्रता: ये सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहना पसंद करते हैं।

करियर: ये शिक्षण, लेखन, अनुसंधान, समाज सुधारक या व्यापार जैसे क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं।

क्या आप पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र के किसी विशेष चरण ( पाद ) या उससे जुड़े किसी और पहलू के बारे में जानना चाहेंगे ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र का खगोल शास्त्र अनुसार सब से बड़ा गृह और नक्षत्र कौनसा है ?

वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र के अनुसार:
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सबसे बड़ा ग्रह :

वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ( गुरु ) को सबसे बड़ा ग्रह माना जाता है।

खगोलीय आधार: सौर मंडल में बृहस्पति वास्तव में सबसे बड़ा ग्रह है।

ज्योतिषीय महत्व: बृहस्पति ( गुरु ) को विशालता , विकास , ज्ञान , धर्म , और विस्तार का कारक माना जाता है। 

यह नवग्रहों में अत्यधिक शुभ ग्रह है और इन्हें देवगुरु भी कहा जाता है। 
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सब से बड़ा नक्षत्र :

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सभी 27 नक्षत्रों को आकाश में समान रूप से विभाजित किया गया है, और प्रत्येक नक्षत्र का चाप विस्तार $13^\circ 20'$ होता है। 

इस हिसाब से कोई भी नक्षत्र दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं होता है।

हालाँ कि, एक अतिरिक्त नक्षत्र है जिसे अभिजीत नक्षत्र कहा जाता है, जिसे कभी - कभी गणना में शामिल किया जाता है।

नक्षत्रों का विस्तार: सभी 27 नक्षत्रों में से प्रत्येक का विस्तार $13^\circ 20'$ है, जो कुल $360^\circ$ के राशिचक्र को पूरा करता है।

अभिजीत नक्षत्र: यह उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के अंतिम भाग और श्रवण नक्षत्र के शुरुआती भाग के बीच आता है। 

यह एक छोटा नक्षत्र है, जो केवल लगभग $4^\circ 14'$ का होता है, और यह मुख्य 27 नक्षत्रों के समान नहीं है।

इस लिए, यदि 'सबसे बड़ा' से तात्पर्य 'सबसे अधिक चाप विस्तार' से है, तो सभी 27 नक्षत्रों का विस्तार समान है।

वैदिक ज्योतिष शास्त्र और वैदिक खगोल शास्त्र के अनुसार सब से बड़ा तारा कौनसा है ?

यह प्रश्न आधुनिक खगोल विज्ञान और वैदिक ज्योतिष/खगोल शास्त्र के बीच अंतर के कारण जटिल है।

आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार सबसे बड़ा तारा आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड में ज्ञात सबसे बड़ा तारा है:

स्टीफेंसन 2 - 18 : यह एक लाल महा दानव तारा है। 

कुछ समय पहले तक यूवाई स्कूटी को सबसे बड़ा माना जाता था, लेकिन नए शोध के अनुसार स्टीफेंसन 2 - 18 ज्ञात तारों में सबसे बड़ा है। 

इसका आकार इतना विशाल है कि यदि इसे सूर्य के स्थान पर रखा जाए, तो इस का घेरा शनि ग्रह की कक्षा को भी पार कर जाएगा।
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वैदिक ज्योतिष/खगोल शास्त्र का दृष्टिकोण :

वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र में, "सबसे बड़ा तारा" की अवधारणा मुख्य रूप से आकार के बजाय महत्व , चमक , या दृष्टिगत उपस्थिति पर आधारित होती थी, क्योंकि उस समय दूरबीनें उपलब्ध नहीं थीं।

सूर्य : पृथ्वी के सबसे निकटतम तारा होने के कारण, सूर्य वैदिक ज्योतिष में सबसे महत्वपूर्ण खगोलीय पिंड है, जिसे नवग्रहों का राजा माना जाता है। 

इसे अक्सर आत्मा, शक्ति और जीवन का कारक माना जाता है।

लुब्धक या मृगव्याध : इसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में सिरियस ए कहा जाता है। 

यह रात के आकाश में सबसे चमकीला तारा है।

इस की चमक और महत्व के कारण वैदिक खगोल शास्त्र में इसका विशेष स्थान है, जहाँ इसे शिकारी तारामंडल के साथ जोड़ा जाता है। 

3. अगस्त्य तारा : इसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में कैनोपस कहा जाता है। 

यह रात के आकाश में दूसरा सबसे चमकीला तारा है। 

इस का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में समुद्र मंथन और ऋषि अगस्त्य से संबंधित है, जो इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है, खासकर दक्षिणी भारत के ज्योतिष और खगोल विज्ञान में।

चूंकि आधुनिक वैज्ञानिक मापन के आधार पर स्टीफेंसन 2 - 18 सबसे बड़ा है, इस लिए वैदिक ग्रंथों में सीधे तौर पर इसका उल्लेख होना संभव नहीं है।



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वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र का क्या महत्व है ?


वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। 


यह 27 नक्षत्रों में से 19वां नक्षत्र है और इसका संबंध जड़ से है, जो किसी भी चीज़ के आधार या केंद्र को दर्शाता है।

मूल नक्षत्र से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें और इसका महत्व इस प्रकार है:
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मूल नक्षत्र का परिचय :

राशि विस्तार: यह नक्षत्र धनु राशि में $0^{\circ}00^{\prime}$ से $13^{\circ}20^{\prime}$ तक फैला हुआ है।

प्रतीक: एक साथ बंधी हुई जड़ों का गुच्छा या शेर की पूंछ। 

यह गहराई में जाने, सत्य को खोजने और पुरानी चीजों को उखाड़ फेंकने का प्रतीक है।

स्वामी ग्रह : इस नक्षत्र का स्वामी केतु है, जो आध्यात्मिकता, वैराग्य, और गहन अनुसंधान से जुड़ा है।

अधिष्ठात्री देवी : इस की अधिष्ठात्री देवी निरृति हैं, जिन्हें विनाश, विघटन और परिवर्तन की देवी माना जाता है। 

हालाँकि, यह विनाश केवल नकारात्मक नहीं है, बल्कि यह नई शुरुआत और सत्य की स्थापना के लिए अनावश्यक या मिथ्या चीजों को हटाने का कार्य करता है।
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ज्योतिषीय महत्व और प्रभाव :

1. गहन अनुसंधान और सत्य की खोज :

मूल का अर्थ 'जड़' होता है, इस लिए इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक हर चीज़ की तह तक जाने वाले , जिज्ञासु और सत्य की खोज करने वाले होते हैं।

इन में पुरानी मान्यताओं और भ्रमों को उखाड़ फेंकने की जबरदस्त शक्ति होती है, जिससे आध्यात्मिक या बौद्धिक परिवर्तन आता है।

2.  व्यक्तित्व :

ये जातक अक्सर साहसी, दृढ़ निश्चयी, और महान प्रशासक होते हैं।

केतु के प्रभाव के कारण इनमें एक मजबूत आध्यात्मिक गहराई और अंतर्ज्ञान होता है।

वे स्वतंत्र विचार वाले और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक केंद्रित होते हैं।

3.  गंडमूल' दोष की अवधारणा :

पारंपरिक ज्योतिष में, मूल नक्षत्र को गंडमूल नक्षत्रों में से एक माना जाता है ( अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती )।

ऐसी मान्यता है कि इन नक्षत्रों में बच्चे का जन्म होना, विशेष रूप से कुछ चरणों में, बच्चे के माता - पिता या स्वयं के लिए कुछ शुरुआती कष्ट या संघर्ष ला सकता है, जिसे 'मूल दोष' कहा जाता है।

हालांकि, आधुनिक और उन्नत ज्योतिषियों का मानना है कि यह दोष स्थायी नहीं होता और उचित मूल शांति पूजा या कर्मकांड से इसके नकारात्मक प्रभावों को शांत किया जा सकता है। 

यह नक्षत्र महान सफलता और आध्यात्मिक उत्थान भी देता है।

4.  परिवर्तन और मुक्ति :

निरृति और केतु के प्रभाव के कारण, मूल नक्षत्र विघटन और परिवर्तन का प्रतीक है। 

यह जीवन के अंत से जुड़ा है, जो नई शुरुआत का अग्रदूत है और आत्मा को मुक्ति की ओर मार्गदर्शन करता है।

संक्षेप में, मूल नक्षत्र एक शक्तिशाली और तीव्र नक्षत्र है जो जीवन में गहरे परिवर्तन, सत्य की खोज और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करता है।

क्या आप मूल नक्षत्र के उपाय या शांति पूजा के बारे में जानना चाहेंगे ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग कैसे बनता है ?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में किसी स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग का निर्माण कई ग्रहों और भावों की विशेष स्थितियों और उनके आपसी संबंधों से होता है। 

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ज्योतिष केवल संभावनाओं को इंगित करता है, न कि किसी व्यक्ति के चरित्र का निश्चित निर्धारण करता है, क्योंकि अंतिम आचरण व्यक्ति के संस्कार और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

व्यभिचारी योग बनाने वाले मुख्य ग्रह और भाव निम्नलिखित हैं :


व्यभिचारी योग के प्रमुख कारक ग्रह वैदिक ज्योतिष शास्त्र में वासना, आकर्षण, और अनैतिक संबंधों के लिए कुछ ग्रहों को प्रमुखता से देखा जाता है:


शुक्र : प्रेम, कामवासना, भोग - विलास और वैवाहिक सुख का मुख्य कारक ग्रह है। 

इस का पीड़ित होना या पाप ग्रहों से संबंध बनाना इस योग को प्रबल करता है।

मंगल : उत्साह, कामुकता, आक्रामकता और शारीरिक ऊर्जा का कारक है। 

शुक्र के साथ इसका संबंध अत्यंत कामुकता को दर्शाता है।

राहु : अपारंपरिक संबंध, वर्जित चीजों के प्रति आकर्षण, भ्रम और गुप्त संबंधों का कारक है। 

शुक्र और राहु का योग इस योग को अत्यंत बल देता है।

शनि : गुप्तता, अलगाव और कभी - कभी अनैतिक आचरण को भी बढ़ावा देता है, विशेषकर जब यह राहु या मंगल के साथ हो।

चन्द्रमा : मन और भावनाओं का कारक है। 

यदि चन्द्रमा पीड़ित हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो, तो मन की चंचलता बढ़ती है।
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व्यभिचारी योग के प्रमुख भाव :


जन्म कुंडली के कुछ भावों को विशेष रूप से प्रेम, विवाह और कामवासना से संबंधित माना जाता है, जिन्हें काम त्रिकोण कहा जाता है:


तृतीय भाव : इच्छाएँ, साहस और गुप्त प्रेम संबंधों का भाव।


पंचम भाव : प्रेम, रोमांस और पहले के संबंधों का भाव।

सप्तम भाव : विवाह, जीवनसाथी और सार्वजनिक संबंधों का भाव। 

सप्तम भाव या इसके स्वामी का पीड़ित होना विवाह में अस्थिरता लाता है।

अष्टम भाव : गुप्तता, रहस्यों और अनैतिक/अचानक होने वाली घटनाओं का भाव। 

इस भाव में पाप ग्रहों का प्रभाव गुप्त संबंधों का संकेत हो सकता है।

द्वादश भाव : शयन सुख और गुप्त शत्रुओं का भाव।

व्यभिचारी योग बनाने वाले मुख्य ज्योतिषीय संयोजन 

स्त्री की कुंडली में व्यभिचारी योग बनाने वाले कुछ विशिष्ट संयोजन निम्नलिखित हैं:

शुक्र और मंगल का संबंध:

शुक्र और मंगल का एक साथ सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होना।

शुक्र और मंगल का एक - दूसरे को दृष्टि देना या एक - दूसरे की राशियों में होना ( नवांश कुंडली में)।
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राहु का प्रभाव:


राहु का सप्तम भाव में होना, खासकर यदि यह चन्द्रमा या शुक्र से संबंधित हो।


राहु और शुक्र की युति होना, विशेषकर वृश्चिक, मेष, तुला या मिथुन राशि में।


राहु का काम त्रिकोण (3, 7, 11) या द्वादश भाव में होना।

अन्य महत्वपूर्ण योग:

सप्तम भाव के स्वामी का राहु, केतु, शनि या मंगल जैसे पाप ग्रहों के साथ युति होना और पीड़ित होना।

बुध और शुक्र का सप्तम, अष्टम या दशम भाव में होना।

शनि, मंगल और शुक्र का सप्तम भाव में युति या दृष्टि संबंध।

कुंडली में लग्न या लग्नेश का कमजोर होना और पाप ग्रहों से दृष्ट होना, जिससे व्यक्ति का चरित्र कमजोर होता है।

नोट: किसी भी एक योग के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र का योगों की प्रबलता, गुरु जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि, नवांश कुंडली में ग्रहों की स्थिति और व्यक्ति की चल रही दशा को देखकर ही किसी संभावना का आकलन करते हैं। 

यदि गुरु की शुभ दृष्टि इन योगों पर हो, तो अनैतिक आचरण की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏


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