मिथुन संक्रांति : अच्छे नंबर से बच्चे होंगे पास :-

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जय द्वारकाधीश

मिथुन संक्रांति , अच्छे नंबर से बच्चे होंगे पास : -


मिथुन संक्रांति :


सूर्य जब मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो इस घटना को मिथुन संक्रांति कहा जाता है। 

सूर्य 15 जून को वृष राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। 

ज्‍योतिष के साथ ही धार्मिक मान्‍यताओं में भी मिथुन संक्रांति का विशेष महत्‍व होता है। 





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ज्‍योतिषीय मान्‍यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य भगवान की पूजा करने से सूर्य से संबंधित दोष दूर होते हैं और आपके जीवन में सुख शांति बढ़ती है। 

इस दिन दान पुण्‍य करने का भी शास्‍त्रों में विशेष महत्‍व माना गया है। 

मिथुन संक्रांति को लेकर मासिक धर्म से भी जुड़ी मान्‍यता काफी प्रचलित है। 

इस दिन सिलबट्टे की पूजा की भी परंपरा है।

मिथुन संक्रांति क्‍या है ?

मिथुन संक्रांति को मौसम की दृष्टि से भी बहुत खास माना जाता है। 

इस दिन के बाद से सौर मंडल में भी काफी बड़ा बदलाव आता है। 

इसके बाद से वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है। 

इस दिन सूर्य वृषभ राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं। 

इस दिन को देश के अलग - अलग राज्‍यों में अलग - अलग तरीके से मनाया जाता है।

मिथुन संक्रांति पर सिलबट्टे की पूजा क्‍यों की जाती है ?

मिथुन संक्रांति प्रमुख रूप से महिलाओं का त्‍योहार है। 

इस पर्व को महिलाएं नाच गाकर और खुशियों के साथ मनाती हैं। 

इस पर्व में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है और सिलबट्टे को भूदेवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। 

इस दिन सिलबट्टे को को अच्‍छे से साफ करके रख दिया जाता है और आने वाले चार दिनों तक सिलबट्टे का प्रयोग नहीं किया जाता है। 

इस दिन महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए पूजा करती हैं। 

श्रृंगार करती हैं मेंहदी लगाती हैं। बरगद के पेड़ पर झूला डालकर अपनी सखियों के साथ यह त्‍योहार मनाती हैं।

ऐसे की जाती है सिल बट्टे की पूजा :

मिथुन संक्रांति का पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है और इस दिन सिलबट्टे को साफ - सुथरा करके उसको दूध और जल से स्‍नान करवाया जाता है। 

उसके बाद सिल बट्टे पर सिंदूर और चंदन लगाया जाता है। 

फिर फूल और हल्‍दी चढ़ाकर उसकी पूजा की जाती है।

मिथुन संक्रांति पर मासिक धर्म को लेकर मान्‍यता :

मिथुन संक्रांति की कथा के अनुसार, जिस प्रकार से महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है उसी प्रकार से सृष्टि के आरंभ में धरती माता को भी शुरुआती 3 दिनों तक मासिक धर्म हुआ था। 

मासिक धर्म को ही मातृत्‍व सुख का कारक माना जाता है। 

इस लिए ऐसी मान्‍यता है कि मिथुन संक्रांति से लेकर अगले 3 - 4 दिन तक धरती माता मासिक धर्म में रहती हैं। 

इस लिए सिलबट्टे को भूदेवी का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है। 

इस दौरान सिल बट्टे का प्रयोग खाना बनाने में नहीं किया जाता है।

इस तरह करें सूर्य की पूजा : -

मिथुन संक्रांति पर सूर्य की पूजा का भी विशेष महत्‍व माना गया है। 

इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्‍नान करें और सूर्य को प्रणाम करें। 

ऊं घृणि सूर्याय नम: मंत्र का जप करें। 

उसके बाद सूर्य को अर्घ्‍य दें। 

तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें रोली और लाल फूल डाल लें। 

उसके बाद सूर्य को अर्घ्‍य दें। 

उसके बाद पूर्व दिशा में मुख करके ऊं घृणि सूर्याय नम: मंत्र का 108 बार जप करें।

अच्छे नंबर से बच्चे होंगे पास, करें ये उपाई : -


आपका बच्चा तमाम प्रयासों के बाद भी याद किया हुआ भूल जाता है और इस वजह से नंबर कम आ रहे हैं...! 

तो बतौर अभिभावक यह आपका कर्तव्य है कि आप अपने बच्चे की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दें ! 

और उसकी कमियों को पहनचानकर उन्हें दूर करने में उसकी मदद करें। 

इस के साथ ही ज्योतिष विज्ञान में कुछ ऐसे उपाय भी बताए गए हैं! 

जिनको आजमाकर आप अपने बच्चे की आने वाली परीक्षा में अच्छे अंक लाने में मदद कर सकेंगे। 

राशि के अनुसार आजमाएं ये उपाय:-
 
मेष -

यदि आपके बच्चे को पढ़ते वक्त नींद आने लगती है या वो एकाग्रचित होकर नहीं पढ़ पा रहा है!

तो उसे पूर्व दिशा की ओर मुख करके पढ़ने बैठाएं। 

पढ़ने के लिए बैठाने से पहले से उसे पांच बार! 

ओम गं गणपतये नमः मंत्र का उच्चारण करवाएं।

वृष : -
 
इस राशि के बच्चों को परीक्षा में भेजने से पहले गुड़ खिलाकर भेजें। 

शनिवार और मंगलवार के दिन सूर्यास्त के समय हनुमानजी के मंदिर में दीपक जलाएं।
 
मिथुन : -
 
इस राशि के बच्चों का मुख उत्तर दिशा की ओर कर के उन्हें पढ़नें बैठाएं ! 

और घर से निकलते वक्त गणेश चालीसा पढ़कर भगवान को लड्डू का भोग लगाकर निकलें।
 
कर्क : -

वैसे तो पढ़ने वाले सभी बच्चों को मां सरस्वती की पूजा करनी चाहिए !

लेकिन कर्क राशि के बच्चों के लिए यह अधिक फलदायी है। 

ये बच्चे पढ़ाई शुरू करने से पहले 21 बार ‘ओम ऐं सरस्वत्यै’ नमः का जप करें। 

सूर्योदय के वक्त जल चढ़ाएं।
 
सिंह : -
 
सिंह राशि के बच्चों का मन यदि पढ़ाई में नहीं लगता, बेचैनी और घबराहट होती है ! 

तो अपना मुख पूर्व दिशा की ओर करके बैठें। 

पढ़ने से पहले अपनी मेज पर तुलसी के पांच पत्ते तोड़कर रखें और इन पत्तों को रोजाना बदलते रहें। 

परीक्षा के दिन पीले रंग के वस्त्र पहनकर जाएं।
 
कन्या : -
 
इस राशि के बच्चे सुबह स्नान के बाद सरस्वती माता की स्तुति करें और मां को मिश्री का प्रसाद अवश्य चढ़ाएं। 

उत्तर दिशा की ओर मुख करके पढ़ें और परीक्षा के दिन हरे या नीले रंग के वस्त्र धारण करें।








तुला : -
 
तुला राशि के बच्चों के हाथ से गाय को गुड़ रखकर रोटी खिलवाएं। 

इस के अलावा रात में सोते समय इनके तकिए के नीचे थोड़ा सा नमक पुडि़या में बांधकर रख दें!

इस से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होगी और बच्चे का मन पढ़ाई में लगने लगेगा।
 
वृश्चिक : -
 
इस राशि के बच्चे सुबह स्नान के पश्चात हनुमान चालीसा का पाठ करें। 

परीक्ष के दिन लाल या गुलाबी रंग के साफ कपड़े पहनकर जाएं।
 
धनु : -
 
पढ़ने के वक्त मन में भटकाव उत्पन्न हो तो इन बच्चों को मां सरस्वती और गुरुओं का ध्यान करना चाहिए। 

इस राशि के बच्चों को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पढ़ने बैठना चाहिए।
 
मकर : -
 
पढ़ाई करते समय उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और मां सरस्वती की वंदना करने के बाद पही पठन कार्य शुरू करें। 

परीक्षा के लिए घर से जाते समय हनुमान जी के पैरों से सिंदूर लेकर तिलक करें।
 
कुंभ : -
 
पढ़ते समय अपना मुख दरवाजे की ओर न रखें और जिस विषय को पढ़ने बैठें सिर्फ उसे ही साथ में रखें। 

पढ़ने से पहले श्री कृष्ण का ध्यान करें। परीक्षा के लिए घर से निकलते समय गुड़ खाएं।
 
मीन : -
 
पढ़ाई में मन लगाने के लिए माथे पर चंदन का तिलक लगाएं ! 

इससे दिमाग में शीतलता आएगी और साथ ही मन भी एकाग्र होकर पढ़ने में लगेगा। 

घर से परीक्षा के लिए जाने से पहले गणेश स्तुति करना न भूलें। 

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परात्मानमेकं जगद् बीजमाद्यं
निरीहं  निराकारमोंकारवेद्यम्।

यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ।।

न भूमिर्न चापो न वहिर्न् वायु-
र्न  चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।

न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेशो
न यस्याऽस्ति मूर्तिस्त्त्रिमूर्तिं तमीडे।।

आप परमात्मास्वरूप,अद्वितीय, जगत् के आदि कारण, इच्छा रहित ! 

निराकार तथा प्रणव ( ॐ कार ) द्वारा ही वेद्य हैं,आप ही जगतके उत्पादक !

पालक एवं लीन ( लय ) करने वाले हैं !

ऐसे महादेव जी का मैं भजन करता हूं।

जो न पृथ्वी,जल,अग्नि, वायु हैं तथा जो न आकाश एवं तन्द्रा और निद्रा हैं !

उसी प्रकार जो न ग्रीष्म हैं न शीत हैं और न जिनका कोई देश है !

ऐसे मूर्ति रहित त्रिमूर्ति ( सत्व,रज,तम ) रूप शिवजी की मैं स्तुति करता हूं।
      
    || जय शिव ओंकारा ||

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा,
 वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् । 

धर्म: स नो यत्र न सत्यमस्ति,
 सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति   ।। 
          
भावार्थ  : -

वह सभा सभा नहीं है, जहां वृद्ध न हों,

वे वृद्ध वृद्ध नहीं हैं, जो धर्म की बात नहीं कहते !

वह धर्म धर्म नहीं है, जिसमें सत्य न हो

और वह  सत्य सत्य नहीं है,  जो छल का सहारा लेता हो ।

जय देवि विशालाक्षि जय सर्वान्तरस्थिते
मान्ये पूज्ये जगद्धात्रि सर्वमङ्गलमङ्गले
त्वत्कटाक्षावलोकेन पद्मभू: सृजते जगत्।।

वैकुण्ठ: पालयत्येव हर: संहरते क्षणात्
 शचीपतिस्त्रिलोक्याश्च शासको भवदाज्ञया।।

हे देवि! 

हे विशालनयने! हे समस्त प्राणियों के भीतर निवास करने वाली! आपकी जय हो। 

हे मान्ये! 

हे पूज्ये! 

हे जगद्धात्रि! 

हे सर्वमंगलमंगले! आपके कटाक्षपात्र मात्र से पद्मयोनि ब्रह्मा  जगत् की सृष्टि करते हैं, ' भगवान् विष्णु पालन करते हैं तथा रुद्र क्षण भर में संहार करते हैं ! 

शचीपति इन्द्र आपकी ही आज्ञा से तीनों लोकों पर शासन करते हैं।' 

देवि! 

आपको नमस्कार है।

    || जय हो मां विंध्यवासिनी ||

नमो  नमस्तेऽच्युत  चक्रपाणे
  नमोऽस्तु  ते  माधव  मीनमूर्ते।

लोके भवान्  कारुणिको मतो में
   त्रायस्य  मां  केशव  पापबन्धात्।।

अच्युत! चक्रपाणि! आपको बारम्बार नमस्कार है। 

मीनमूर्तिधारी ( मत्स्यावतारी ) माधव! आपको नमस्कार है। 

मैं आपको लोकों में दयालु मानता हूं। 

केशव! 

मुझे पापबन्धन से मुक्त करें।'

 || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: ||
 🙏🏻🙏🏻
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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ज्योतिष में मंगल की व्याख्या...!

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ज्योतिष में मंगल की व्याख्या....!

ज्योतिष में मंगल की व्याख्या


नवग्रहो में मंगल को सेनापति का पद मिला हुआ है।

यह बल, पराक्रम और पुरुषत्व का प्रमुख कारक ग्रह है।

कुंडली के तीसरे, छठे भाव का और छोटे भाई का यह कारक है।

इसका मेष और वृश्चिक राशि पर अधिकार होता है।






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मेष राशि में यह मूलत्रिकोण बली होता है तो वृश्चिक राशि में स्वराशि जितना बल पाता मतलब मूलत्रिकोण राशि से कुछ कम बल प्राप्त करता है।

जिन जातको की कुण्डली में मंगल मजबूत और शुभ प्रभाव लिए होता ऐसे जातक निडर और साहसी होते है।

भूमि, मकान का अच्छा सुख मंगल की शुभ और बली स्थिति प्रदान करती है...! 

कुंडली के बली चोथे भाव या बली चतुर्थेश से बली मंगल का सम्बन्ध अच्छा मकान सुख देने वाला होता है।

पुलिस, मिलिट्री, सेना जैसी जॉब में उच्च पद इसी मंगल के शुभ प्रभाव से मिलती है।

स्त्रियों की कुंडली में यह मांगल्य का कारक है...!

संतान आदि के सम्बन्ध में भी गुरु की तरह स्त्रियों की कुंडली में मंगल से भी विचार किया जाता है।

कुंडली के 10वें भाव में यह दिग्बल प्राप्त करके शुभ फल देने वाला होता है...! 

एक तरह से योगकारक होता है।

कर्क लग्न में पंचमेश और दशमेश होकर व् सिंह लग्न में चतुर्थेश, नवमेश केन्द्रेश त्रिकोणेश होकर प्रबल योगकारी और शुभ फल देने वाला होता है।








सहन शक्ति का कारक भी यही है....! 

जिन जातको का मंगल अशुभ होता है वह कायरो की तरह व्यवहार करते है।

साहस और पराक्रम की ऐसे जातको में कमी रहती है।

मेष, कर्क, सिंह, धनु, मीन लग्न में इसकी मजबूत और शुभ स्थिति होना इन लग्न की कुंडलियो के लिए आवश्यक होता है।

केंद्र त्रिकोण भाव में यह अपनी उच्च राशि मकर, मूलत्रिकोण राशि मेष और स्वराशि वृश्चिक में होने पर रूचक नाम का बहुत सुंदर योग बनाता है....! 

जिसके फल राजयोग के सामान होते है कुण्डली के अन्य ग्रह और योग शुभ होने से रूचक योग की शुभता और ज्यादा बढ़ जाती है।

शरीर में यह खून, मास, बल आदि का यह कारक है।

जिन जातको के लग्न में मंगल होता है ऐसे जातको का चेहरा लालिमा लिए हुए होता है...! 

ऐसे जातको की शारीरिक स्थिति भी मजबूत होती है।

चंद्र के साथ मंगल का लक्ष्मी योग बनाता है...! 

जिसके प्रभाव से मंगल के शुभ फलो में ओर ज्यादा वृद्धि हो जाती है।

चंद्र के बाद सूर्य गुरु के साथ इसका सम्बन्ध बहुत ही शुभ रहता है...! 

उच्च अधिकारी बनने के लिए मंगल के साथ गुरु सूर्य का सम्बन्ध दशम भाव से होने पर सफलता प्रदान करता है।

शुक्र बुध के साथ इसका सम्बन्ध सम रहता है तो शनि राहु केतु के साथ सम्बन्ध होने पर मंगल के फल नेगेटिव हो जाते है।

शनि के साथ सम्बन्ध होने पर अशुभ विस्फोटक योग बनाता है तो राहु केतु के साथ अंगारक योग।

मंगल की शुभता में वृद्धि करने के लिए ताबे का कड़ा, ताबे की अंगूठी, पहनना इसके शुभ प्रभाव में वृद्धि करता है।

मेष, कर्क, सिंह, मीन लग्न में मूंगा पहनना मंगल की शुभता और बल में वृद्धि के लिए शुभ फल देने वाला होता है।

कभी भी नीच ग्रह का रत्न नही पहनना चाहिए यदि वह योगकारी होकर भी नीच है तब भी ऐसे ग्रह का रत्न पहनना कभी शुभफल देने वाला नही होता।

मांगलिक कुंडली विचार

लग्ने व्यये च पाताले, जामित्रे चाष्ट कुजे।
कन्या जन्म विनाशाय, भर्तुः कन्या विनाशकृत।।

अर्थात जन्म कुंडली में लग्न स्थान से 1, 4, 7, 8, 12 वें स्थान में मंगल हो तो ऐसी कुंडली मंगलिक कहलाती है। 

श्लोकानुसार जिस ब्यक्ति की कुंडली में मंगल उपर्युक्त  भावों में हो तो उसे विवाह के लिए मांगलिक वर - वधू ही खोजना चाहिए। 

इसके अलावा यदि पुरुष या स्त्री की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12 वें भाव में शनि, राहु, सूर्य, मंगल हो तो कुंडली का मिलान हो जाता है। 

यदि एक की कुंडली में मंगल उपरोक्त  भावों में स्तिथ हो तथा दूसरे की कुंडली में नहीं हो तो इस प्रकार के जातको के विवाह संबंध नहीं होने चाहिए। 

यदि अनजाने में भी कोर्इ विवाह संपन्न हो जाते हैं तो या तो ऐसे संबंध कष्टकारी होते हैं या फिर दोनो में मृत्यु योग की भी संभावना हो सकती है। 

अत: दोष का निवारण भली भाँति कर लेना चाहिए। 





कुंडली मे भावानुसार मंगल के फल

प्रथम भाव : 

कार्य सिद्धि में विघ्न, सिर में पीडा, चंचल प्रवृति, व्यक्तित्व पर प्रभाव, स्वभाव, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, समृद्धि, बुद्धि।

द्वितीय भाव : 

पैतृक सम्पति सुख का अभाव, परिवार, वाणी, निर्दयी प्रवृति, जीवन साथियो के बीच हिंसा, अप्राकृतिक मैथुन ।

चतुर्थ भाव :  

परिवार व भाइयो से सुख का अभाव, घरेलू वातावरण, संबंधी, गुप्त प्रेम संबंधी, विवाहित जीवन में ससुराल पक्ष और परिवार का हस्तक्षेप, आनुवांशिक प्रकृति।

सप्तम भाव : 

वैवाहिक जीवन प्रभावित, पतिपत्नी का व्यक्तित्व, जीवन साथी के साथ रिश्ता, काम शक्ति, जीवन के लिए खतरा, यौन रोग।

अष्टम भाव : 

मित्रों का शत्रुवत आचरण, आयु, जननांग, विवाहेतर जीवन, अनुकूल उद्यम करने पर भी मनोरथ कम, मति।

द्वादश भाव : 

विवाह, विवाहेतर काम क्रीड़ा, क्राम क्रीड़ा या योन संबंधो से उत्पन्न रोग, काम क्रीड़ा कमजोरी, शयन सुविधा, शादी में नुकसान, नजदीकी लोगो से अलगाव, परस्पर वैमनस्य, गुप्त शत्रु।

यदि किसी जातक को मंगल ग्रह के विपरीत परिणाम प्राप्त हो रहे हों तो उनकी अशुभता को दूर करने के लिए निम्र उपाय करने चाहिएं-

मंगल के देवता हनुमान जी हैं, अंत: मंदिर में लड्डू या बूंदी का प्रसाद वितरण करें। 

हनुमान चालीसा, हनुमत - स्तवन, हनुमद्स्तोत्र का पाठ करें। 

विधि - विधानपूर्वक हनुमान जी की आरती एवं शृंगार करें। 

हनुमान मंदिर में गुड़ - चने का भोग लगाएं।

* यदि संतान को कष्ट या नुक्सान हो रहा हो तो नीम का पेड़ लगाएं...! 

रात्रि सिरहाने जल से भरा पात्र रखें एवं सुबह पेड़ में डाल दें।

* पितरों का आशीर्वाद लें। 

बड़े भाई एवं भाभी की सेवा करें, फायदा होगा।

* लाल कनेर के फूल, रक्त चंदन आदि डाल कर स्नान करें।

* मूंगा, मसूर की दाल, ताम्र, स्वर्ण, गुड़, घी, जायफल आदि दान करें।

* मंगल यंत्र बनवा कर विधि - विधानपूर्वक मंत्र जप करें और इसे घर में स्थापित करें।

* मंगल मंत्र ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाया नम:।’ 

मंत्र के 40000 जप करें या कराएं फिर दशांश तर्पण, मार्जन व खदिर की समिधा से हवन करें।

अन्य मंत्र: ''ऊँ अं अगारकाय नम: 

* मूंगा धारण करें।

मंगलवार के व्रत एक समय बिना नमक बाल भोजन से अथवा फलाहार रह कर करें।

अन्य उपाय : हमेशा लाल रुमाल रखें, बाएं हाथ में चांदी की अंगूठी धारण करें...! 

कन्याओं की पूजा करें और स्वर्ण न पहनें, मीठी तंदूरी रोटियां कुत्ते को खिलाएं...! 

ध्यान रखें, घर में दूध उबल कर बाहर न गिरे।
।।।।।।  हर हर महादेव हर ।।।।।
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

हस्तरेखा द्वारा विवाह रेखा की स्थिति का विश्लेषण/समय सूचक AM और PM का उद्गम :

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
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हस्तरेखा द्वारा विवाह रेखा की स्थिति का विश्लेषण...! 

हस्तरेखा द्वारा विवाह रेखा की स्थिति का विश्लेषण/समय सूचक AM और PM का उद्गम :

🔸ऐसा माना जाता है कि यदि यह रेखा छोटी और हल्की है तो व्यक्ति को अपने रिश्तों की परवाह नहीं है। 

कमजोर रेखा अल्प समय के लिए प्रेम संबंध होना व्यक्त करती है।

🔸हथेली में विवाह रेखा का चौड़ा होना विवाह के प्रति कोई उत्साह न होने का संकेत है।

🔸विवाह रेखा का अंत में कई भागों में बंट जाना अत्यंत दुखी दांपत्य जीवन का संकेत है।

🔸अंत में दोमुंही विवाह रेखा भी दांपत्य जीवन को कलहयुक्त बनाती है।

🔸दोमुंही विवाह रेखा की एक शाखा हृदय रेखा को स्पर्श करे तो जातक का प्रेम संबंध उसकी साली से हो सकता है। 







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रेखा की ऐसी स्थिति यदि स्त्री के हाथ में हो तो उसका संबंध देवर या जेठ से होने की संभावना रहती है, लेकिन इसमें पर्वतों की स्थिति से ही यह तय होगा।

🔸विवाह रेखा के उद्गम पर द्वीप का चिन्ह वैवाहिक सुख में विघ्न डालता है जबकि विवाह रेखा पर एक से अधिक द्वीप दांपत्य सुख से वंचित रखता है। 

द्वीप का होना प्रेम में बदनामी होने का संकेत भी है।

🔸 विवाह रेखा में झुकाव हो और उस झुकाव पर क्रॉस बना हो तो पति या पत्नी की आकस्मिक मृत्यु हो सकती है या प्रेम संबंध शीघ्र समाप्त हो सकते हैं।

🔸विवाह रेखा पर काला धब्बा इस बात की सूचना है कि जातक को पत्नी सुख का अभाव रहेगा।

🔸यदि यह रेखा गहरी और लंबी होती है तो व्यक्ति अपने रिश्तों को महत्व देता है और वह सचमुच में ही प्रेम करता है। 

🔸खंडित विवाह रेखा प्रेम या दांपत्य जीवन में विरह का संकेत है। 

यदि यह रेखा दोनों ही हाथों में खंडित है तो विरह के प्रबल योग है। 

खंडित विवाह रेखा जीवन के मध्य काल में पत्नी वियोग देती है। 

यह योग पत्नी की मृत्यु होने या तलाक होने से बनता है।

🔸विवाह रेखाओं का अधिक होना इस बात का संकेत है कि विवाह पूर्व या विवाह बाद उतने से लोगों से प्रणय संबंध बगेंगे। 

यदि बुध क्षेत्र पर दो सामानांतर पुष्ट रेखाएं विद्यमान हैं तो दो विवाह होने का संकेत है।



    

      
♦️विवाह रेखा और अन्य रेखाएं ♦️

🔸यदि विवाह रेखा को कोई अन्य रेखा काट रही हो या आड़ी रेखा से विवाह रेखा का कट रही हो तो यह वैवाहिक सुख में नुकसान के संकेत हैं।

🔸विवाह रेखा से प्रारंभ होकर कोई पतली रेखा हृदय रेखा की ओर जाए तो दोनों का साथ जीवनभर बना रहता है।

🔸यदि विवाह रेखा का झुकाव कनिष्ठा की ओर हो तो जीवनसाथी की मृत्यु उससे पूर्व होती है।

🔸यदि विवाह रेखा हृदय रेखा को क्रॉस कर दे अर्थात चीरती हुई निकल जाए तो यह विवाह विच्छेद का संकेत है।

🔸ऐसा भी कहते हैं कि विवाह रेखा नीचे की ओर जाकर हृदय रेखा को छुए तो पत्नी की मृत्यु हो जाती है और यदि यह रेखा नीचे झुककर हृदय रेखा में मिल जाए तो यह दांपत्य जीवन में अलगाव की सूचक है।

🔸जिन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा हृदय रेखा के नीचे होती है उनका विवाह प्राय: नहीं होता है। दो हृदय रेखाएं होने पर भी विवाह नहीं होता है।

🔸यदि विवाह रेखा कनिष्ठा अंगुली के दूसरे पोर तक चढ़े तो व्यक्ति को पत्नी सुख की प्राप्ति नहीं होती है। 

🔸भाग्य रेखा और मस्तक रेखा में यव का चिन्ह हो, भाग्य रेखा टेढ़ी हो, विवाह रेखा ऊपर की ओर मुड़ी हो तो व्यक्ति विवाह नहीं करना चाहता है।

🔸कहते हैं कि यदि विवाह रेखा मस्तक रेखा को स्पर्श करे तो पति अपनी पत्नी की हत्या कर देता है।

🔸यदि विवाह रेखा आयु रेखा को काटे या विवाह रेखा, भाग्य रेखा एवं मस्तक रेखा परस्पर मिले तो दांपत्य दुख एवं कलह से परिपूर्ण रहता है। 

🔸महिला की हथेली में विवाह रेखा जंजीरनुमा हो तो उसका चरित्र सही नहीं माना जाता और उसका स्वभाव क्रूरता एवं निष्ठुरता का होता है।

🔸स्त्री के हाथ में विवाह रेखा पर नक्षत्र हो, विवाह रेखा झुककर हृदय रेखा को स्पर्श करे....! 

विवाह रेखा पर काला धब्बा हो और विवाह रेखा हृदय रेखा से मिलकर बारीक रेखाएं दोनों रेखाओं को काटे तो वह विधवा हो सकती है।

🔸विवाह रेखा सूर्य रेखा को स्पर्श कर नीचे की ओर जाए तो अनमेल विवाह होता है।

🔸मंगल रेखा से आकर कोई रेखा विवाह रेखा को स्पर्श करे तो विवाह सुख नहीं मिलता।
पर्वत और विवाह रेखा

🔸यदि बुध पर्वत पर विवाह रेखा कई भागों में बंट जाए तो कई बार सगाई टूटती है।

🔸चंद्र पर्वत से कोई रेखा आकर विवाह रेखा से मिले तो व्यक्ति भोगी एवं कामुक होता है।

🔸शुक्र पर्वत से कोई रेखा निकलकर विवाह रेखा को स्पर्श करे तो वैवाहिक जीवन दुखमय हो जाता है। 

🔸 यदि विवाह रेखा सूर्य पर्वत की ओर जाए तो व्यक्ति का प्रेम संबंध ऊंचे घराने की स्त्रियों से होता है।

🔸यदि विवाह रेखा से कोई रेखा निकलकर शुक्र पर्वत को स्पर्श कर ले तो पत्नी में चारित्रिक दोष हो सकता है।

🔸विवाह रेखा पर फोर्क हो, शुक्र पर्वत उभार लिए हुए हो, मस्तक रेखा जंजीरनुमा हो...! 

शुक्र मुद्रिका दोहरी हो एवं कटी हो तथा हृदय रेखा में यव हो तो जातक रसिकमिजाजी होता है।

!! जय श्री कृष्ण !!

समय सूचक AM और PM का उद्गम :

समय सूचक AM और PM का उद्गम भारत ही था। 

पर हमें बचपन से यह रटवाया गया....! 

विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है।

AM 👉 एंटी मेरिडियन (ante meridian)

PM 👉 पोस्ट मेरिडियन (post meridian)

एंटी यानि पहले, लेकिन किसके? 

पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके ?

यह कभी साफ नहीं किया गया....! 

क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।

अध्ययन करने से ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को अपनी आंधियों में उड़ा दिया और अब, सब कुछ साफ - साफ दृष्टिगत है।

कैसे? 

देखिये..!

AM 👉 आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam मरतान्दास्या

PM 👉 पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya

सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसीको गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस 'मतलब' को नहीं इंगित करते जो कि वास्तव में है।

आरोहणम् मार्तण्डस्य Arohanam Martandasaya यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।

पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasaya यानि सूर्य का ढलाव।

दिन के बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।
बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।

पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।

!! जय श्री कृष्ण !!

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

जन्म कुंडली मे ह्दय रोग का ज्ञान./कुंडली मे लग्नानुसार जाने राजयोग..?

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

जन्मकुंडली से ह्दय रोग का ज्ञान ?....


जन्मकुंडली से ह्दय रोग का ज्ञान


हमारी जन्म कुंडली के सही गणना से ही पहले मालूम हो जाता के ह्दय रोग होगा कि नही होगा 
हमारा हिन्दू शर्म के श्रीमद्भागवत में भी दिया गया है कि...!




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साधवो हदयं महामं साधूनां हदयं तवह्म ।
मदन्यते न जानन्ति नाहं तैंन्यो मनागति ।।

सज्जन मेरा ह्दय है में उनका ह्दय हु । 
वह मेरे सिवाय किसी को नही जानते ओर में जनक सिवाय किसी को नही जानता ।।

ये श्रीमद्भागवत का 9 में अध्याय में 4 / 88 का श्लोक में दिया हुवा है...!
 
ह्दय रोग आज का आधुनिक जीवन शैली का ही एक सर्व सामान्य भाग ओर सर्व लौकिक भाग कहा जाता है । 

आज के आधुनिक समय मे सामान्य से सामान्य घर का परिवार का टेन्शन, मानसिक तनाव , व्यपारिक आर्थिक टेन्शन , मार्किट में नाम कीर्ति को अंखण्ड रखने की स्पर्धा का भी टेन्शन , अखाध - अपाच्य भोजन ओर शरीर को न मिलने वाले व्यायाम से शरीर की कम क्रिया शक्ति के कारण बेडोलता हो जाना एवं धूम्रपान या मधपान का सेवन इस रोग की ओर ले जाते है ।

जन्म कुंडली के आधार पर तो पक्का मालूम हो ही जाता है कि जातक को कौनसा टेन्शन है ? 

जातक कौनसा सेवन का नशा धूम्रपान कर रहे है ? 

कितना समय से जातक को धूम्रपान ओर नशा का सेवन की लात लगी चुकी है ? 

कौनसा द्वारा जातक को ऐसा रास्ता पर लाये गए है ?







जन्म कुंडली के दष्टि से देखा जाय तो जातक का कुंडली का चतुर्थ भाव वक्ष स्थल का सूचना करेगा जब पंचम भाव जातक का ह्दय का सूचना करेगा । 

सूर्य ह्दय का कारक होता है ।

यदि चतुर्थेश या पंचम स्थान छठा स्थान अष्टम स्थान एवं बारमा स्थान पर सूर्य स्थित हो चन्द्र या सूर्य निर्बल हो चतुर्थेश या पंचमेश क्रूर ग्रहों से दृष्टि या युति तो जातक को ह्दय रोग से पीड़ित होता है ।

यदि शुभ नवमशो से युक्त हो तो रोग की गंभीरता कम भी हो शक्ति है । 

जातक के लग्न स्थान और सप्तम या अष्टम स्थान पर क्रूर ग्रह होता तो जातक को परिवार टेन्शन ज्यादा रहता है ।

जातक के जीवन मे दुतियेश षस्टेश ओर बारमा स्थान पर क्रूर ग्रह हो या सूर्य चन्द्र क्रूर ग्रह की युति में हो तो जातक का मित्र ही जातक का शत्रु बनकर जातक को नशा धूम्रपान का सेवन में चढ़ा देगा ।

:::: दाखला तरीके :::
जन्म तारीख 16।/04/1964
जन्म समय : 10:38
लग्न : 03
सूर्य : 01
चन्द्र : 02
मंगल :12
बुध : 01
गुरु : 01
शुक्र : 02
शनि : 11
राहु : 03
केतु : 09

इस जातक को पहले मित्रो ने साथ सहकार भी दिया बाद जैशा जातक खुद का नाम पर काम दाम यश कीर्ति कामाई करने लगा तो वही मित्रो इसका शत्रु बनकर इसको शराब ध्रूमपान सबाब के नशा में चढ़ा दिया क्योंकि इसका कुंडली पर मंगल गुरु की युति प्रति युति बन रहा है । 

गुरु सूर्य बुध का साथ बिराजमान है वही लग्नेश बुध इसको नाम दाम यश कीर्ति सब कुछ हाशिल आसानी से करवा भी देगा । 

वही मित्र भी शत्रु का भाग रूप से जातक का ही पैसे मौज मस्ती में मशहूर बनाकर जातक का पूर्ण जीवन बिगाड़ देने में कोई कशर कम नही रखेगे...!
 
जब इस जातक के ऊपर मार्किट में आर्थिक सक्रमण बठ जाती है तब दोस्त पूरा तरह दुश्मनी निभा रहा होता है उसमे जातक को ह्दय रोग का शिकार बन जाता है ।

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कुंडली मे लग्नानुसार जाने राजयोग :

जन्म कुंडली में नौवें और दसवें स्थान का बड़ा महत्त्व होता है।  

नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। 

कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृधि प्राप्त करता है। 

कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है और अच्छा भाग्य, अच्छे कार्य व्यक्ति से करवाता है।

अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। 

राज योग एक ऐसा योग होता है जो प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष राजा के समान सुख प्रदान करता है। 

इस योग को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार की सुख - सुविधाओं को प्राप्त करने वाला होता है।

ज्योतिष की दुनिया में जिन व्यक्तियों की कुण्डली में राजयोग निर्मित होता है, वे उच्च स्तरीय राजनेता, मंत्री, किसी राजनीतिक दल के प्रमुखया कला और व्यवसाय में खूब मान - सम्मान प्राप्त करते हैं।

राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। 

कुंडली की लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है।

जिस व्यक्ति की कुंडली में राजयोग रहता है उस व्यक्ति को हर प्रकार की सुख - सुविधा और लाभ भी प्राप्त होते हैं। 

इस लेख के माघ्यम से आइए जानें कि कुण्डली में राजयोग का निर्माण कैसे होता है-

मेष लग्न - मेष लग्न में मंगल और ब्रहस्पति अगर कुंडली के नौवें या दसवें भाव में विराजमान होते हैं तो यह राजयोग कारक बन जाता है।

वृष लग्न - वृष लग्न में शुक्र और शनि अगर नौवें या दसवें स्थान पर विराजमान होते हैं तो यह राजयोग का निर्माण कर देते हैं।

इस लग्न में शनि राजयोग के लिए अहम कारक बताया जाता है।

मिथुन लग्न - मिथुन लग्न में अगर बुध या शनि कुंडली के नौवें या दसवें घर में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले जातक का जीवन राजाओं जैसा बन जाता है।

कर्क लग्न - कर्क लग्न में अगर चंद्रमा और ब्रहस्पति भाग्य या कर्म के स्थान पर मौजूद होते हैं तो यह केंद्र त्रिकोंण राज योग बना देते हैं। 

इस लग्न वालों के लिए ब्रहस्पति और चन्द्रमा बेहद शुभ ग्रह भी बताये जाते हैं।

सिंह लग्न - सिंह लग्न के जातकों की कुंडली में अगर सूर्य और मंगल दसमं या भाग्य स्थान में बैठ जाते हैं तो जातक के जीवन में राज योग कारक का निर्माण हो जाता है।

कन्या लग्न - कन्या लग्न में बुध और शुक्र अगर भाग्य स्थान या दसमं भाव में एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।

तुला लग्न - तुला लग्न वालों का भी शुक्र या बुध अगर कुंडली के नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाता है तो इस ग्रहों का शुभ असर जातक को राजयोग के रूप में प्राप्त होने लगता है।

वृश्चिक लग्न - वृश्चिक लग्न में सूर्य और मंगल, भाग्य स्थान या कर्म स्थान ( नौवें या दसवें ) भाव में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले का जीवन राजाओं जैसा हो जाता है। 

यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि अगर मंगल और चंद्रमा भी भाग्य या कर्म स्थान पर आ जायें तो यह शुभ रहता है।

धनु लग्न - धनु लग्न के जातकों की कुंडली में राजयोग के कारक, ब्रहस्पति और सूर्य माने जाते हैं। 

यह दोनों ग्रह अगरनौवें या दसवें घर में एक साथ बैठ जायें तो यह राजयोग कारक बन जाता है।

मकर लग्न - मकर लग्न वाली की कुंडली में अगर शनि और बुध की युति, भाग्य या कर्म स्थान पर मौजूद होती है तो राजयोग बन जाता है।

कुंभ लग्न - कुंभ लग्न वालों का अगर शुक्र और शनि नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।

मीन लग्न - मीन लग्न वालों का अगर ब्रहस्पति और मंगल जन्म कुंडली के नवें या दसमं स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाते हैं तो यह राज योग बना देते हैं।

पंडित प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
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ब्रह्मचार्य ओर जन्म कुंडली...? ( भाग 2 )/ज्योतिष - ग्रह - नक्षत्र :

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

ब्रह्मचार्य ओर जन्मकुंडली ... ?.
   ( देखे विभाग 2 के ऊपर ) ज्योतिष - ग्रह - नक्षत्र :


ब्रह्मचार्य का यौगि की ही साधना नही है । 

पूर्व के समय मे देखे तो ब्राह्मण ओर क्षत्रिय सहित सब लोग गुरुकुल के आश्रम में ही रहकर पठाई साधना कर रहे थे । 

पूर्व के समय मे जब लड़का 5 साल से 6 साल का हो जाता तो सीधा गुरुकुल में ही उसको शस्त्र ओर शास्त्र दोनो विधाओ से निपुणता करनी पड़ती थी ।

ब्रह्मचार्य के बिना तो कोई भी किसी भी कार्य सिद्ध होने का संभव ही नही है । 

पूर्व के समय मे तो स्वास्थ्य का लाभ के लिये , बल - बुद्धि का विकास करने का  लाभ के लिये , विद्याभ्यास के लिये , शस्त्रभ्यास के लिये तथा योगाभ्यास के लिये भी ब्रह्मचार्य की आवश्यकता बहुत होती थी । 



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उसमे भी कुटुबिक सुख शांति उत्तम संतान की स्वर्ग की प्राप्ति सिद्धियों की प्राप्ति , अन्तःकरण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति --- सब कुछ ब्रह्मचार्य से ही संभव है । 

ब्रह्मचार्य के बिना कुछ नही हो शकता ।

सांख्ययोग , ज्ञानयोग , भक्तियोग , राजयोग ओर हठयोग  सभी साधनाओ में ब्रह्मचार्य की आवश्यकता होती है । 

जन्म कुंडली मे भी देखो तो ऐसा ग्रहयोग भी बन जाता है कि माता पिता उसका संतानों का शादी लग्न के प्रसंग भी बहुत धाम धूम से करवा देगा । 
लेकिन जातक का मन ही संसार मे लगता ही नही होता । 

तो सीधा ब्रह्मचार्य सन्यासी की ओर ले कर जाता है ।

:::: दाखला तरीके ::::::

लग्न :07
सूर्य : 06 
चन्द्र : 08
मंगल : 08
बुध : 06 
गुरु : 11
शुक : 05
शनि :  05 
राहु  : 12
केतु  : 06

इस कुंडली के आधार पर देखे तो सप्तमेश मालिक द्वितीयेश में चन्द्र के साथ स्वग्रही है । 

शादी लग्न करने के बाद भी इसका मन संसार के तरह आकर्षित नही होता । 

पंचमेश गुरु और अगियारमे शुक्र शनि की युति हठ योग , सांख्ययोग , ज्ञानयोग ओर भक्तियोग देता है !

जब बारमा स्थान पर बिराजमान सूर्य केतु ओर बुध की युति अंखड पूर्ण राजयोग कर रहा है कि सन्यासी जीवन मे जीवन गुजारने के बाद भी परिपूर्ण अच्छा तरह से राज कर शकते है ।

ब्रह्मचार्य सन्यासी योग वाले लोगो को सब का साथ एक ही जैसा व्यवहार ओर एक ही जैसा वर्तन करते दिखाई देगा वो कभी उसका मुह से ऐसा बोलेगा के ये मेरा ये तेरा उसका लिये सब एक समान ही होगा ।






अमुक अमुक जातकों की जन्मकुंडली बताती है । 

कि जातक पूर्ण संन्यासी बनेगा या नहीं । 

क्योंकि आज के समय मे तो पत्नी कोर्ट कचहरी के चक्कर मे फसा देगा तो जातक सन्यास की ओर चला भी जाएगा । 

लेकिन उसका मन तो संसार की ओर ही ज्यादा आकर्षित रहेगा तो वो कभी पूर्ण सन्यासी ब्रह्मचार्य योग का पालन तो कर ही नही शकते ।

हिंदू धर्म में आश्रम व्यवस्था के अनुसार ही प्रत्येक मनुष्य को अपना कर्म करना होता है। 

लेकिन कई लोगों के मन में बचपन से ही संन्यास की तीव्र लालसा होती है। 

ऐसा क्यों होता है कि कई लोग बचपन से संन्यासी, वैरागी बनना चाहते हैं। 

वैदिक ज्योतिष की मानें तो कोई जातक संन्यासी बनेगा या नहीं, इसका पता उसकी जन्मकुंडली के ग्रहों को देखकर लगाया जा सकता है।

:::: दाखला तरीके ;;;;;

लग्न : 01
सूर्य  : 06
चन्द्र  : 02
मंगल  : 02
बुध  :  07
गुरु  : 02
शुक्र  : 07
शनि  : 10
राहु  : 11
केतु  : 02

इस जातक को न उसका कुटुंब वालो का सहकार के न हेतु मित्रो का कोई सहकार उसमे भी इस जातक  को उसका पत्नी और पत्नी के मायके वालों का टेन्शन कोर्ट कचहरी पोलिस वालो की परेशानी के हिसाब से सन्यास ब्रह्मचार्य  की ओर चल तो गया । 

लेकिन अमुक समय मे सन्यासी रहकर भी बहुत सुख सुविधाओं प्राप्त कर भी लिये । 

बाद फिर उसका मन ब्रह्मित हो गया पूर्ण तरह का अंखड ब्रह्मचार्य का पालन तो हो ही नही शकता । 

उसका मन भष्ट बन गया मिथुन चेष्ठाओं में मन लग गया । 

क्योंकि ब्रह्मचार्य का पालन करने में तो बहुत प्रकार का मन संकोचित करके रखना पड़ता है । 

सब प्रकार के मैथुन का नाम ही ब्रह्मचार्य होता है । 
शास्त्रों में ब्रह्मचार्य को त्याग करने का बहुत प्रकार का मैथुन का नाम दिया होता है ।

स्मरण , श्रवण , कीर्तन , प्रेक्षक , केली , शुंगर , गुह्यभाषण , ओर स्पर्श इतना प्रकार का मैथुन होता है वो सब के ऊपर ही विजय प्राप्त कर शकता है वही होता है अंखड पूर्ण ब्रह्मचार्य । 

आज के समय मे लोगो को सन्यासी बनना अच्छा जरूर लगता है लेकिन जैसा थोड़ाक वर्ष या समय प्रसार हो जाएगा तो किसी न किसी के साथ कुछ न कुछ प्रकार की चेष्ठा करने के बिना रह नही शकता । 

बाद टीवी पेपरों में चमकता शितारो जैसा चमकता रहेगा ।

:::: दाखला तरीके :::::

लग्न : 03
सूर्य  : 03
चन्द्र : 02
मंगल : 02
बुध  : 10
गुरु  : 09
शुक्र : 03
शनि : 08
राहु  : 07
केतु  : 01

इस जातक की कुंडली मे भी जातक को सन्यासी तो जरूर बना देता लेकिन बाद दुराचारी का कंलक भी जल्दी ही लग जाता है ।

इस जातक का कुंडली  के कुछ योग ऐसे भी होते हैं जब व्यक्ति संन्यासी होते हुए भी छल,कपट में लिप्त होता है या सब कुछ छोड़ने् के बाद भी विरक्त जीवन में दुर्भाग्य को भोगता है । 

कुंडली में संन्यास योग के ग्रहों का साथ सूर्य,शनि और मंगल दे रहे हो तो व्यक्ति के ऊपर पत्नी सहित कुटुबिक मानसिक टेन्शन से घबराकर वैराग्य अपना लेता है।

यदि कुंडली में यदि दशमेश बली न होकर सप्तम स्थान पर स्थित हो तो व्यक्ति के दुराचारी छद्म सन्यासी होने की सम्भावना बन जाती है । 

यदि बली शनि केंद्र में या त्रिकोण हो और चन्द्रमा जिस राशि में हो उसका स्वामी दुर्बल होकर शनि को देखता हो तो व्यक्ति सन्यासी होते हुए भी दुर्भाग्य का जीवन जीता है ।

जो आठ प्रकार का मैथुन की चेष्ठाओं छोड़ शकता है वही सन्यासी ब्रह्मचार्य बन शकता है ।

लेकिन आज के समय का दुराचार्य सन्यासी को न संसार का मौह छूटता है कि न सन्यास ब्रह्मचार्य में जीव लगता है । 

वो तो सिर्फ दिखावे के खातिर ही भेख पकड़कर बैठ जाएगा बाद तो उसका हालत तो धोबी के कुत्ता जैसा जीवन न घर का के न घाट का ऐसा परिस्थितियों से पसार होता है । 

🌹🌹🌷🌷💐🌷🌷🌹🌹

🪐 ज्योतिष- ग्रह- नक्षत्र 🪐

{ उधार लेन - देन व मंगल ग्रह } 

यदि आप ब्याज का पैसा कमाने के उद्देश्य से उधार लेन - देन करते हैं तो ऐसी स्थिति में आप अपनी जन्म कुंडली में मंगल व राहु ग्रहों की स्थिति जरूर जांच लेनी चाहिए। 

आज इसी विषय पर आपको कुछ संक्षिप्त जानकारी जो की मंगल ग्रह से संबंधित है आपको प्रदान करते हैं। यहाँ कुछ भाव हैं जिनमें मंगल ग्रह होने पर पैसा उधार देने से बचना चाहिए:

🔻द्वितीय भाव में मंगल - :

द्वितीय भाव में मंगल होने पर पैसा उधार देने से बचना चाहिए....! 

क्योंकि इससे वित्तीय नुकसान और कर्ज की समस्या हो सकती है।

🔻चतुर्थ भाव - : 

चतुर्थ भाव में मंगल होने पर पैसा उधार देने से बचना चाहिए...! 

क्योंकि इससे वित्तीय नुकसान और व्यय की समस्या हो सकती है।

🔻षष्ठ भाव में मंगल - : 

षष्ठ भाव में मंगल होने पर पैसा उधार देने से बचना चाहिए...! 

क्योंकि इससे कर्ज और वित्तीय विवाद की समस्या हो सकती है।

🔻अष्टम भाव में मंगल - :

अष्टम भाव में मंगल होने पर पैसा उधार देने से बचना चाहिए...! 

क्योंकि इससे वित्तीय नुकसान और अनिश्चितता की समस्या हो सकती है।
 
🔻द्वादश भाव में मंगल - :

द्वादश भाव में भी मंगल होने पर पैसा उधार देने से बचना चाहिए...! 

क्योंकि इससे वित्तीय नुकसान और व्यय की समस्या हो सकती है।

🔻मंगल ग्रह की दृष्टि - : 

इसके अलावा, मंगल की दृष्टि या युति भी महत्वपूर्ण है। 

यदि मंगल की दृष्टि या युति किसी अशुभ ग्रह से द्वितीय, षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव पर हो तो भी पैसा उधार देने से बचना चाहिए।

यदि ऊपर दिए गए भाव में मंगल स्थित है तो पैसा उधार देने से बचना चाहिए और ब्याज इत्यादि का काम नहीं करना चाहिए। 

अपवाद वश कुछ शुभ राशि व शुभ ग्रह के दृष्टि संयोग से आपका पैसा फंसने से बच सकता है...! 

लेकिन इसके विपरीत आपका मंगल ग्रह अशुभ प्रभाव व अशुभ ग्रह के साथ योग बना रहा है तो आपका पैसा लौट कर आने की सहज संभावना नहीं है l

( नोट-: उधार लेन - देन के मामलों में मंगल ग्रह के अलावा अन्य ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है अतः कुंडली के अन्य ग्रहों का भी विश्लेषण जरूर कर लेना चाहिए )
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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SHREE SARSWATI JYOTISH KARYALAY
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वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...