सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 7 ।।
।। ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 7।।
श्राद्ध करने से क्या लाभ मिलता है? कुटुंब-परिवार में शुभ फल कब दिखाई देते हैं?
*कहते हैं झूठी कसमें खाने से कौन-से इंसान मर जाते हैं,*
हां इंसान तो नहीं मरते पर इंसान का विश्वास ज़रूर मर जाता है ;
यह बात हमें जीवन का एक महत्त्वपूर्ण सत्य समझाती है।
मनुष्य के जीवन में विश्वास, सत्य, सदाचार और कर्तव्य का बहुत बड़ा स्थान है।
जिस परिवार में विश्वास बना रहता है, वहाँ आपसी संबंध मजबूत होते हैं;
और जहाँ झूठ, छल-कपट तथा अपने कर्तव्यों की उपेक्षा होती है, वहाँ मनमुटाव और अशांति उत्पन्न हो सकती है।
इसी प्रकार सनातन धर्म में श्राद्ध केवल मृत पूर्वजों के निमित्त किया जाने वाला कर्मकांड नहीं, बल्कि उनके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक उत्तरदायित्व प्रकट करने का धार्मिक विधान है।
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शास्त्रीय परंपरा में माता - पिता, पितरों, गुरुजनों और परिवार की पूर्ववर्ती पीढ़ियों के प्रति सम्मान को महत्त्व दिया गया है।
श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान और दान के माध्यम से मनुष्य अपने पूर्वजों का स्मरण करता है तथा अपने वंश और संस्कारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है।
लेकिन यहाँ एक बात समझना आवश्यक है।
क्या श्राद्ध करते ही परिवार के सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं ?
क्या सात दिन, एक महीने या एक वर्ष में निश्चित रूप से धन, संतान, नौकरी, स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख प्राप्त हो जाते हैं ?
इन प्रश्नों का उत्तर श्रद्धा के साथ - साथ शास्त्रों की वास्तविक शिक्षाओं को समझकर देना चाहिए।
बिना प्रमाण कोई निश्चित दावा करना शास्त्रसम्मत नहीं होगा।
श्राद्ध का वास्तविक अर्थ क्या है ?
श्राद्ध शब्द का संबंध ‘श्रद्धा’ से है।
पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक तथा विधिपूर्वक किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहा जाता है।
इसका उद्देश्य अपने दिवंगत माता - पिता, दादा - दादी, परदादा - परदादी और अन्य पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करना है।
हिंदू धर्म की विभिन्न परंपराओं में श्राद्ध की विधि, तर्पण, पिण्डदान, ब्राह्मण - भोजन तथा दान के विधान बताए गए हैं।
श्राद्ध का संबंध केवल पितृपक्ष से ही नहीं है।
परंपरा के अनुसार मृत्यु की तिथि पर वार्षिक श्राद्ध, अमावस्या पर पितृतर्पण और विशेष अवसरों पर पितरों के निमित्त कर्म किए जाते हैं।
इनकी विधि परिवार की परंपरा, कुलाचार तथा संबंधित धर्मशास्त्रीय विधान के अनुसार भिन्न हो सकती है।
शास्त्रीय प्रमाण — मनुस्मृति, अध्याय ३, श्लोक ८२
«कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥»
भावार्थ: इस श्लोक में अन्न, जल, दूध, कन्द - मूल और फल आदि के माध्यम से पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक कर्म करने का विधान बताया गया है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि पितरों के प्रति सम्मान और कर्तव्य का निर्वाह महत्त्वपूर्ण है।
प्रत्येक व्यक्ति की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती, इस लिए धार्मिक कर्तव्य को केवल महँगे आयोजन से जोड़कर देखना उचित नहीं है।
संदर्भ: मनुस्मृति ३.८२।
मनुस्मृति — अध्याय ३, श्लोक ८२
मूल संस्कृत श्लोक
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥
भावार्थ
मनुष्य को पितरों की प्रसन्नता के उद्देश्य से अन्न तथा जल द्वारा अथवा दूध, कन्द - मूल और फल आदि से श्राद्ध संबंधी कर्म करना चाहिए।
इस श्लोक के माध्यम से मनुस्मृति में पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म का महत्त्व बताया गया है।
श्राद्ध का उद्देश्य केवल बड़े आयोजन करना नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ अपने पितरों का स्मरण करना और अपनी परंपरा के अनुसार धार्मिक कर्तव्य निभाना है।
मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, जल, दूध, फल आदि के माध्यम से पितरों के निमित्त कर्म कर सकता है।
इस से यह शिक्षा मिलती है कि धार्मिक कर्तव्य को केवल अधिक धन खर्च करने से नहीं जोड़ना चाहिए।
शास्त्रीय संदर्भ: मनुस्मृति, अध्याय ३, श्लोक ८२।
आज आश्विन मास कृष्ण पक्ष वर्षा ऋतू दशमी मंदवार ( शनिवार ) आर्द्रा / पुनर्वसु नक्षत्र है
आज स्वर्ग की भद्रा दिन के ११ / २४ से रात्रि ११ / २४ तक है
इन्दिरा एकादशी व्रत है !
आज दशमी की श्राद्ध होगी कल एकादशी की संन्यासी और वैष्णव लोगों की अज्ञात तिथि की श्राद्ध होगी
इसी प्रकार श्राद्ध की जानकारी प्रति दिन दे दी जायेगी !
गृहों का राशि में संचरण
सूर्य / सिंह
चंद्र / मिथुन
मंगल / मेष
बुध / कन्या
गुरु / धनु
# शुक्र / कर्क
शनि मकर
# राहु मिथुन
# केतु / धनु
# नोट # चिन्ह वक्री की पहचान है
श्राद्ध करने से कौन-कौन से लाभ प्राप्त होते हैं ?
सनातन धर्मग्रंथों में श्राद्ध के अनेक धार्मिक फल बताए गए हैं।
इन फलों को समझते समय धार्मिक आस्था, नैतिक जीवन और प्रत्यक्ष सांसारिक परिणामों के बीच अंतर रखना चाहिए।
पहला लाभ —
पितरों के प्रति कर्तव्य की पूर्ति ;
धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार पितरों के निमित्त श्राद्ध करना गृहस्थ के धार्मिक कर्तव्यों में शामिल है।
इस से मनुष्य अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करता है।
परिवार में जिन माता-पिता और बुजुर्गों ने जीवनभर परिश्रम किया, परिवार को संभाला तथा अगली पीढ़ी को संस्कार दिए, उनका स्मरण करना भी इस भावना का महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
दूसरा लाभ —
परिवार में संस्कार और एकता को प्रोत्साहन ;
जब परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं, उनके अच्छे कार्यों को याद करते हैं और आपसी संबंधों को सम्मान देते हैं, तब पारिवारिक एकता मजबूत हो सकती है।
हालाँकि केवल श्राद्ध करने से परिवार में एकता की गारंटी नहीं मिलती।
उसके लिए सत्य बोलना, एक - दूसरे की सहायता करना, बुजुर्गों का सम्मान करना और विवादों का न्यायपूर्ण समाधान करना भी आवश्यक है।
तीसरा लाभ —
दान, सेवा और परोपकार की भावना ;
श्राद्ध के अवसर पर अन्नदान, जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्रदान तथा यथाशक्ति दक्षिणा देने की परंपरा है।
इन कार्यों से जरूरतमंद लोगों की सहायता होती है और परिवार में सेवा की भावना विकसित हो सकती है।
दान का वास्तविक मूल्य केवल उसकी राशि से निर्धारित नहीं होता।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार ईमानदारी से किया गया दान ही व्यक्ति को अपने कर्तव्य का बोध कराता है।
धार्मिक कर्म के नाम पर कर्ज लेना या परिवार की आवश्यकताओं की उपेक्षा करना आवश्यक नहीं है।
चौथा लाभ —
पितृऋण का स्मरण ;
सनातन परंपरा में देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण जैसी अवधारणाएँ मिलती हैं।
पितृऋण का भाव यह है कि मनुष्य अपने अस्तित्व, पारिवारिक परंपरा और संस्कारों के लिए पूर्ववर्ती पीढ़ियों के योगदान को स्वीकार करे।
इस भावना का पालन केवल मृत्यु के बाद के संस्कारों तक सीमित नहीं है।
जीवित माता - पिता की सेवा, उनके प्रति सम्मान और परिवार के बच्चों को अच्छे संस्कार देना भी इसी व्यापक उत्तरदायित्व से जुड़ा है।
पाँचवाँ लाभ —
धार्मिक आस्था के अनुसार पितरों की तृप्ति ;
श्राद्ध के धार्मिक फल के संबंध में मनुस्मृति में स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
मनुस्मृति, अध्याय ३, श्लोक १४६ में कहा गया है—
«एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्यात् शाश्वती साप्तपौरुषी॥»
भावार्थ: पूर्ववर्ती श्लोकों में बताए गए योग्य व्यक्तियों में से किसी को श्राद्ध में विधिपूर्वक सम्मान देकर भोजन कराने पर, शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, कर्ता के पितरों की तृप्ति सात पीढ़ियों तक मानी गई है।
यह श्लोक श्राद्ध के पारंपरिक धार्मिक महत्त्व का प्रमाण है।
इसे पितरों की तृप्ति संबंधी शास्त्रीय मान्यता के रूप में समझना चाहिए, न कि इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में कि श्राद्ध करने के बाद परिवार की हर सांसारिक समस्या निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी।
मनुस्मृति — अध्याय ३, श्लोक १४६
मूल संस्कृत श्लोक
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्यात् शाश्वती साप्तपौरुषी॥
भावार्थ ; पूर्ववर्ती श्लोकों में वर्णित योग्य व्यक्तियों में से किसी एक को श्राद्ध के अवसर पर विधिपूर्वक सम्मान देकर भोजन कराने पर, शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, श्राद्ध करने वाले के पितरों की सात पीढ़ियों तक तृप्ति मानी गई है।
इस श्लोक में श्राद्ध के अवसर पर योग्य पात्र को सम्मानपूर्वक भोजन कराने का धार्मिक महत्त्व बताया गया है।
पारंपरिक धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार, विधिपूर्वक किया गया श्राद्ध पितरों की तृप्ति से संबंधित है।
यहाँ सात पीढ़ियों का उल्लेख शास्त्र में वर्णित धार्मिक फल को व्यक्त करता है।
इस का अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि श्राद्ध करने के बाद परिवार की प्रत्येक आर्थिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्या किसी निश्चित अवधि में समाप्त हो जाएगी।
शास्त्रीय संदर्भ: मनुस्मृति, अध्याय ३, श्लोक १४६।
छठा लाभ —
आत्मचिंतन और सदाचार की प्रेरणा ;
श्राद्ध का अवसर मनुष्य को अपने जीवन के बारे में सोचने की प्रेरणा भी दे सकता है।
यदि हम अपने पूर्वजों का सम्मान करते हैं, तो उनके सामने अपने आचरण को भी उचित रखने का प्रयास करना चाहिए।
झूठी कसम खाने, छल करने, दूसरों का अधिकार छीनने और परिवार के सदस्यों को कष्ट पहुँचाने से बचना आवश्यक है।
केवल धार्मिक अनुष्ठान कर लेना इन व्यवहारों का विकल्प नहीं हो सकता।
इस प्रकार श्राद्ध का एक महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक संदेश है—
पूर्वजों का सम्मान करते हुए वर्तमान जीवन में भी सत्य, दया, सेवा और सदाचार का पालन करना।
क्या श्राद्ध न करने से परिवार में कष्ट आते हैं ?
इस प्रश्न का उत्तर देते समय भय फैलाने वाले दावों से बचना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों में पितृकर्म की उपेक्षा के संबंध में अनेक चेतावनियाँ और कर्मफल संबंधी मान्यताएँ मिलती हैं।
गरुड़पुराण के प्रेतकल्प में मृत्यु के बाद के संस्कारों तथा पिण्डदान आदि का वर्णन मिलता है।
मनुस्मृति में भी श्राद्ध संबंधी विधानों का विस्तार है।
लेकिन किसी परिवार में बीमारी, आर्थिक परेशानी, विवाह में विलंब, संतान संबंधी कठिनाई या आपसी विवाद होने पर केवल श्राद्ध न होने को उसका निश्चित कारण घोषित करना उचित नहीं है।
इन समस्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं।
आर्थिक कठिनाइयों के लिए आय, खर्च और रोजगार की स्थिति देखनी चाहिए। बीमारी में चिकित्सकीय सहायता आवश्यक है।
पारिवारिक विवादों में संवाद, न्याय और व्यवहार सुधारने की आवश्यकता होती है।
पितृश्राद्ध को भय या दबाव का साधन नहीं बनाना चाहिए।
श्रद्धा से किया गया धार्मिक कर्म अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण है, परंतु किसी व्यक्ति को यह कहकर डराना कि श्राद्ध न कराने से उसका परिवार अवश्य नष्ट हो जाएगा, एक निश्चित शास्त्रीय निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
इसी प्रकार, यदि किसी कारण से कोई व्यक्ति निर्धारित विधि से श्राद्ध नहीं कर पाया, तो उसे निराश या भयभीत करने के बजाय अपनी परंपरा के जानकार आचार्य से परिस्थिति के अनुसार उचित विकल्प पूछना चाहिए।
पितृ - दिवस ;
भारतीय सनातन संस्कृति में पिता को परमात्मा का प्रतिनिधि माना गया है।
पिता की सेवा - सुश्रुषा और उनके प्रति देव बुद्धि रखने वाला पुत्र तीनों लोकों में जयी होता है।
समस्त सिद्धियाँ उसके अनुगत होती हैं।
संतति को जन्म देकर उसे शिक्षित और संस्कारवान बनाने से लेकर उनके पालन - पोषण के लिए पिता द्वारा किए गए अनवरत श्रम !
असीम त्याग और अनन्त कष्टों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के उद्देश्य से मनाए जाने वाले "पितृ दिवस" पर संकल्प लें कि हमें माता-पिता के अनन्त उपकारों का नित्य स्मरण रहे।।
“पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परम तपः।
पितरि प्रितिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः।।"
जिंदगी में कभी किसी की की हुई भलाई व्यर्थ नहीं जाती,
वो कब किस रूप में लौट कर आएगी वक्त ही जानता है.
श्राद्ध करने के कितने समय बाद कुटुंब-परिवार में अच्छे परिणाम दिखाई देते हैं?
यह आपके प्रश्न का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है।
बहुत से लोगों के मन में यह जिज्ञासा होती है कि यदि उन्होंने पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान कराया, तो कितने दिनों में परिवार के कष्ट दूर होंगे?
कितने समय में धन की वृद्धि होगी?
घर में सुख - शांति कब आएगी? संतान, विवाह, रोजगार और पारिवारिक संबंधों में सुधार कब होगा?
शास्त्रों के आधार पर इसका उत्तर यह है कि श्राद्ध करने के बाद परिवार में सभी प्रकार के सांसारिक सुख प्राप्त होने की कोई निश्चित समय - सीमा बताना उचित नहीं है।
ऐसा कोई प्रमाणित सार्वभौमिक नियम नहीं है कि श्राद्ध करने के सात दिन बाद धन आएगा, एक महीने बाद सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी अथवा एक वर्ष में पूरे परिवार का भाग्य बदल जाएगा।
इस विषय को तीन दृष्टियों से समझना चाहिए।
१. धार्मिक फल की दृष्टि से ;
श्राद्ध के धार्मिक विधान में पितरों की तृप्ति, उनके प्रति कर्तव्य और पुण्य की प्राप्ति का उल्लेख मिलता है।
ये धर्मशास्त्रीय मान्यताएँ हैं।
इनका फल केवल दिनों की गणना करके निर्धारित नहीं किया जा सकता।
२. मानसिक और पारिवारिक दृष्टि से ;
श्राद्ध के अवसर पर यदि परिवार के लोग एक साथ बैठकर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं, आपसी मनमुटाव दूर करने का प्रयास करते हैं और बुजुर्गों के प्रति सम्मान बढ़ाते हैं, तो इसका सकारात्मक प्रभाव तत्काल भी दिखाई दे सकता है।
लेकिन इसके लिए केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यवहार में परिवर्तन भी आवश्यक है।
३. आर्थिक और सांसारिक दृष्टि से ;
रोजगार, व्यवसाय, स्वास्थ्य, विवाह और आर्थिक स्थिति में सुधार कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
श्राद्ध के बाद इन क्षेत्रों में निश्चित अवधि के भीतर सफलता मिलने का कोई सुनिश्चित शास्त्रीय या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
इस लिए किसी पुरोहित, ज्योतिषी अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा यह गारंटी देना कि अमुक विधि से श्राद्ध कराने पर इतने दिनों में सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, सावधानी से परखना चाहिए।
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क्या श्राद्ध से पितृदोष दूर होता है ?
ज्योतिषीय परंपरा में पितृदोष शब्द का प्रयोग कुछ जन्मकुंडली संबंधी योगों और पितरों से जुड़े धार्मिक विश्वासों के संदर्भ में किया जाता है।
विभिन्न ज्योतिषीय परंपराओं में इसके कारणों और उपायों के बारे में अलग - अलग मत मिलते हैं।
कुछ परंपराओं में पितृदोष की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान, अमावस्या पर दान और पितरों के निमित्त प्रार्थना करने का सुझाव दिया जाता है।
लेकिन यहाँ भी दो बातें समझना आवश्यक हैं।
पहली बात, हर समस्या को पितृदोष का परिणाम मानना उचित नहीं है।
दूसरी बात, केवल जन्मकुंडली में किसी योग के आधार पर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि परिवार में होने वाली प्रत्येक परेशानी पूर्वजों की अप्रसन्नता के कारण ही है।
श्राद्ध करना धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा का विषय है।
यदि कोई व्यक्ति पितृशांति के लिए धार्मिक उपाय करना चाहता है, तो वह अपनी कुलपरंपरा के अनुसार विधिपूर्वक कर सकता है।
इस के साथ ही जीवन की वास्तविक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी अपनाने चाहिए।
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श्राद्ध किस प्रकार करना चाहिए ?
श्राद्ध के संबंध में धर्मशास्त्रों में तिथि, पात्र, भोजन, तर्पण, पिण्डदान और दान आदि के विधान मिलते हैं।
अलग - अलग परंपराओं में विधि में अंतर हो सकता है।
सामान्य रूप से निम्न बातों पर ध्यान दिया जा सकता है।
- श्रद्धा और संकल्प: पितरों का स्मरण श्रद्धापूर्वक किया जाए।
- उचित तिथि: परिवार की परंपरा के अनुसार मृत्यु की तिथि पर वार्षिक श्राद्ध अथवा पितृपक्ष में निर्धारित कर्म किया जाए।
- तर्पण: परंपरा के अनुसार जल और तिल आदि से तर्पण किया जाए।
- पिण्डदान: जहाँ कुलाचार और विधि में निर्धारित हो, वहाँ योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में किया जाए।
- अन्नदान और सेवा: सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन कराया जाए अथवा उनकी सहायता की जाए।
- सदाचार: परिवार में सत्य, दया, न्याय और आपसी सम्मान बनाए रखने का प्रयास किया जाए।
मनुस्मृति के अध्याय ३ में श्राद्ध के लिए उचित समय, पात्र और विधि के विषय में अनेक श्लोक हैं।
उदाहरण के लिए, श्लोक १४६ में श्राद्ध के योग्य पात्र को सम्मानपूर्वक भोजन कराने का उल्लेख मिलता है।
इससे स्पष्ट है कि पारंपरिक विधान में केवल आयोजन ही नहीं, बल्कि पात्रता और उचित आचरण पर भी ध्यान दिया गया है।
तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः ।
स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत प्रथमं गवा ॥३॥
स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत प्रथमं गवा ॥३॥
क्या कम धन वाला व्यक्ति भी श्राद्ध कर सकता है?
हाँ, धार्मिक परंपरा में सामर्थ्य के अनुसार कर्म करने का महत्त्व है।
मनुस्मृति ३.८२ में अन्न, जल, दूध, कन्द-मूल और फल आदि का उल्लेख मिलता है।
इस लिए श्राद्ध को केवल बड़े भोज, महँगी सामग्री या अधिक दक्षिणा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
अपनी परिस्थिति के अनुसार विधिपूर्वक धार्मिक कर्म करना और पितरों का स्मरण करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
यदि कोई व्यक्ति आर्थिक कठिनाई में है, तो उसे श्राद्ध के नाम पर कर्ज लेकर भारी खर्च करने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए।
वह अपनी कुलपरंपरा और परिस्थिति के अनुरूप किसी विद्वान आचार्य से सरल विधि पूछ सकता है।
पितरों के प्रति श्रद्धा का अर्थ यह भी है कि परिवार के जीवित सदस्यों की आवश्यकताओं की उपेक्षा न की जाए।
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श्राद्ध का सबसे बड़ा संदेश क्या है ?
श्राद्ध के विषय में विचार करते समय आरंभ में कही गई बात फिर याद आती है—
“झूठी कसमें खाने से इंसान का विश्वास मर जाता है।”
इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों का सम्मान करने की बात तो करता है, लेकिन जीवित माता - पिता का अपमान करता है, परिवार में झूठ बोलता है, दूसरों के अधिकार छीनता है अथवा अपने कर्तव्यों से भागता है, तो उसे अपने व्यवहार पर भी विचार करना चाहिए।
श्राद्ध हमें अपने पूर्वजों का स्मरण कराता है।
उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, परिवार के अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाना और जीवन में सत्य तथा सदाचार का पालन करना इस भावना को सार्थक बनाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक अनुष्ठान का महत्त्व केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित है।
सनातन धर्म में श्राद्ध का अपना स्वतंत्र धार्मिक महत्त्व है।
लेकिन उस धार्मिक महत्त्व को समझने के लिए भय, चमत्कार और निश्चित समय में लाभ मिलने के अप्रमाणित दावों का सहारा लेना आवश्यक नहीं है।
सनातन धर्म में श्राद्ध पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और धार्मिक कर्तव्य का महत्त्वपूर्ण विधान है।
मनुस्मृति के अध्याय ३, श्लोक ८२ और १४६ इसके शास्त्रीय आधार को समझने में सहायक हैं।
श्राद्ध से जुड़े पारंपरिक धार्मिक फल पितरों की तृप्ति और पुण्य की मान्यता से संबंधित हैं।
वहीं परिवार में शांति, विश्वास और एकता बढ़ाने के लिए सदाचार, सेवा, संवाद और जिम्मेदारी का पालन भी आवश्यक है।
श्राद्ध करने के बाद कितने दिनों में परिवार की सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, इसकी कोई निश्चित समय - सीमा प्रमाणपूर्वक नहीं बताई जा सकती।
इस लिए श्राद्ध को श्रद्धापूर्वक करें, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करें, पितरों का सम्मान करें और जीवन की समस्याओं का समाधान विवेकपूर्वक खोजें।
यही श्राद्ध की धार्मिक भावना और उसके व्यावहारिक संदेश को समझने का संतुलित मार्ग है।
।। पितृदेवो भव ।। ।। श्रद्धया देयम् ।। हर हर महादेव हर...!! जय माताजी 🙏🌹जय श्री राम 🙏
!!!!! शुभमस्तु !!!
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बहुत सुंदर 🙏🙏🙏
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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