सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 10
ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 10
क्या श्राद्ध भोज में पित्र भोजन ग्रहण करने आते हैं ?
क्या श्राद्ध भोज में पितर भोजन ग्रहण करने आते हैं? — गरुड़ पुराण एवं धर्मशास्त्रों के आधार पर शास्त्रोक्त विवेचन ;
श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान और पितरों के निमित्त ब्राह्मण भोजन सनातन धर्म की प्राचीन धार्मिक परम्पराओं में विशेष स्थान रखते हैं।
इन कर्मों के सम्बन्ध में अनेक लोगों के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाती है और उसका शरीर अग्नि में भस्म हो जाता है, तब उसके पितर श्राद्ध के दिन किस प्रकार भोजन ग्रहण करते हैं?
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क्या वे वास्तव में पृथ्वी पर आते हैं ?
क्या वे अपने परिवार के सदस्यों द्वारा अर्पित भोजन को खाते हैं ?
यदि पितर आते हैं, तो उन्हें किसने देखा है और शास्त्र इस विषय में क्या कहते हैं ?
इन प्रश्नों का उत्तर देते समय केवल लोककथाओं, सुनी - सुनाई बातों अथवा कल्पना का सहारा लेना उचित नहीं है।
आवश्यक है कि गरुड़ पुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, महाभारत तथा अन्य धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में वर्णित श्राद्ध - विधान, पितरों की अवधारणा और श्राद्ध के फल का विवेचन किया जाए।
यहाँ एक बात आरम्भ में ही स्पष्ट कर देना आवश्यक है: पितरों के श्राद्ध में आने और भोजन प्राप्त
करने का वर्णन धार्मिक शास्त्रों में उनके अपने सिद्धान्तों के अनुसार किया गया है।
इसे आधुनिक प्रत्यक्षदर्शी प्रमाण अथवा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भौतिक घटना के समान प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इसी प्रकार किसी शास्त्र का नाम लेकर ऐसा संवाद, श्लोक या कथा लिखना भी उचित नहीं है, जिसका प्रामाणिक पाठ उपलब्ध न हो।
इस लिए प्रस्तुत लेख में शास्त्रीय सिद्धान्तों और उनके अर्थ का विस्तार किया जा रहा है, तथा जहाँ किसी विशेष प्रसंग के मूल शब्दों की पुष्टि नहीं है, वहाँ उसे मूल ग्रन्थ का अक्षरशः उद्धरण नहीं माना गया है।
गरुड़ पुराण में स्वयं गरुड़जी ने यही प्रश्न पूछा है ;
आपने जिस प्रसंग का उल्लेख किया है, वह गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प में वास्तव में मिलता है।
यह इस विषय का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है, क्योंकि इसमें केवल श्राद्ध करने का विधान ही नहीं, बल्कि गरुड़जी द्वारा उठाई गई शंका का भी वर्णन है।
प्रचलित गीता प्रेस के हिन्दी पाठ में यह प्रसंग अध्याय 10, श्लोक 23 और 26 के आसपास आता है।
अलग - अलग संस्करणों में अध्यायों और पृष्ठों के क्रम में अन्तर हो सकता है।
गरुड़जी का प्रश्न इस प्रकार है:
हे प्रभु! मनुष्य अपने मृत पितरों के निमित्त श्राद्ध करता है।
वह पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराता है तथा अन्न, जल और पिण्ड अर्पित करता है।
किन्तु जिन पितरों के लिए यह सब किया जाता है, वे अन्य लोक से पृथ्वी पर आकर भोजन करते हैं, इसका प्रमाण क्या है ?
क्या किसी ने उन्हें श्राद्ध में भोजन करते हुए देखा है?
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि गरुड़जी का प्रश्न श्राद्ध का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए है।
धर्मशास्त्रों में प्रश्नोत्तर की परम्परा का यही महत्त्व है।
किसी धार्मिक कर्म के विषय में शंका उत्पन्न हो, तो उसके विधान, प्रयोजन और फल का विवेचन किया जाता है।
महत्त्वपूर्ण पाठ - सावधानी: ऊपर गरुड़जी के प्रश्न को मूल प्रसंग के भावार्थ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि सम्पूर्ण मूल संस्कृत श्लोक के रूप में।
इसे अक्षरशः संस्कृत उद्धरण समझना उचित नहीं होगा।
गरुङ पुराण में इसका वर्णन इस प्रसंग में है ।
भगवान *श्रीकृष्ण* से पक्षीराज गरुड़ ने पूछा- हे प्रभु !
पृथ्वी पर लोग अपने मृत पितरों का श्राद्ध करते हैं. उनकी रुचि का भोजन ब्राह्मणों आदि को कराते हैं. पर क्या पितृ लोक से पृथ्वी पर आकर श्राद्ध में भोजन करते पितरों को किसी ने देखा भी है ।
भगवान *श्रीकृष्ण* ने कहा- हे गरुड़ !
तुम्हारी शंका का निवारण करने के लिए मैं देवी सीता के साथ हुई घटना सुनाता हूं....!
सीताजी ने पुष्कर तीर्थ में अपने ससुर आदि तीन पितरों को श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में देखा था, वह कथा सुनो ।
भगवान श्रीकृष्ण का उत्तर — श्राद्ध में पितरों की उपस्थिति किस प्रकार मानी गई है ?
गरुड़ पुराण के इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण गरुड़जी को श्राद्धान्न के पितरों तक पहुँचने की प्रक्रिया समझाते हैं।
इस वर्णन में कहा गया है कि जब श्राद्ध का समय आता है, तब पितर उस श्राद्ध में उपस्थित होते हैं।
वे वायुरूप में आकर ब्राह्मणों के साथ भोजन करते हैं और श्राद्धकर्ता द्वारा किए गए कर्म से तृप्ति प्राप्त करते हैं।
इस प्रसंग का एक महत्त्वपूर्ण श्लोक इस प्रकार दिया गया है:
निमन्त्रितास्तु ये विप्राः श्राद्धपूर्वदिने खग।
प्रविश्य पितरस्तेषु भुक्त्वा यान्ति स्वमालयम्॥
— गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय 10, श्लोक 26 ( प्रचलित हिन्दी संस्करण में उद्धृत पाठ )
भावार्थ: हे पक्षिराज! श्राद्ध से पूर्व जिन ब्राह्मणों को निमन्त्रित किया जाता है, पितर उनमें प्रवेश करके भोजन ग्रहण करते हैं और उसके बाद अपने लोक को लौट जाते हैं।
इस श्लोक में पितरों के आगमन को साधारण मनुष्य के पृथ्वी पर चलकर आने के समान नहीं बताया गया है।
वर्णन में वायुरूप में आने तथा निमन्त्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन प्राप्त करने की धार्मिक अवधारणा प्रस्तुत की गई है।
इस लिए यदि कोई पूछता है कि श्राद्ध में पितरों के लिए बनाया गया भोजन कहाँ जाता है, तो गरुड़ पुराण का उत्तर यह है कि श्राद्ध - विधान के अनुसार उसका फल पितरों को प्राप्त होता है।
यहाँ एक और अन्तर समझना चाहिए। ब्राह्मण को दिया गया भोजन प्रत्यक्ष रूप से ब्राह्मण ग्रहण करता है, जबकि पितरों की तृप्ति को पुराण श्राद्ध के धार्मिक फल के रूप में बताता है।
दोनों को एक ही प्रकार की भौतिक घटना मान लेना इस वर्णन को ठीक से समझना नहीं होगा।
गरूड़ !
यह तो तुम्हें ज्ञात ही है कि *श्री राम* अपने पिता दशरथ की आज्ञा के बाद वनगमन कर गये, साथ में सीता भी थीं. बाद में श्रीराम को यह पता लग चुका था कि उनके पिता उनके वियोग में शरीर त्याग चुके हैं....!
यदि पितर भोजन ग्रहण करते हैं, तो उन्हें किसने देखा ?
गरुड़ पुराण में गरुड़जी की शंका के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण देवी सीता का प्रसंग सुनाते हैं। यही इस प्रश्न का विशेष उल्लेखनीय भाग है।
ग्रन्थ में भगवान कहते हैं कि देवी सीता ने पुष्कर तीर्थ में श्राद्ध के समय अपने ससुर आदि तीन पितरों को श्राद्ध के लिए निमन्त्रित ब्राह्मण के शरीर में प्रविष्ट हुआ देखा था।
इस वर्णन में पितरों के दर्शन का उदाहरण देवी सीता से सम्बन्धित बताया गया है।
अतः यह कहना ठीक नहीं होगा कि गरुड़ पुराण में इस प्रश्न का कोई उत्तर ही नहीं मिलता।
लेकिन इस प्रसंग को प्रस्तुत करते समय दो बातें अलग - अलग समझनी आवश्यक हैं।
पहली बात, गरुड़ पुराण के अनुसार देवी सीता का यह दर्शन पितरों की उपस्थिति का उदाहरण है।
दूसरी बात, यह पुराण में वर्णित धार्मिक आख्यान है।
इसे आधुनिक अर्थ में स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रत्यक्षदर्शी रिपोर्ट या वैज्ञानिक प्रयोग का परिणाम नहीं कहा जा सकता।
शास्त्रीय लेखन में प्रमाण का अर्थ भी प्रसंग के अनुसार समझा जाता है।
पुराण का वर्णन धार्मिक परम्परा के भीतर प्रमाण माना जा सकता है, लेकिन ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण की कसौटी अलग होती है।
इस भेद को स्पष्ट रखने से शास्त्र का सम्मान भी बना रहता है और लेख में कोई अप्रमाणित दावा भी नहीं जुड़ता।
जंगल - जंगल घूमते सीता जी के साथ श्रीराम ने पुष्कर तीर्थ की भी यात्रा की. अब यह श्राद्ध का अवसर था ऐसे में पिता का श्राद्ध पुष्कर में हो इससे श्रेष्ठ क्या हो सकता था. तीर्थ में पहुंचकर उन्होंने श्राद्ध के तैयारियां आरंभ कीं ।
श्रीराम ने स्वयं ही विभिन्न शाक, फल, एवं अन्य उचित खाद्य सामग्री एकत्र की. जानकी जी ने भोजन तैयार किया....!
श्राद्ध में पितरों की तृप्ति का अर्थ क्या है ?
अब मुख्य प्रश्न यह है कि पितरों की तृप्ति किस प्रकार होती है।
गरुड़ पुराण के इसी प्रसंग में श्राद्धान्न के पितरों तक पहुँचने के सम्बन्ध में एक और सिद्धान्त बताया गया है।
ग्रन्थ के अनुसार, मृत्यु के पश्चात् जीव को अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार की गति या योनि प्राप्त हो सकती है।
इस लिए सभी जीवों के आहार और स्थिति को एक जैसा नहीं माना गया है।
इस आधार पर पुराण बताता है कि पितरों के निमित्त किया गया श्राद्ध उनके लिए तृप्ति का कारण बनता है।
नाम और गोत्र का उच्चारण, पिण्डदान, अन्नदान तथा जलदान इस धार्मिक प्रक्रिया के अंग हैं।
यहाँ एक उदाहरणात्मक तुलना समझने में सहायता कर सकती है, पर इसे शास्त्र का मूल दृष्टान्त नहीं समझना चाहिए।
मान लीजिए, कोई पुत्र अपने दिवंगत माता - पिता की स्मृति में भोजन बनाता है, जरूरतमन्दों को खिलाता है और जल या अन्न का दान करता है।
इस से दिवंगत माता - पिता के प्रति उसकी श्रद्धा व्यक्त होती है, परिवार में उनके संस्कारों की स्मृति बनी रहती है और दूसरे लोगों को भी सहायता मिलती है।
पुराण इससे आगे जाकर श्राद्ध के फल को पितरों की आध्यात्मिक तृप्ति से जोड़ता है।
इस प्रकार श्राद्ध के दो पक्ष स्पष्ट होते हैं:
प्रत्यक्ष पक्ष:
श्राद्धकर्ता अन्न, जल, पिण्ड और दान आदि के माध्यम से धार्मिक कर्म करता है।
शास्त्रीय पक्ष:
उस कर्म का फल पितरों तक पहुँचने और उन्हें तृप्त करने वाला माना जाता है।
इन दोनों पक्षों को समझने के लिए पितरों की तृप्ति को केवल थाली में रखा हुआ भोजन खाने की भौतिक क्रिया तक सीमित नहीं करना चाहिए।
मनुस्मृति में श्राद्ध और पितरों की प्रसन्नता ;
श्राद्ध की महिमा केवल गरुड़ पुराण तक सीमित नहीं है।
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में भी पितरों के निमित्त श्राद्ध करने का विधान मिलता है।
मनुस्मृति 3.82 का श्लोक है:
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥ ८२॥
भावार्थ: मनुष्य अन्न, जल, दूध, कन्द - मूल अथवा फल आदि के माध्यम से पितरों के निमित्त श्राद्ध करे और इस प्रकार उन्हें प्रसन्नता पहुँचाए।
इस श्लोक में विशेष ध्यान देने योग्य शब्द है —
“पितृभ्यः प्रीतिमावहन्”,
अर्थात् पितरों को प्रसन्नता पहुँचाते हुए।
इससे स्पष्ट होता है कि श्राद्ध के विषय में धर्मशास्त्रीय परम्परा केवल भोजन की मात्रा या पकवानों की संख्या को महत्त्व नहीं देती।
पितरों के प्रति श्रद्धा और उन्हें तृप्त करने का उद्देश्य भी इस कर्म का अभिन्न अंग है।
श्लोक में अन्न के साथ जल, दूध, कन्द - मूल और फल का भी उल्लेख है।
इस का आशय यह है कि श्राद्ध का विधान केवल बहुत अधिक व्यय करके बड़े भोज का आयोजन करने तक सीमित नहीं है।
यहाँ यह सावधानी भी आवश्यक है कि मनुस्मृति का यह श्लोक अपने आप में यह नहीं कहता कि पितर प्रत्यक्ष रूप से किसी मनुष्य की आँखों के सामने आकर भोजन करते हैं।
यह पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध करने का विधान बताता है।
अतः मनुस्मृति और गरुड़ पुराण के कथनों को साथ पढ़ते समय उनके अलग - अलग आशय को बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने एक पके हुए फल को सिद्ध करके श्रीराम जी के सामने उपस्थित किया ।
श्रीराम ने ऋषियों और ब्राह्मणों को सम्मान सहित आमंत्रित किया....!
श्राद्ध कर्म में दीक्षित श्रीराम की आज्ञा से स्वयं दीक्षित होकर सीता जी ने उस धर्म का सम्यक और उचित पालन किया....!
सारी तैयारियां संपन्न हो गयीं अब श्राद्ध में आने वाले ऋषियों और ब्राह्मणों की प्रतीक्षा थी....!
उस समय सूर्य आकाश मण्डल के मध्य पहुंच गए और कुतुप मुहूर्त यानी दिन का आठवां मुहूर्त अथवा दोपहर हो गयी....!
श्री राम ने जिन ऋषियों को निमंत्रित किया था वे सभी आ गये थे ।
श्रीराम ने सभी ऋषियों और ब्राह्मणों का स्वागत और आदर सत्कार किया तथा भोजन करने के लिये आग्रह किया...!
ऋषियों और ब्राह्मणों को भोजन हेतु आसन ग्रहण करने के बाद जानकी अन्न परोसने के लिए वहाँ आयीं....!
याज्ञवल्क्य स्मृति में पितृकर्म और अन्नदान ;
याज्ञवल्क्य स्मृति में भी पितरों और मनुष्यों के लिए अन्न तथा जल देने का निर्देश मिलता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.104 में कहा गया है:
अन्नं पितृमनुष्येभ्यो देयमन्नाद्यमन्वहम्।
यहाँ उद्धृत पंक्ति श्लोक के पाठ का आरम्भिक अंश है; इसे पूरा श्लोक नहीं समझना चाहिए।
भावार्थ: पितरों और मनुष्यों को प्रतिदिन अन्न आदि देना चाहिए।
अन्न उपलब्ध न हो, तो अन्य उपलब्ध खाद्य पदार्थों और जल से भी यथाशक्ति सेवा की जा सकती है।
इस निर्देश से पितृकर्म और जीवित मनुष्यों के प्रति दायित्व का सम्बन्ध सामने आता है।
श्राद्ध का धार्मिक उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।
अन्नदान का व्यापक मानवीय पक्ष भूखे व्यक्ति को भोजन देना भी है।
हालाँकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि याज्ञवल्क्य स्मृति के इस सामान्य निर्देश को गरुड़ पुराण में वर्णित पितरों के वायुरूप में आने की कथा का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं कहा जा सकता।
दोनों ग्रन्थों में पितृकर्म का महत्त्व बताया गया है, लेकिन उनके कथनों का विषय अलग है।
क्या पितरों को वही भोजन मिलता है जो उन्हें जीवन में प्रिय था ?
श्राद्ध के सम्बन्ध में प्रायः कहा जाता है कि दिवंगत व्यक्ति को वही पकवान अर्पित करने चाहिए जो उसे जीवन में प्रिय थे।
इस विचार में अपने पूर्वजों के प्रति प्रेम और स्मरण की भावना है।
परिवार अपने दिवंगत माता - पिता या दादा - दादी की रुचियों को याद करके उनके निमित्त भोजन तैयार करता है।
लेकिन शास्त्रोक्त विवेचन में एक सावधानी आवश्यक है।
गरुड़ पुराण के उपर्युक्त प्रसंग में पितरों की तृप्ति, उनके कर्मानुसार प्राप्त गति और विभिन्न योनियों में अलग - अलग प्रकार के आहार का वर्णन है।
इस लिए यह कहना कि प्रत्येक पितर ठीक उसी प्रकार भौतिक भोजन करता है जैसा उसने जीवित रहते किया था, ग्रन्थ के पूरे कथन को सीमित कर देना होगा।
धार्मिक परम्परा में श्राद्ध के लिए शुद्ध और विधिसम्मत भोजन तैयार करना, पितरों का नाम - स्मरण करना तथा यथाशक्ति दान देना महत्त्वपूर्ण माना गया है।
किसी विशेष पकवान को पितर तक किस रूप में प्राप्ति होती है, इसका विवरण शास्त्रीय मान्यता के भीतर समझा जाता है।
इसे आधुनिक भौतिक प्रक्रिया की तरह मापकर प्रमाणित किया गया है, ऐसा दावा नहीं करना चाहिए।
इस लिए श्राद्ध में भोजन की रुचि से अधिक महत्त्व श्रद्धा, शुद्धता, विधि और पितरों के प्रति कर्तव्यभाव का है।
क्या श्राद्ध में बहुत अधिक खर्च करना आवश्यक है?
नहीं।
शास्त्रीय निर्देशों में यथाशक्ति कर्म करने की अवधारणा भी मिलती है।
मनुस्मृति 3.82 में अन्न, जल, दूध, कन्द-मूल और फलों का उल्लेख है।
इस से स्पष्ट होता है कि पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए अनेक प्रकार के साधन उपलब्ध हैं।
इस लिए श्राद्ध का अर्थ केवल बड़े भोज, महँगे पकवान या भारी दक्षिणा से नहीं लगाया जाना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार साधारण भोजन बनाकर श्राद्ध करता है, जल अर्पित करता है, योग्य व्यक्ति को भोजन कराता है अथवा जरूरतमन्द को अन्न देता है, तो उसका उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।
धार्मिक कर्म में अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करके परिवार को कठिनाई में डालना श्राद्ध के मूल भाव को समझने का उचित तरीका नहीं है।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति की आर्थिक असमर्थता देखकर यह घोषित कर देना कि उसके पितर तृप्त नहीं होंगे, उचित शास्त्रीय विवेचन नहीं है।
ऐसी कठोर घोषणा के लिए विशिष्ट और प्रमाणित शास्त्रीय आधार आवश्यक होगा।
श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन और पिण्डदान का परस्पर सम्बन्ध ;
श्राद्ध - विधान में ब्राह्मण भोजन, पिण्डदान, तर्पण और दान के अलग - अलग स्थान हैं।
ब्राह्मण भोजन: श्राद्ध के अवसर पर विधिपूर्वक निमन्त्रित ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है।
गरुड़ पुराण के उपर्युक्त प्रसंग में पितरों की उपस्थिति को इसी भोजन से जोड़ा गया है।
पिण्डदान: पितरों के निमित्त पिण्ड अर्पित किए जाते हैं।
गरुड़ पुराण इस कर्म को पितरों की तृप्ति से सम्बन्धित बताता है।
तर्पण: जल आदि के माध्यम से पितरों के प्रति तृप्ति और श्रद्धा का भाव व्यक्त किया जाता है।
दान: अन्न, वस्त्र अथवा अन्य वस्तुओं का दान धार्मिक परम्परा और सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है।
इन कर्मों को एक-दूसरे का पूर्ण विकल्प मान लेना उचित नहीं है।
अलग - अलग परम्पराओं और अवसरों पर उनकी विधि भिन्न हो सकती है।
किसी विशेष श्राद्ध में कौन-सा कर्म किस प्रकार करना चाहिए, इसके लिए सम्बन्धित धर्मशास्त्रीय विधि और पारिवारिक परम्परा का अनुसरण किया जाता है।
उन्होंने कुछ भोजन बड़े ही भक्ति भाव से ऋषियों के समक्ष उनके पत्तों के बनी थाली परोसा...!
वे ब्राह्मणों के बीच भी गयीं. पर अचानक ही जानकी भोजन करते ब्राह्मणों और ऋषियों के बीच से निकलीं और तुरंत वहां से दूर चली गयीं ।
सीता लताओं के मध्य छिपकर जा बैठी. यह क्रिया कलाप श्रीराम देख रहे थे....!
सीता के इस कृत्य से श्रीराम कुछ चकित हो गए. फिर उन्होंने विचार किया - ब्राह्मणों को बिना भोजन कराए साध्वी सीता लज्जा के कारण कहीँ चली गयी होंगी ।
सीता जी एकान्त में जा बैठी हैं. फिर श्रीराम जी ने सोचा- अचानक इस कार्य का क्या कारण हो सकता है...!
अभी यह जानने का समय नहीं....!
जानकी से इस बात को जानने पहले मैं इन ब्राह्मणों को भोजन करा लूं, फिर उनसे बात कर कारण समझूंगा ।
ऐसा विचार कर श्रीराम ने स्वयं उन ब्राह्मणों को भोजन कराया....!
भोजन के बाद ऋषियों को विदा करते समय भी श्रीराम के मस्तिष्क में यह बात रह - रहकर कौंध रही थी कि सीता ने ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार क्यों किया...!
उन ब्राह्मणों के चले जाने पर श्रीराम ने अपनी प्रियतमा सीताजी से पूछा-
ब्राह्मणों को देखकर तुम लताओं की ओट में क्यों छिप गई थीं ?
यह उचित नहीं जान पड़ा. इससे ऋषियों के भोजन में व्यवधान हो सकता था. वे कुपित भी हो सकते थे ।
श्रीराम बोले- हे सीते !
तुम्हें तो ज्ञात है कि ऋषियों और ब्राह्मणों को पितरों के प्रतीक मान जाता है. ऐसे में तुमने ऐसा क्यों किया ?
इसका कारण जानने की इच्छा है...!
मुझे अविलम्ब बताओ ।
श्री राम के ऐसा कहने पर सीता जी मुँह नीचे कर सामने खड़ी हो गयीं और अपने नेत्रों से आँसू बहाती हुई बोलीं- हे नाथ !
मैंने यहां जिस प्रकार का आश्चर्य देखा है, उसे आप सुनें ।
इस श्राद्ध में उपस्थित ब्राह्मणों की अगली पांत में मैंने दो महापुरुषों को देखा जो राजा से प्रतीत होते थे....!
ऋषियों, ब्राह्मणों के बीच सजे धजे राजा - महाराजा जैसे महापुरुषों को देख मैं अचरज में थी...!
तभी मैंने आपके पिताश्री के दर्शन भी किए ।
वह भी सभी तरह के राजसी वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थे....!
आपके पिता को देखकर मैं बिना बताए एकान्त में चली आय़ी थी....!
मुझे न केवल लज्जा का बोध हुआ वरन मेरे विचार में कुछ और भी अया तभी निर्णय लिया ।
हे प्रभो ! पेड़ों की छाल वल्कल और मृगचर्म धारण करके मैं अपने स्वसुर के सम्मुख कैसे जा सकती थी ?
क्या पितरों के आने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी उपलब्ध है ?
इस प्रश्न का उत्तर स्पष्टता से देना चाहिए।
गरुड़ पुराण में पितरों के श्राद्ध में आने का वर्णन है और देवी सीता के दर्शन का प्रसंग इसका उदाहरण बनाकर प्रस्तुत किया गया है।
यह ग्रन्थ के भीतर उपलब्ध धार्मिक आख्यान है।
लेकिन आज के समय में पितरों के आने और भोजन करने को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करने वाला ऐसा स्वतंत्र, वैज्ञानिक रूप से सत्यापित प्रमाण प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है, जिसके आधार पर सभी लोग इसे भौतिक घटना के रूप में स्वीकार करने के लिए बाध्य हों।
यह बात कहने से शास्त्र का वर्णन निरर्थक नहीं हो जाता। इसका अर्थ केवल इतना है कि धार्मिक ग्रन्थ के कथन और आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षण दो अलग-अलग प्रकार के प्रमाण हैं।
धर्मशास्त्र का अध्ययन करते समय ग्रन्थ में कही गई बात को ठीक उसी रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि उसके समर्थन में अपनी ओर से कोई नई घटना, चमत्कार या काल्पनिक प्रत्यक्षदर्शी जोड़ देना चाहिए।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति को केवल इसलिए दोषी या अधार्मिक नहीं ठहराना चाहिए कि उसने पितरों को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा।
स्वयं गरुड़जी ने भी भगवान श्रीकृष्ण के सामने यही प्रश्न रखा था।
यह प्रश्न अपने आप में बताता है कि धार्मिक परम्परा में जिज्ञासा और उसके उत्तर का महत्त्व है।
मैं आपसे यह सत्य ही कह रही हूं....!
अपने हाथ से राजा को मैं वह भोजन कैसे दे सकती थी....!
जिसके दासों के भी दास कभी वैसा भोजन नहीं करते मिट्टी और पत्तों आदि से बने पात्रों में उस अन्न को रखकर मैं उन्हें कैसे देती ?
मैं तो वही हूँ जो पहले सभी प्रकार के आभूषणों से सुशोभित रहती थी और आपके पिताश्री मुझे वैसी स्थिति में देख चुके थे...!
आज मैं इस अवस्था में उनके सामने कैसे जाती इससे उनके मन को भी क्षोभ होता....!
मैं उनको क्षोभ में कैसे देख सकती थी ?
क्या यह कहीं से उचित होता ?
इन सब कारणों से हुई लज्जा के कारण मैं वापस हो गयी और किसी की दृष्टि न पड़े इस लिए सघन लता गुल्मों में आ बैठी....!
गरुड़ जी बोले- हे भगवन आपकी इस कथा से मेरी शंका का उचित निवारण हो गया कि श्रद्धा में पितृगण साक्षात प्रकट होते हैं और वे श्राद्ध का भोजन करने वाले ब्राह्मणों में उपस्थित रहते हैं....!
(गरूड़ पुराण से)...
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श्राद्ध का वास्तविक महात्म्य — श्रद्धा, स्मरण और कर्तव्य ;
श्राद्ध शब्द का सम्बन्ध श्रद्धा से माना जाता है।
पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना, उनके उपकारों का स्मरण करना और उनके निमित्त धार्मिक कर्म करना इस परम्परा के मुख्य भाव हैं।
मनुष्य का जीवन केवल उसके व्यक्तिगत प्रयासों से नहीं बनता।
माता - पिता, दादा - दादी और पूर्वजों से उसे परिवार, संस्कार, भाषा, परम्परा तथा जीवन के अनेक साधन प्राप्त होते हैं।
श्राद्ध के अवसर पर व्यक्ति अपने पूर्वजों का स्मरण करता है और यह स्वीकार करता है कि उसका वर्तमान जीवन एक दीर्घ पारिवारिक परम्परा से जुड़ा हुआ है।
गरुड़ पुराण इस स्मरण को केवल भावनात्मक क्रिया के रूप में नहीं रखता, बल्कि पितरों की तृप्ति और परलोक सम्बन्धी धार्मिक सिद्धान्तों से जोड़ता है।
मनुस्मृति भी पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध करने का निर्देश देती है।
याज्ञवल्क्य स्मृति में पितरों और मनुष्यों के लिए अन्न तथा जल देने की बात कही गई है।
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इस लिए श्राद्ध के महात्म्य को समझते समय इन तीन पक्षों को साथ रखना चाहिए:
धार्मिक पक्ष:
शास्त्रों के अनुसार पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है।
पारिवारिक पक्ष:
दिवंगत पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
दान का पक्ष:
अन्न, जल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं के माध्यम से सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की सहायता की जाती है।
इन पक्षों को समझने से श्राद्ध का उद्देश्य केवल एक दिन भोजन कराने तक सीमित नहीं रहता।
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क्या पितर श्राद्ध भोज में भोजन करने आते हैं ?
इस पूरे विवेचन से मूल प्रश्न का उत्तर तीन बिन्दुओं में समझा जा सकता है।
पहला:
गरुड़ पुराण के अनुसार पितर श्राद्ध के अवसर पर आते हैं और निमन्त्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन प्राप्त करते हैं।
इस बात के समर्थन में ग्रन्थ में स्पष्ट वर्णन तथा एक संस्कृत श्लोक मिलता है।
दूसरा:
गरुड़ पुराण में गरुड़जी द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या किसी ने पितरों को श्राद्ध में भोजन करते देखा है, भगवान श्रीकृष्ण देवी सीता और पुष्कर तीर्थ का प्रसंग सुनाते हैं।
अतः यह कहना गलत होगा कि इस प्रश्न का उत्तर पुराण में नहीं दिया गया है।
तीसरा:
यह वर्णन पुराण की धार्मिक मान्यता के अन्तर्गत आता है।
इसे आधुनिक वैज्ञानिक रूप से सत्यापित भौतिक घटना का प्रमाण बताना उचित नहीं है।
इसी तरह इसके विपरीत किसी की आस्था को बिना विचार के निराधार कह देना भी शास्त्रीय अध्ययन का उचित तरीका नहीं है।
इस लिए सनातन धर्म की परम्परा के अनुसार श्रद्धापूर्वक, विधिपूर्वक और यथाशक्ति श्राद्ध करना पितरों के प्रति कर्तव्य माना जाता है।
अन्न, जल, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन का महत्त्व इसी धार्मिक विधान में निहित है।
पितरों की तृप्ति का वर्णन शास्त्रों में आध्यात्मिक और धार्मिक सिद्धान्त के रूप में किया गया है।
इसका सम्मान करते हुए मूल ग्रन्थ के कथन, उसके भावार्थ और आधुनिक प्रत्यक्ष प्रमाण के बीच का अन्तर बनाए रखना ही शुद्ध एवं सच्चोट शास्त्रीय विवेचन है।
।। ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः ।। ।। सर्वे पितरः प्रीयन्ताम् ।।
जय श्री राम 🙏🌹 जय श्री राधे कृष्णा 🌹🔱 हर हर महादेव हर...!! जय माताजी 🙏
!!!!! शुभमस्तु !!!
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बहुत सुंदर 🙏🙏🙏
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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