सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। ज्योतिष में श्राद्ध का महातम ओर महत्व- 1।।
ज्योतिष में श्राद्ध का महातम ओर महत्व -1
पितृऋण, पितृसम्मान, पितृपक्ष, तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध के धार्मिक एवं ज्योतिषीय पक्ष का शास्त्रोक्त विवेचन ;
सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन को केवल वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं माना गया है।
धर्मशास्त्रीय परंपरा में देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण का विशेष उल्लेख मिलता है।
मनुष्य अपने माता - पिता, पूर्वजों और परिवार की परंपराओं से प्राप्त जीवन, संस्कार, ज्ञान तथा उत्तरदायित्वों का स्मरण करता है।
इसी कृतज्ञता को धार्मिक आचरण में व्यक्त करने के प्रमुख माध्यमों में से एक है — श्राद्ध कर्म।
आज आश्विन मास कृष्ण पक्ष वर्षा ऋतू पंचमी सोमवार भरणी नक्षत्र है
आज चंद्र षष्ठी है चंद्रोदय रात्रि ९ \१९ आज पंचमी और भरणी की श्राद्ध होगी कल षष्ठी की श्राद्ध होगी
इसी प्रकार श्राद्ध की जानकारी प्रतिदिन दे दी जायेगी !
श्राद्ध केवल किसी दिवंगत परिजन को याद करने की एक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, कर्तव्य, दान, तर्पण और पूर्वजों के प्रति सम्मान से जुड़ा हुआ धार्मिक अनुष्ठान है।
वेदों की पितृपरंपरा, गृह्यसूत्रों, धर्मसूत्रों, स्मृतिग्रंथों और पुराणों में पितरों के निमित्त किए जाने वाले विभिन्न कर्मों का वर्णन मिलता है।
ज्योतिष में भी पितृ, सूर्य, नवम भाव, पंचम भाव तथा कुंडली में ग्रहों की स्थितियों पर विचार करते समय पारंपरिक ज्योतिषी पूर्वजों से संबंधित धार्मिक मान्यताओं की चर्चा करते हैं।
लेकिन इन विषयों को समझते समय शास्त्र में वर्णित धार्मिक विधान और बाद की ज्योतिषीय व्याख्याओं के बीच अंतर करना आवश्यक है।
गृहों का राशि में संचरण ;
सूर्य / सिंह
चंद्र / मेष
मंगल / मेष
बुध / कन्या
गुरु / धनु
#शुक्र / कर्क
शनि / मकर
#राहु / मिथुन
# केतु / धनु
#नोट # चिन्ह वक्री की पहचान है !
श्राद्ध शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है ?
‘श्राद्ध’ शब्द का संबंध ‘श्रद्धा’ से है।
सामान्य धार्मिक अर्थ में श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त किया जाने वाला कर्म श्राद्ध कहलाता है।
इस में संकल्प, पितृस्मरण, तर्पण, पिण्डदान, ब्राह्मण भोजन तथा दान आदि का विधान परंपरा और अवसर के अनुसार मिलता है।
श्राद्ध का मुख्य आधार दिखावा, भय अथवा धन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धा और कर्तव्य है।
सविषोप्यमृतायते भवाछवमुण्डाभरणोपि पावन:।
भव एव भवान्तक: सतां समदृखिवषमेक्षणोपि सन् ॥
हे शम्भो! आप विष सहित होते हुए भी अमृत के समान हैं, शवों के मुण्डों से सुशोभित होते हुए भी पवित्रा हैं।
स्वयं ;जगत् के उत्पादकद्ध भव होते हुए भी, सज्जनों के या सन्तों के ;सांसारिक बन्ध्नद्ध को दूर करने वाले हैं।
विषमनेत्रा अर्थात् तीन नेत्रा ;
सूर्य, अग्नि, चन्द्र नेत्राद्ध वाले होते हुए भी समदृष्टि !
अर्थात् पक्षपात रहित है !
तैत्तिरीयोपनिषद् की शिक्षावल्ली में उपदेश दिया गया है—
“देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।”
अर्थात् देवकार्य और पितृकार्य के प्रति प्रमाद नहीं करना चाहिए।
इसी उपनिषद् में आगे कहा गया है—
“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।”
अर्थात् माता और पिता को देवतुल्य सम्मान देने वाला आचरण करो।
यह शिक्षा माता - पिता के सम्मान और पितृकर्तव्य की वैदिक पृष्ठभूमि को समझने में सहायक है।
यहाँ एक बात समझना आवश्यक है कि उपनिषद् का यह उपदेश पितृसम्मान और पितृकार्य की महत्ता बताता है।
श्राद्ध की प्रत्येक विधि का विस्तृत विधान इसी एक मंत्र में नहीं दिया गया है;
उसके लिए अन्य धर्मग्रंथों और कर्मकाण्डीय परंपराओं का भी अध्ययन करना चाहिए।
| Theme | Religious |
| Brand | Divya Shakti |
| Colour | Black |
| Style | Traditional |
| Material | Stone |
| Occasion | home décor |
| Specific Uses For Product | home décor |
| Number of Pieces | 2 |
| Finish Type | Natural |
| Item Weight | 400 g |
{ About this item
- Shaligram ji with two chakra<br>
- Shaligram is a sacred stone found in Gandaki river found in the Muktinath area of Nepal and is a representation of Lord Vishnu. Natural product. No fixed size, shape and color will be black or dark gray<br>
- The worshipper of Shaligram Stone is able to take wise decisions in business or family and experience immense peace and prosperity in his life<br>
- The worshiper of Shaligram gets wisdom, good virtues, courage and success in all his endeavors<br>
- Shaligram has this power to provide tremendous confidence to take on any challenge to the person who posses it and he emerges out to be an ultimate winner<br>
वेदों में पितरों का स्थान ;
वैदिक साहित्य में देवताओं के साथ पितरों का भी उल्लेख मिलता है।
ऋग्वेद के पितृसूक्तों में पूर्वजों का स्मरण, उनके प्रति सम्मान और उनके कल्याण की प्रार्थना दिखाई देती है।
वैदिक परंपरा में पितरों के लिए श्रद्धा तथा यज्ञीय कर्मों का अपना स्थान है।
तैत्तिरीय आरण्यक में महायज्ञों की परंपरा के अंतर्गत पितृयज्ञ और पितृमेध से संबंधित सामग्री मिलती है।
इस से स्पष्ट होता है कि पूर्वजों के प्रति कर्तव्य की अवधारणा भारतीय धार्मिक परंपरा में प्राचीन है।
पितरों के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल दिवंगत व्यक्तियों के लिए अनुष्ठान करना ही नहीं है।
उनके द्वारा दिए गए संस्कारों, सदाचार, परिवार की जिम्मेदारियों और धर्मसम्मत जीवन - मूल्यों को आगे बढ़ाना भी इस भावना का महत्वपूर्ण पक्ष है।
इस लिए श्राद्ध के धार्मिक महत्व को केवल एक दिन के कर्मकाण्ड तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।
इस का व्यापक संदेश है —
अपने पूर्वजों को स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञ रहना और परिवार में धर्म तथा सदाचार की परंपरा को बनाए रखना।
+++
+++
पत्नी पति के पीछे क्यों चलती है ?
पति पत्नी जीवन की गाड़ी के दो पहिए है।
जिसको संतुलित करने के लिए एक को आगे और एक को पीछे चलना पड़ता है।
और बात रही पत्नियों के पीछे चलने की तो भारतीय पत्नी को अपने आप पर गर्व होना चाहिए क्योंकि गाड़ी के पिछले पहिए पर ही अधिक भार होता है-
और भारतीय महिला उस भार को बड़ी सहजता से संभाल लेती है!
जीवन साथी को छोड़कर इस पूरी दुनियां मे आपका अपना कोई नही बन सकता है!
इस लिए समय रहते अपने जीवन साथी की कीमत पहचानो।
तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेज: प्रदीपनम्
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।
तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
महान् तेज के प्रकाशक, जगत् के कर्ता, महा पापहारी उन सूर्य भगवान् को मैं नमस्कार करता हूं।
ज्ञान - विज्ञान तथा मोक्ष के प्रदाता, बड़े बड़े पापों के अपहरण कर्ता, जगत् के स्वामी उन भगवान् सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूं।'
+++
+++
पितृऋण का धार्मिक महत्व ;
धर्मशास्त्रीय परंपरा में पितृऋण की अवधारणा बताती है कि मनुष्य अपने पूर्वजों से प्राप्त जीवन और संस्कारों के प्रति उत्तरदायी है।
परिवार में जन्म, पालन - पोषण, शिक्षा, आजीविका के संस्कार और सामाजिक पहचान अनेक पीढ़ियों के योगदान से आगे बढ़ते हैं।
पितृऋण का भाव इन योगदानों को स्वीकार करने तथा अपनी क्षमता के अनुसार कर्तव्य निभाने से जुड़ा है।
परंपरागत रूप से पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और दान किए जाते हैं।
साथ ही जीवित माता - पिता की सेवा, वृद्धजनों का सम्मान, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और सदाचार भी पितृसम्मान की भावना के अनुरूप हैं।
श्राद्ध करने वाला व्यक्ति अपने पूर्वजों के नाम और गोत्र का स्मरण करके यह स्वीकार करता है कि उसका जीवन अकेले उसी का बनाया हुआ नहीं है।
वह एक पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपरा का उत्तराधिकारी है।
यही कारण है कि श्राद्ध को कृतज्ञता और उत्तरदायित्व का धार्मिक प्रतीक माना जाता है।
|| ॐ आदित्याय नमः ||
+++
+++
+++
+++


बहुत सुंदर 🙏🙏🙏
ReplyDeleteSuperb
ReplyDelete