सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।।ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म-3।।
ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म-3
पितृऋण, पितृसम्मान, पितृपक्ष, तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध के धार्मिक एवं ज्योतिषीय पक्ष का शास्त्रोक्त विवेचन ;
सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन को केवल वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं माना गया है।
श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम् ।।
"श्रद्धा पूर्वक दिया या किया गया कार्य श्राद्ध है" !
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्राद्ध में पितरों को उद्देश्य बनाकर श्रद्धापूर्वक अर्पण किया जाता है।
तर्पण में जल अर्पित किया जाता है और पिण्डदान में निर्धारित विधि के अनुसार पिण्ड अर्पित किए जाते हैं।
इन कर्मों का स्वरूप परिवार की परंपरा, कुलाचार और संबंधित धार्मिक विधान के अनुसार भिन्न हो सकता है।
यहाँ यह समझना जरूरी है कि पुराणों में वर्णित परलोक तथा पितृतृप्ति संबंधी बातें धार्मिक आस्था और शास्त्रीय मान्यताओं का हिस्सा हैं।
इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध किए गए तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
फिर भी धार्मिक जीवन में इन कर्मों का उद्देश्य स्पष्ट है—
पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और अपने धर्मसम्मत दायित्वों का पालन।
श्राद्ध के प्रमुख प्रकार ;
धर्मशास्त्रीय तथा कर्मकाण्डीय परंपराओं में श्राद्ध के कई प्रकार बताए गए हैं।
सभी श्राद्ध एक ही उद्देश्य, अवसर अथवा विधि से नहीं किए जाते।
1. नित्य श्राद्ध: परंपरागत ग्रंथों में नियमित रूप से किए जाने वाले पितृकर्मों की चर्चा मिलती है।
इसका वास्तविक स्वरूप संबंधित गृह्यसूत्र और कुलाचार के अनुसार समझा जाना चाहिए।
2. नैमित्तिक श्राद्ध: किसी विशेष निमित्त, जैसे परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद निर्धारित संस्कारों अथवा अन्य विशिष्ट अवसरों पर किए जाने वाले श्राद्ध को इस श्रेणी में समझा जाता है।
3. काम्य श्राद्ध: किसी विशिष्ट धार्मिक उद्देश्य की कामना से शास्त्रीय विधान के अनुसार किए जाने वाले श्राद्ध का उल्लेख परंपरागत कर्मकाण्डीय साहित्य में मिलता है।
4. पार्वण श्राद्ध: अमावस्या, पितृपक्ष तथा निर्धारित पर्वकाल में पितरों के निमित्त किया जाने वाला श्राद्ध इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है।
इस की विधि में पितृसमूह और विश्वेदेवों से संबंधित विधान भी परंपरा के अनुसार आते हैं।
5. एकोदिष्ट श्राद्ध: किसी एक विशिष्ट दिवंगत व्यक्ति को उद्देश्य बनाकर किए जाने वाले श्राद्ध के लिए इस नाम का प्रयोग होता है।
मृत्यु के बाद के संस्कारों में इसका विशेष महत्व है।
6. वृद्धिश्राद्ध या नान्दीमुख श्राद्ध: विवाह, संतान - जन्म अथवा अन्य मांगलिक संस्कारों से संबंधित कुछ परंपराओं में पूर्वजों के मंगलकारी स्मरण के लिए नान्दीमुख पितरों का आह्वान किया जाता है।
इसका विधान सामान्य पितृपक्षीय श्राद्ध से अलग हो सकता है।
इन प्रकारों के नाम, वर्गीकरण और विधि में विभिन्न धर्मनिबंधों तथा क्षेत्रीय परंपराओं में कुछ अंतर मिल सकते हैं।
इस लिए किसी विशेष श्राद्ध की विधि निर्धारित करते समय केवल सामान्य सूची के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए।
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिला: ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ।।
वसिष्ठस्मृति ११/३२
"श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त पवित्र है-
दौहित्र, कुतपकाल तथा तिल ( काले ) और तीन वस्तुएँ अत्यन्त प्रशंसनीय हैं-
बाहर - भीतर की शुद्धि, क्रोध न करना तथा जल्दबाज़ी न करना ।"
पितृपक्ष का विशेष महत्व ;
भाद्रपद मास की पूर्णिमा के आसपास आरंभ होने वाली और आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाली पितृपक्ष की परंपरा हिंदू धार्मिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
तिथि - निर्धारण में स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।
इस पक्ष में परिवार के दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी तथा अन्य पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान किए जाते हैं।
सामान्यतः जिस तिथि को किसी परिजन का देहांत हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा प्रचलित है।
कुछ विशेष परिस्थितियों में अलग नियम लागू होते हैं।
पितृपक्ष का महत्व इस विचार में निहित है कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता केवल स्मृति में ही नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य के रूप में भी व्यक्त की जाए।
इस अवसर पर सात्त्विक भोजन, दान, संयम, प्रार्थना और पितरों के स्मरण को महत्व दिया जाता है।
परिवार अपनी परंपरा के अनुसार योग्य आचार्य से विधि जानकर श्राद्ध करता है।
पितृपक्ष को लेकर भय फैलाना उचित नहीं है।
इस का मूल भाव श्रद्धा, स्मरण और कर्तव्य है, न कि यह धारणा कि कोई छोटी - सी त्रुटि होने पर परिवार पर अवश्य कोई विपत्ति आ जाएगी।
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्कर:।
स काल: कुतपो ज्ञेय: पितृणां दत्तमक्षयम् ।।
वसिष्ठस्मृति ११/३३
"दिन के आठवे मुहूर्त में जब सूर्य का ताप घटने लगता है, उस समय को 'कुतप' कहते हैं ।
इस समय ( कुतप ) में पितरों के लिए किया श्राद्ध, दान आदि अक्षय होता है।"
एक मुहूर्त अड़तालीस मिनट का होता है ।
मुहूर्त की गणना सूर्योदय से आरम्भ की जाती है ।
अमावस्या और पितृकर्म का संबंध ;
हिंदू पंचांग में अमावस्या को पितृकर्म के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
अनेक परंपराओं में इस दिन तर्पण, श्राद्ध और दान किया जाता है।
गरुड़ पुराण के श्राद्ध संबंधी प्रसंगों में अमावस्या तथा अन्य निर्धारित तिथियों पर श्राद्ध के अवसरों का वर्णन मिलता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से अमावस्या सूर्य और चंद्रमा के एक ही राशि - क्षेत्र में आने की स्थिति से संबंधित तिथि है।
धार्मिक परंपरा में इसका संबंध आत्मचिंतन, उपासना और पितृस्मरण से भी जोड़ा गया है।
लेकिन अमावस्या के दिन श्राद्ध करने का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति के लिए हर अमावस्या पर एक ही प्रकार का अनुष्ठान अनिवार्य है।
किसी के माता - पिता की मृत्यु की तिथि, परिवार की परंपरा और संबंधित धार्मिक विधान के अनुसार कर्म निर्धारित होते हैं।
विशेष रूप से सर्वपितृ अमावस्या को उन पितरों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है, जिनकी निर्धारित तिथि पर श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया हो।
इस की विधि और पात्रता के लिए संबंधित कुलाचार का पालन करना चाहिए।
+++
+++
ज्योतिष में पितृ, सूर्य और नवम भाव का संबंध ;
अब प्रश्न आता है कि ज्योतिष में श्राद्ध का क्या महत्व है ?
पारंपरिक वैदिक ज्योतिष में सूर्य को आत्मकारक, तेज, पिता, प्रतिष्ठा तथा अधिकार का प्रतीक माना जाता है।
नवम भाव धर्म, भाग्य, गुरु, उच्च संस्कार और परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
पंचम भाव को पूर्वपुण्य, बुद्धि, संतान और मंत्रविद्या से संबंधित माना जाता है।
इन भावों और ग्रहों की व्याख्या अलग - अलग ज्योतिषीय ग्रंथों तथा परंपराओं में विस्तार से की जाती है।
पितरों के विषय में कुंडली देखते समय कुछ ज्योतिषी सूर्य, नवम भाव, पंचम भाव, उनके स्वामियों तथा राहु - केतु की स्थिति पर विचार करते हैं।
हालाँकि, किसी एक ग्रह, एक भाव या एक योग के आधार पर यह निश्चित घोषित नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति के पितर असंतुष्ट हैं या उसके परिवार पर पितृदोष है।
जन्मकुंडली में सूर्य का नीच होना, राहु के साथ संबंध होना अथवा नवम भाव में किसी ग्रह का स्थित होना अपने आप में पितृदोष का सार्वभौमिक प्रमाण नहीं है।
अलग - अलग ज्योतिषीय परंपराएँ इन योगों की व्याख्या अलग प्रकार से करती हैं।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति के जीवन में नौकरी, विवाह, संतान, आर्थिक स्थिति अथवा स्वास्थ्य से संबंधित कठिनाई आने पर उसे सीधे पितृदोष का परिणाम बताना उचित नहीं है।
ऐसे विषयों के अनेक वास्तविक कारण हो सकते हैं।
श्राद्ध धार्मिक कर्तव्य है; उसे कुंडली में भय दिखाकर किसी विशेष पूजा या महँगे अनुष्ठान को बेचने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए।
+++
+++
पितृदोष की पारंपरिक ज्योतिषीय अवधारणा ;
ज्योतिष में ‘पितृदोष’ शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया जाता है।
कुछ परंपराएँ इसे पूर्वजों से संबंधित धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा, कुछ विशिष्ट ग्रहयोगों और कुछ कर्मफल संबंधी मान्यताओं से जोड़ती हैं।
परंतु सभी ज्योतिषीय ग्रंथों और परंपराओं में पितृदोष की एक ही परिभाषा या एक ही निश्चित ग्रहयोग स्वीकार नहीं किया गया है।
इसी कारण केवल किसी ज्योतिषी द्वारा पितृदोष बताए जाने के आधार पर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
पहले यह समझना चाहिए कि वह किस ग्रंथ, किस परंपरा और किस विशिष्ट योग के आधार पर ऐसा कह रहा है।
धार्मिक दृष्टि से अपने दिवंगत माता - पिता और पूर्वजों का श्राद्ध करना श्रद्धा तथा कर्तव्य का विषय है।
इसे केवल तभी करने योग्य नहीं मानना चाहिए, जब कुंडली में कोई कथित दोष बताया जाए।
इसी प्रकार यह दावा करना भी उचित नहीं कि श्राद्ध करने से हर प्रकार की बाधा निश्चित रूप से दूर हो जाएगी।
शास्त्रीय धार्मिक अनुष्ठान का महत्व अपनी जगह है, जबकि जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए व्यावहारिक प्रयास, विवेक और आवश्यक सहायता भी महत्वपूर्ण हैं।
जय श्री कृष्ण...!!!
!!!!! शुभमस्तु !!!
+++
+++
+++
+++

उपयोगी जानकारी
ReplyDeleteबहुत सुंदर 🙏🙏🙏
ReplyDelete