।।ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 5 ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।।ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 5।।

ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म  - 5

|| श्राद्ध न करने वाले को कष्ट- ||

श्राद्ध न करने वाले को कष्ट — शास्त्रोक्त मान्यता, पितृऋण और पितरों के प्रति कर्तव्य ;

सनातन धर्म में श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान को पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता तथा पारिवारिक कर्तव्य से जुड़ा हुआ धार्मिक कर्म माना गया है।

मनुष्य अपने जीवन में माता - पिता, पूर्वजों और परिवार की अनेक पीढ़ियों से प्राप्त संस्कारों, परंपराओं तथा सहयोग का ऋणी होता है। 

इसी भाव को धार्मिक परंपरा में पितृऋण कहा गया है।

श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना, उनके निमित्त शास्त्रविहित कर्म करना तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान, अन्नदान और सत्कर्म करना है।

श्राद्ध न करने वाले को पग पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है।

मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे सम्बन्धीओ का रक्त चूसने लगता है-

श्राद्धं न कुरूते मोहात् तस्य रक्तं पिबन्ति ते।
               (ब्रह्मपुराण)

पितरस्तस्य शापं दत्तवा प्रयान्ति च
        (नागरखण्ड)

फिर यह अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट झेलना पड़ता है।







Nozvera Modern Radha Krishna Wall Painting with Frame - Sparkle Glossy Round Golden Framed Large Painting for Office, Living Room, Bedroom, Home Wall Decoration (Design 03, 40 CM * 40 CM)

https://amzn.to/3VjFUmE





{ About this item

  • Premium Quality Wall Painting: This Radha Krishna wall painting is made with high-gloss photo paper and glossy sparkle laminated, ensuring vibrant colors and long-lasting durability for your home décor.
  • Radha Krishna Painting with Frame: The Radha Krishna painting with frame adds an elegant and divine touch, perfect for enhancing wall decor for bedroom or wall painting for living room.
  • Golden Framed Artwork: The painting is elegantly golden framed, adding a luxurious and sophisticated touch to any room, complementing Radha Krishna painting beautifully.
  • Painting for Wall Decoration: This Radha Krishna painting big size is ideal for paintings for wall decoration, offering a striking focal point in any room with its detailed craftsmanship and high-gloss finish.
  • Krishna Radha Painting Frame: Beautiful Krishna Radha painting frame design with rich detail, perfect for wall frames for home decoration that bring out the charm of traditional Indian art.
  • Bedroom Wall Decor: Elevate your bedroom wall decor with this stunning Krishna wall painting, offering peaceful and spiritual ambiance for your personal space.
  • Radha Krishna Wall Hanging Decor: Perfect for Radha Krishna wall hanging decor, this piece serves as a Radha Krishna wall hanging that can be displayed in any room to create a serene atmosphere.






पुराणों और धर्मशास्त्रों में पितरों के सम्मान तथा उनके निमित्त किए जाने वाले कर्मों का वर्णन मिलता है। 

हालांकि श्राद्ध न करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जीवनभर कष्ट ही मिलता है, अथवा मृत व्यक्ति सचमुच अपने संबंधियों का रक्त पीता है—

ऐसे कथनों को बिना मूल ग्रंथ, अध्याय और प्रसंग की पुष्टि के निर्विवाद शास्त्रीय तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। 

उस परिवार में पुत्र नही उत्पन्न होता, कोई निरोग नही रहता, लम्बी आयु नही होती, किसी तरह का कल्याण नही होता और मरने के बाद नरक भी जाना पड़ता है।

इस लेख में श्राद्ध का धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्त्व, पितृऋण, श्राद्ध न करने के विषय में प्रचलित मान्यताओं और शास्त्रों की शिक्षाओं का विवेचन किया गया है। 

श्राद्ध शब्द का अर्थ और धार्मिक आधार ;


‘श्राद्ध’ शब्द श्रद्धा से संबंधित है। 

पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक, विधि और सामर्थ्य के अनुसार जो धार्मिक कर्म किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। 

इस में केवल अन्न अर्पित करना ही नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और अपने पारिवारिक दायित्व का निर्वाह भी सम्मिलित है।

सनातन धर्म की परंपरा में देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण का उल्लेख मिलता है। 

पितृऋण का भाव यह है कि मनुष्य अपने पूर्वजों से प्राप्त जीवन, संस्कार और परंपराओं को स्मरण करे तथा उनके प्रति कृतज्ञ रहे।

तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षाओं में देवकार्य और पितृकार्य के प्रति प्रमाद न करने का निर्देश मिलता है। 

इसका प्रसिद्ध पाठ है—

“देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।”

अर्थात् देवताओं और पितरों से संबंधित कर्तव्यों में उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

यह निर्देश पितृकार्य को धार्मिक जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग मानने की शिक्षा देता है। 

इस का आशय यह नहीं कि हर विपत्ति का कारण श्राद्ध न करना ही है, बल्कि यह कि धार्मिक कर्तव्य को जानबूझकर तुच्छ समझकर छोड़ना उचित नहीं माना गया है।

श्राद्ध न करने वाले के विषय में पुराणों में वर्णित कठोर चेतावनी ;


श्राद्ध के महात्म्य पर चर्चा करते समय एक श्लोक प्रायः उद्धृत किया जाता है—

न सन्ति पितरश्चेति कृत्वा मनसि यो नरः।
श्राद्धं न कुरुते तत्र तस्य रक्तं पिबन्ति ते॥

इस का प्रचलित भावार्थ है—

जो मनुष्य मन में यह विचार करके कि पितर हैं ही नहीं, श्राद्ध नहीं करता, उसके संबंध में पितरों की अतृप्ति और उनके अप्रसन्न होने की कठोर धार्मिक चेतावनी दी गई है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है। 

इस श्लोक का पाठ विभिन्न धार्मिक संकलनों में मिलता है। 

कुछ आधुनिक लेख इसे ब्रह्मपुराण से जोड़ते हैं, जबकि धर्मकर्म संबंधी अन्य संकलनों में इसे आदित्यपुराण के नाम से उद्धृत किया गया है। 

इस लिए मूल पुराण के अध्याय और प्रमाणित संस्करण की पुष्टि के बिना किसी एक ग्रंथ का निश्चित संदर्भ देना उचित नहीं होगा।  

इस श्लोक में प्रयुक्त ‘रक्त पीना’ अत्यंत कठोर और प्रभावशाली भाषा है। 

धार्मिक व्याख्या में इसे पितरों की उपेक्षा के गंभीर परिणाम का प्रतीकात्मक वर्णन माना जा सकता है। 

लेकिन केवल इस पद के आधार पर यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि दिवंगत व्यक्ति सचमुच शारीरिक रूप से अपने वंशजों का रक्त पीता है।

शास्त्रों के ऐसे वचनों का अध्ययन करते समय उनके मूल पाठ, प्रसंग, परंपरागत व्याख्या और धार्मिक उद्देश्य को समझना आवश्यक है। 

इनका उद्देश्य मनुष्य को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक करना है।

उपनिषद् मे कहा गया है कि-
  देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्
     ( तै.उप.1/11/1)

अर्थात देवता तथा पितरो के कार्य मे मनुष्य को कदापि प्रमाद नही करना चाहिए। 

प्रमाद से प्रत्यवाय होता है।

नागरखण्ड में पितरों के शाप से संबंधित कथन ;


श्राद्ध के संबंध में एक अन्य वाक्य भी प्रचलित है—

“पितरस्तस्य शापं दत्त्वा प्रयान्ति च।”

इस का सामान्य अर्थ है—

पितर उसे शाप देकर चले जाते हैं।

यह वाक्य श्राद्ध न करने के दुष्परिणामों की चर्चा करने वाले धार्मिक लेखों में नागरखण्ड के नाम से उद्धृत होता है। 

हालांकि, इसका निश्चित अध्याय, श्लोक-संख्या और मूल पाठ प्रमाणित संस्करण से मिलाए बिना इसे पूर्णतः सत्यापित संदर्भ के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। 

धार्मिक मान्यता के स्तर पर इस कथन का संदेश यह है कि मनुष्य अपने पूर्वजों को विस्मृत न करे। 

अपने परिवार की दिवंगत पीढ़ियों का सम्मान करना, उनके निमित्त प्रार्थना करना तथा धर्मसम्मत कर्तव्यों का पालन करना उचित माना गया है।

लेकिन इस कथन को आधार बनाकर किसी परिवार को निश्चित रूप से शापित घोषित कर देना उचित नहीं है। 

किसी व्यक्ति की बीमारी, आर्थिक परेशानी, संतान संबंधी कठिनाई या अन्य विपत्ति का कारण केवल पितरों का शाप है—

ऐसा निष्कर्ष इन उद्धरणों से अपने आप सिद्ध नहीं होता।

आज आश्विन मास कृष्ण पक्ष  वर्षा ऋतू सप्तमी बुधवार   कृत्तिका / रोहिणी नक्षत्र है

आज महालक्ष्मी व्रत पूजन अनुष्ठान समाप्ति (   अर्धरात्रि चंन्द्रोदय व्यापिनी ग्राह्य )  

चंन्द्रोदय (रा १० \ २४  सप्तमी  की श्राद्ध होगी  

आज  स्वर्ग  की भद्रा  दिन में ८ \ ५९ तक
सर्वार्थ सिद्धयोग सम्पूर्ण दिन रवि योग दिन  में ८ \ ४० तक  बाद 

कल अष्टमी की श्राद्ध होगी और  जीवत्पुत्रिका व्रत  होगा....!


 



इसी प्रकार श्राद्ध की जानकारी प्रति दिन दे दी जायेगी 

गृहों का राशि में संचरण 
सूर्य / सिंह 
चंद्र /  वृष  
मंगल / मेष  
बुध /  कन्या 
गुरु / 4धनु 
#शुक्र / कर्क 
शनि मकर 
#राहु मिथुन
#  केतु / धनु 

#नोट # चिन्ह वक्री  की पहचान है

श्राद्ध और पितृऋण का संबंध ;


पितृऋण का सिद्धांत श्राद्ध की धार्मिक भावना को समझने में विशेष सहायता करता है।

मनुष्य अपने माता-पिता और पूर्वजों से जीवन, भाषा, संस्कार, पारिवारिक परंपरा और अनेक प्रकार की सीख प्राप्त करता है। 

पूर्वजों ने जिस परिवार और सामाजिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया, उसी परंपरा का उत्तराधिकारी अगली पीढ़ी बनती है।

इस लिए पितरों का स्मरण केवल मृत्यु के बाद किए जाने वाले कर्मकांड तक सीमित नहीं है। 

उनके प्रति सम्मान, परिवार में सदाचार, माता - पिता की सेवा, वृद्धों की सहायता और आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार देना भी इसी व्यापक भावना से जुड़ा है।

श्राद्ध के दिन दिवंगत माता - पिता तथा पितरों के निमित्त तर्पण, पिण्डदान, ब्राह्मण - भोजन और दान आदि कर्म परंपरा तथा निर्धारित विधि के अनुसार किए जाते हैं। 

अलग - अलग परंपराओं में विधि और नियमों में अंतर हो सकता है।

श्राद्ध का मूल भाव यह है कि मनुष्य अपने पूर्वजों को केवल स्मृति से नहीं, बल्कि श्रद्धापूर्वक किए गए धार्मिक कर्तव्य से भी सम्मान दे।

पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है....! 

उसे श्राद्ध कहते हैं -

श्रद्धया पितॄन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्। 

श्रद्धासे ही श्राद्ध शब्दकी निष्पत्ति होती है-

श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्', श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम्',' श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छ्राद्धम्' तथा 'श्रद्धया इदं श्राद्धम् '। 

अर्थात् अपने मृत पितृगण के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले कर्मविशेष को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है। 

इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं, जिसका वर्णन मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों, पुराणों तथा वीरमित्रोदय, श्राद्धकल्पलता, श्राद्धतत्त्व, पितृदयिता आदि अनेक ग्रन्थोंमें प्राप्त होता है।

महर्षि पराशर के अनुसार 'देश, काल तथा पात्र में हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म तिल ( यव ) और दर्भ ( कुश ) तथा मन्त्रों से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाय, वही श्राद्ध है।

देशे काले च पात्रे च विधिना हविषा च यत्। 
 तिलैर्दर्भेश्च मन्त्रैश्च श्राद्धं स्याच्छूद्धया युतम् ।।

महर्षि बृहस्पति तथा श्राद्धतत्त्वमें वर्णित महर्षि पुलस्त्य के वचनके अनुसार- 

'जिस कर्मविशेष में दुग्ध, घृत और मधु से युक्त सुसंस्कृत ( अच्छी प्रकारसे पकाये हुए ) उत्तम व्यंजन को श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्य से ब्राह्मणादि को प्रदान किया जाय, उसे श्राद्ध कहते हैं ।

संस्कृतं व्यञ्जनाद्यं च पयोमधुघृतान्वितम् ।
  श्रद्धया दीयते यस्माच्छ्राद्धं तेन निगद्यते ॥

इसी प्रकार ब्रह्मपुराण में भी श्राद्ध का लक्षण लिखा है- 

'देश, काल और पात्र में विधिपूर्वक श्रद्धा से पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मण को दिया जाय,उसे श्राद्ध कहते हैं।'

 देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्।
   पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ॥

श्राद्ध कर्ता का भी कल्याण जो प्राणी विधिपूर्वक शान्तमन होकर श्राद्ध करता है...! 

वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है तथा फिर संसार - चक्र में नहीं आता।

योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्याद् वै शान्तमानसः ।
     व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः॥

भगवद्गीता में पितरों के संबंध में क्या कहा गया है ?


श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता 9.25 

इसका भावार्थ है—

देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों की उपासना करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं और भगवान की उपासना करने वाले भगवान को प्राप्त होते हैं।

यह श्लोक विभिन्न प्रकार की उपासना और उनके लक्ष्य का वर्णन करता है। 

इस से स्पष्ट होता है कि पितृ-उपासना और पितरों से संबंधित धार्मिक कर्म सनातन परंपरा में मान्य स्थान रखते हैं।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि गीता के इस श्लोक में श्राद्ध न करने वाले के परिवार को जीवनभर कष्ट मिलने या पितरों द्वारा रक्त पीने का वर्णन नहीं है। 

इस लिए गीता के इस श्लोक को श्राद्ध के धार्मिक महत्त्व के समर्थन में उद्धृत किया जा सकता है, लेकिन इसे उन कठोर दावों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं बताना चाहिए।

श्राद्ध न करने पर परिवार को कष्ट मिलने की मान्यता ;


धार्मिक परंपराओं में यह मान्यता मिलती है कि पितरों के प्रति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने से पितृऋण की पूर्ति नहीं होती और यह आध्यात्मिक दृष्टि से अनुचित माना जाता है। 

कुछ धार्मिक ग्रंथों और कर्मकांड संबंधी निबंधों में श्राद्ध की उपेक्षा की निंदा करते हुए परिवार के कल्याण, संतान, आरोग्य और सुख-संपन्नता के विषय में कठोर चेतावनियाँ दी गई हैं। 

इस मान्यता के आधार पर श्राद्ध को पूर्वजों के सम्मान और पारिवारिक धार्मिक उत्तरदायित्व से जुड़ा हुआ कर्म माना जाता है।

फिर भी, इन कथनों की व्याख्या में विवेक आवश्यक है। 

प्रत्येक परिवार में आने वाली कठिनाई को पितृदोष का परिणाम मानना उचित नहीं है। 

बीमारी के चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं, आर्थिक कठिनाइयों के सामाजिक और व्यावहारिक कारण हो सकते हैं तथा पारिवारिक समस्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं।

इसी प्रकार किसी परिवार में संतान न होना, किसी सदस्य की असमय मृत्यु हो जाना या व्यवसाय में हानि होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि पितरों ने शाप दिया है।

श्राद्ध के महात्म्य को स्वीकार करने के लिए किसी दुखी परिवार को भयभीत करना आवश्यक नहीं है। 

धार्मिक कर्म का उद्देश्य श्रद्धा, कर्तव्य और सदाचार को प्रोत्साहित करना होना चाहिए।


amazon


Pure Source India Brass Pooja Kalash Lota/Pooja Article/Pooja Item for Pooja and Decoration (650 ml) (4.25 INCH)

Visit the Pure Source India Store  https://link.amazon/B08gxX3RW



  • Item: Brass Pooja Kalash Lota/ Pooja Article For Pooja and Decoration (650 ml) (4.25 INCH)
  • Material: Brass Capacity: 650ml Weight: 422gm Dimension: 4 X 4 X 4.25 INCH (LXWXH)
  • This kalash is great for keeping in temple. This kalash can be useful in pooja, home decorate, wedding and many more. Pure Brass with glossy golden polish finishing beautifully handcrafted with engraving 100% Pure Brass.
  • In indian culture it is not only used for worshiping but it is also a part of adorning our kitchen traditionally. This item has elegant design and gives addition to your home décor, diwali, office, restaurant pooja room etc
  • Brass enhance your home décor & gives an elegant look to your space. Authentic & a value gift for every occasion. The Brass is premium utensil and every one want to keep brass kalash / lota in house for there regular or use at puja time, kalash is also favorite item to gift in Wedding, Diwali, Grihpravesh, Durga Puja, Chath Puja etc.



कैसे दें पितृों को तर्पण....!!


♦ भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। 

शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस - पास रहते हैं...! 

इस लिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें जिससे पितृगण नाराज हों।

♦ पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 

पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, मामा, गुरु, नाती को भोजन कराना चाहिए। 

इस से पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

♦ ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं...! 

जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं।

♦ पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव - जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। 

हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकाल कर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए।

♦ मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। 

शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।

♦ हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं...! 

उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए।

♦ इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करते हैं...! 

उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। 

जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती....! 

उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं....! 

जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।

♦ आश्विन कृष्ण प्रतिपदा: इस तिथि को नाना - नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। 

इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। 

यदि नाना - नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।

♦ पंचमी: जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो...! 

उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।

♦ नवमी: सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो....! 

उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। 

यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। 

इस लिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। 

मान्यता है कि इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

♦ एकादशी और द्वादशी: एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। 

अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।

♦ चतुर्दशी: इस तिथि में शस्त्र, आत्म - हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है...! 

जब कि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।

♦ सर्वपितृमोक्ष अमावस्या: किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है...! 

तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। 

शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है।

♦ यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो....! 

उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। 

बाकी तो जिनकी जो तिथि हो...! 

श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। 

यही उचित भी है। 

पिंडदान करने के लिए सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें।

♦ जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं....! 

वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।

विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। 

यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है -

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।।
(वायु पुराण) ।।

♦ श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। 

प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। 

हमारे धर्म - ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। 

सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊध्र्व कक्षा में पितृलोक है जहां पितृ रहते हैं। 

पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। 

जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं।

♦ यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संघात से बना है। 

स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।

♦हिंदू मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। 

मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास घूमता रहता है। 

श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है इसी लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है।

♦ अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते है तोह ज़िन्दगी की बहुत सी समस्याओ से मुक्ति पा सकते है।

♦ योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये, ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है...! 

वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है।

♦ वास्तव में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है जिस योनि में वह प्राणी है।

♦ पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत हुए को खाता है।

♦ यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया तो श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। 

गंधर्व बन गया हो तो वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। 

पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करेगा।

♦ यदि नाग योनि मिली तो श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति को प्राप्त होगा। 

दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करेगा।

♦ अगर आपकी कुंडली मे पितृ दोष है तो आप अपने कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें ।

ज्योतिष में पितृदोष और श्राद्ध का संबंध ;


ज्योतिषीय परंपरा में पितृदोष शब्द का प्रयोग जन्मकुंडली के कुछ विशेष योगों, ग्रहस्थितियों अथवा पितरों से संबंधित धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में किया जाता है। 

अलग - अलग ज्योतिषीय परंपराओं में इसकी व्याख्या भिन्न हो सकती है।

कुछ ज्योतिषी सूर्य, नवम भाव, नवमेश तथा अन्य ग्रहस्थितियों का अध्ययन करके पितृसंबंधी संकेतों पर विचार करते हैं। 

लेकिन किसी एक ग्रह, भाव या योग के आधार पर निश्चित रूप से यह घोषित करना कि पूर्वज नाराज हैं और उसी कारण परिवार कष्ट भोग रहा है, सावधानी के बिना उचित नहीं है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पितृदोष की ज्योतिषीय व्याख्या और श्राद्ध की धार्मिक परंपरा दो संबंधित, लेकिन अलग - अलग विषय हैं। 

किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली देखकर उसके पूर्वजों के शाप को प्रमाणित तथ्य की तरह स्थापित नहीं किया जा सकता।

धार्मिक आस्था रखने वाला व्यक्ति पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, प्रार्थना और दान कर सकता है। 

इन कर्मों को भय से अधिक श्रद्धा और कृतज्ञता के भाव से करना उचित है।

ये तीन चीजें अत्यन्त दुर्लभ हैं और देवताओं की कृपा से ही मिलती हैं -


1- मनुष्य का जन्म,
2- मोक्ष की इच्छा,
3- महापुरुषों का संग,

दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् |
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरूषसश्रय: ||

मनुष्यत्व,मुमुक्षत्व, और सत्पुरुषों का सहवास ईश्वरानुग्रह कराने वाले ये तीन मिलना,अति दुर्लभ है ।

अर्थात् :- मनुष्य जन्म,मुक्तिकी इच्छा तथा महापुरूषों का सहवास यह तीन चीजें परमेश्वर की कृपापर निर्भर रहते है।

श्राद्ध न कर पाने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?


कभी - कभी परिस्थितियों के कारण व्यक्ति निर्धारित समय पर श्राद्ध नहीं कर पाता। 

इस के पीछे आर्थिक कठिनाई, जानकारी का अभाव, पारिवारिक परिस्थिति, यात्रा या अन्य वास्तविक कारण हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में उसे यह मानकर निराश नहीं होना चाहिए कि उसका परिवार निश्चित रूप से शापित हो गया है।

धार्मिक कर्तव्य के पालन के लिए अपनी परंपरा के जानकार आचार्य या पुरोहित से उचित विधि पूछी जा सकती है। 

तिथि छूट जाने पर क्या करना चाहिए, यह संबंधित परंपरा और कर्मकांड के नियमों के अनुसार समझना चाहिए।

सामर्थ्य के अनुसार अन्नदान, जरूरतमंदों की सहायता, सत्कर्म और दिवंगत माता - पिता के प्रति श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करना भी सम्मान की भावना को व्यक्त करने के उपाय हैं। 

हालांकि इन सभी कर्मों को हर परंपरा में विधिवत श्राद्ध का पूर्ण विकल्प नहीं माना जाता; इसका निर्णय संबंधित शास्त्रीय विधि के अनुसार किया जाना चाहिए।

श्राद्ध में बाहरी दिखावे या अपनी क्षमता से अधिक खर्च की अपेक्षा श्रद्धा, शुद्ध आचरण और विधि का पालन महत्त्वपूर्ण है।

ब्रह्मनिष्ठा का महत्त्व -


लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म दुर्लभं
तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम् |

य: स्वात्ममुक्तौ  न यतेत  मूढ़धी:
स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात् ||

किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर और उसमें भी, जिसमें श्रुति के सिद्धात का ज्ञान होता है ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढ़बुद्धि अपने आत्मा की मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता...! 

वह निश्चय ही आत्मघाती है; वह असत् में आस्था रखने के कारण अपने को नष्ट करता है।

इत: को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि  पौरुषम् ।
 
दुर्लभ मनुष्य - देह और उसमें भी पुरुषत्व को पाकर जो स्वार्थ - साधन में प्रमाद करता है,उससे अधिक मूढ़ और कौन होगा ।।

प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।

अगर श्राद्ध करनेके लिये किसीके पास में कुछ भी न हो तो वह क्या करे ?

अगर किसी के पास श्राद्ध करने के लिए धन न हो....! 

तो उसे अपनी क्षमतानुसार कुछ भी दान करना चाहिए...! 

जैसे दूध, फल या सब्जियां। 

अगर यह भी संभव न हो....! 

तो आप कुशा ( एक प्रकार की घास ) का पिंड बनाकर गाय को खिला सकते हैं या नदी किनारे से मिट्टी का पिंड बना कर दान कर सकते हैं। 

यदि ये भी संभव न हो तो अपने हाथ उठाकर पितरों से संतुष्ट होने की प्रार्थना करें।

अगर किसी के पास में कुछ भी न हो....! 

घर में खाने के लिये अन्न भी न हो तो पितरों के नाम से गाय को हरी - हरी घास देनी चाहिये। 

इस से भी पितरों की तृप्ति होती है।

अगर घास भी देने की शक्ति न हो तो दोनों हाथ ऊपर उठाकर...! 

अपनी काँखें दिखाकर प्रार्थना करे कि 'मैं भूखा हूँ....! 

मेरे पास खाने के लिये भी कुछ नहीं है...! 

मुझे क्षमा करें' ऐसा कहकर दण्डवत् प्रणाम करे...! 

तो इस से भी पितरों की तृप्ति होती है।

पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा का व्यापक अर्थ ;


पितरों के प्रति सम्मान केवल पितृपक्ष के कुछ दिनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। 

माता - पिता जीवित हों तो उनकी सेवा, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना और उनके प्रति सम्मान रखना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

दिवंगत माता - पिता तथा पूर्वजों के निमित्त धार्मिक कर्म करते समय उनके अच्छे संस्कारों को जीवन में अपनाना भी सार्थक है। 

परिवार में सत्य, दया, परोपकार, सदाचार और धर्मपालन की परंपरा को आगे बढ़ाना पूर्वजों की स्मृति को सम्मान देने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

श्राद्ध का धार्मिक विधान मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि वह अकेला नहीं है; उसके जीवन के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है। 

इस लिए पूर्वजों का सम्मान करना और अपने कर्तव्यों का पालन करना धार्मिक जीवन का अंग माना गया है।

श्राद्ध का महात्म्य भय नहीं, श्रद्धा है ;


सनातन धर्म में श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान का महत्त्व प्राचीन धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। 

भगवद्गीता में पितृ - उपासना का उल्लेख मिलता है तथा धर्मशास्त्रीय परंपरा में पितरों के प्रति कर्तव्य की उपेक्षा को अनुचित माना गया है। 

श्राद्ध न करने वाले के संबंध में रक्त पीने और पितरों के शाप से जुड़े जो कठोर वचन प्रचलित हैं, उनका मूल संदर्भ सावधानीपूर्वक जाँचना आवश्यक है। 

उन्हें बिना प्रमाण के हर परिवार पर लागू करना या प्रत्येक कष्ट का कारण पितृदोष बताना शास्त्रीय दृष्टि से उचित निष्कर्ष नहीं है।

श्राद्ध का सार है—


पितरों का स्मरण, उनके प्रति कृतज्ञता, धार्मिक कर्तव्य का पालन और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सत्कर्म।

इस लिए श्राद्ध को केवल भय से किया जाने वाला कर्म न मानकर श्रद्धा, धर्म और पारिवारिक उत्तरदायित्व के रूप में समझना चाहिए। 

अपने पूर्वजों का सम्मान करते हुए वर्तमान जीवन में सदाचार और परोपकार का पालन करना ही इस परंपरा की व्यापक भावना है।

धार्मिक संदेश: पितरों का सम्मान करें, अपनी परंपरा के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करें, लेकिन किसी भी विपत्ति को बिना प्रमाण पितरों के शाप का परिणाम न मानें। 

श्रद्धा के साथ विवेक रखना भी धर्मसम्मत आचरण का महत्त्वपूर्ण अंग है।
हर हर महादेव हर...!! || सर्व पितरेशवराय नमः ||

जय श्री कृष्ण...!!! आप का दिन शुभ हो 
🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏
+++ +++
+++ +++

2 comments:

ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) :

ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) :  ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) : भारतीय ज्योतिष शास्त्र में २७  नक्षत्रों में ६  नक्...