।। श्री यजुर्वेद के अनुसार ज्योतिष शास्त्र विधा में दिशाशूल फल ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री यजुर्वेद के अनुसार ज्योतिष शास्त्र विधा में दिशाशूल फल ।।


★★श्री हमारे यजुर्वेद के अनुसार ज्योतिष शास्त्र विधा में देखे के दिशाशूल  महत्व फल और लाभ ।

दिशा शूल ले जाओ बामे, राहु योगिनी पूठ।

सम्मुख लेवे चंद्रमा, लावे लक्ष्मी लूट।







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दिशाशूल क्या होता है ?

दिशाशूल वह दिशा है जिस तरफ यात्रा नहीं करना चाहिए। 

हर दिन किसी एक दिशा की ओर दिशाशूल होता है। 

आज कल तो यात्रा सभी लोग खुद के वहान जैसा कि मोटरसाइकिल , मोटरकार , बस , रेलवे या प्लेन से करते ही हैं। 









कोई व्यापार के लिए धर से बहार जाते है , कोई धार्मिक कार्य के लिए घर से बहार जाते है , कोई मांगलिक कार्य के लिए ही धर से बहार जाते है  अथवा कोई किसी महत्वपूर्ण खरीददारी के लिए ही धर से बहार जाते है। 

कोई न कोई की कभी - कभी यात्रा सुखमय होती भी है, कोई न कोई की तो कभी यह यात्रा  कष्टमय बन जाती है या कभी - कभी तो बहुत महेनत करने के बाद भी असफलता से भरी होती रहती है। 

इस समय यात्रा के विषय में दिशा शूल का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। 

हमारे बुगुर्ज दादा - दादी हम धर से बहार निकलने से पहले ही कुछ न कुछ तरीके से हमको सलाह दे ही देते थे ।

व्यक्ति के जीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है तो दिशाशूल का ज्ञान होने से व्यक्ति मार्ग में आने वाली बाधाओं से बच  भी सकता है। 

पूर्व दिशा : -

सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन पूर्व दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव  : - 

सोमवार को दर्पण देखकर और शनिवार को अदरक, उड़द की दाल खाकर घर से बाहर निकलें। 

पश्चिम दिशा : - 

रविवार और शुक्रवार को पश्चिम दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन पश्‍चिम दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव : -

रविवार को दलिया या घी  खाकर और शुक्रवार को जौ या राईं खाकर घर से बाहर निकलें। 

उत्तर दिशा : - 

मंगलवर और बुधवार को उत्तर दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन उत्तर दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव  : - 

मंगलवार को गुड़ खाकर और बुधवार को तिल, धनिया खाकर घर से बाहर निकलें।

दक्षिण दिशा : - 

गुरुवार को दक्षिण दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन दक्षिण दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव  : - 

गुरुवार को दहीं या जीरा खाकर घर से बाहर निकलें।

अग्नि दिशा ( दक्षिण दिशा - पूर्व दिशा ) : -

सोमवार और गुरुवार को दक्षिण दिशा -पूर्व दिशा ( आग्नेय ) दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन इस दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव : - 

सोमवर को दर्पण देखकर, गुरुवार को दहीं या जीरा खाकर घर से बाहर निकलें। 

नैऋत्य दिशा ( दक्षिण दिशा - पश्चिम दिशा ) :- 

रविवार और शुक्रवार को दक्षिण दिशा - पश्चिम दिशा ( नैऋत्य ) दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन इस दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव : -

रविवार को दलिया और घी खाकर और शुक्रवार को जौ खाकर घर से बाहर निकलें। 

वायव्य दिशा ( उत्तर दिशा - पश्चिम दिशा ) : - 

मंगलवार को उत्तर दिशा -पश्चिम दिशा ( वायव्य ) दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन इस दिशा में दिशा शूल रहता है।

बचाव : -

मंगलवार को गुड़ खाकर घर से बाहर निकलें। 

ईशान दिशा ( उत्तर दिशा - पूर्व दिशा )  : - 

बुधवार और शनिवार को उत्तर दिशा - पूर्व दिशा ( ईशान ) दिशा की यात्रा वर्जित मानी गई है। 

इस दिन इस दिशा में दिशाशूल रहता है।

बचाव : -

बुधवार को तिल या धनिया खाकर और शनिवार को अदरक, उड़द की दाल या तिल खाकर घर से बाहर निकलें।

यदि एक ही दिन यात्रा करके उसी दिन वापिस आ जाना हो तो ऐसी दशा में दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है। 










ज्यादातर भी देखे तो दिशाशूल का उपयोग जातक नई नोकरी के लिए बहार जाना ,सगाई करने सबंध करने के लिए या लड़का  या लड़की देखने  या उनका लग्न का तारीख पक्का करने के लिए बहार जाना ।

परन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य करने के लिए बहार जाना हो या लड़की को उसका ससुराल भेजना हो या ससुराल से लड़की पियर में माता - पिता के पास भेजना हो ओर उसी दिशा की तरफ यात्रा करनी ही पड़े ।

लेकिन मूलभूत रीते देखे तो धर का मूल दरवाजा से बहार निकलने के समय से ही जिस दिन वहाँ दिशाशूल हो तो बताएं गए उपाय करके यात्रा कर लेनी चाहिए।

आशा करता हूँ कि आपके जीवन में भी यह उपयोगी सिद्ध होगा तथा आप इसका लाभ उठाकर अपने दैनिक जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे।

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आध्यात्म एवं ज्योतिष में सप्तमी तिथि का महत्त्व :

हिंदू पंचाग की सातवी तिथि सप्तमी कहलाती है। 

इस तिथि को मित्रापदा भी कहते हैं। 

सप्तमी तिथि का निर्माण शुक्ल पक्ष में तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा का अंतर 73 डिग्री से 84 डिग्री अंश तक होता है। 

वहीं कृष्ण पक्ष में सप्तमी तिथि का निर्माण सूर्य और चंद्रमा का अंतर 253 से 264 डिग्री अंश तक होता है। 

सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्यदेव माने गए हैं। 

मान सम्मान में व़द्धि और उत्तम व्यक्तित्व के लिए इस तिथि में जन्मे लोगों को भगवान सूर्यदेव का पूजन अवश्य करना चाहिए। 

सप्तमी तिथि का ज्योतिष में महत्त्व :

यदि सप्तमी तिथि सोमवार और शुक्रवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। 

इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। 

इस के अलावा सप्तमी तिथि बुधवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है। 

ऐसे समय कार्य सिद्धि की प्राप्ति होती है। 

बता दें कि सप्तमी तिथि भद्र तिथियों की श्रेणी में आती है। 

यदि किसी भी पक्ष में सप्तमी शुक्रवार के दिन पड़ती है तो क्रकच योग बनाती है, जो अशुभ होता है, जिसमें शुभ कार्य निषिद्ध होते हैं। 

वहीं शुक्ल पक्ष की सप्तमी में भगवान शिव का पूजन करना चाहिए लेकिन कृष्ण पक्ष की सप्तमी में शिव का पूजन करना वर्जित है। 

ज्योतिष के अनुसार सप्तमी तिथि को मां कालरात्रि की पूजा का दिन माना जाता है, जो संकटों का नाश करने वाली हैं। 

सप्तमी तिथि में जन्मे जातक अपने कार्यों को लेकर सजग और जिम्मेदार होते हैं, जिसकी वजह से इनके द्वारा किए गए कार्य हमेशा सफल होते हैं। 

सूर्य स्वामी होने की वजह से इनमें नेतृत्व का गुण पाया जाता है। 

इन लोगों को मेल मिलाप करना पसंद नहीं होता है लेकिन ये लोग घूमने का शौक रखते हैं। 

ये जातक धनवान होते हैं और मेहनत से किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने की कोशिश करते रहते हैं। 

इन लोगों में प्रतिभा कूट - कूटकर भरी होती है। 

इस तिथि में जन्मे जातक कलाकार भी होते हैं। 

इन व्यक्तित्व काफी प्रभावशाली होता है। 

लेकिन इन जातकों को जीवनसाथी का भरपूर सहयोग नहीं मिलता है, जिसकी वजह से तनाव झेलना पड़ता है। 

इन जातकों को संतान की तरफ से प्रेम और साथ जरूर मिलता है, जिसकी वजह से मन में संतोष बना रहता है।

सप्तमी में किये जाने वाले शुभ कार्य :

सप्तमी तिथि में यात्रा, विवाह, संगीत, विद्या व शिल्प आदि कार्य करना लाभप्रद रहता है। 

इस तिथि पर किसी नए स्थान पर जाना, नई चीजों खरीदना शुभ माना गया है। 

इस तिथि में चूड़ाकर्म, अन्नप्राशन और उपनयन जैसे संस्कार करना उत्तम माना जाता है। 

इस के अलावा किसी भी पक्ष की सप्तमी तिथि में तेल और नीले वस्त्रों को धारण नहीं करना चाहिए। 

साथ ही तांबे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए। 

सप्तमी तिथि के प्रमुख त्यौहार एवं व्रत व उपवास :

शीतला सप्तमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शीतला सप्तमी मनाई जाती है। 

इस तिथि पर माता शीतला का पूजन किया जाता है, जो चिकन पॉक्स या चेचक नामक रोग दूर करने वाली माता हैं। 

इस दिन व्रतधारी घर पर चूल्हा नहीं जलते हैं बल्कि बासी भोजन ग्रहण करते हैं। 

संतान सप्तमी भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को ललिता सप्तमी मनाई जाती है। 

इस तिथि पर सभी माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और सफलता के लिए संतान सप्तमी का व्रत रखती हैं। 

इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। 

गंगा सप्तमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। 

इस दिन भागीरथ को गंगा माता को धरती पर लाने में कामयाबी मिली थी। 

इस  दिन गंगा स्नान का बहुत महत्व है। 

विष्णु सप्तमी विष्णु सप्तमी मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनायी जाती है। 

इस तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। 

इस दिन व्रत करने से अधूरे या रुके हुए काम पूरे हो जाते हैं। 

रथ आरोग्य सप्तमी माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रथ आरोग्य सप्तमी कहते हैं। 

इस दिन व्रत करने से कुष्ठ रोग नहीं होता है और जिसको होता है उसे मुक्ति मिल जाती है। 

क्योंकि इस तिथि पर श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब ने व्रत किया था और उन्हें कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल गई थी।

।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।। 
         !!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री ऋग्वेद के अनुसार भाग्यांक मूलांक ज्योतिष में कैसा होता है उसकी गणना केसी होती है।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री ऋग्वेद के अनुसार भाग्यांक मूलांक ज्योतिष में कैसा होता है उसकी गणना केसी होती है।।


श्री ऋग्वेद के अनुसार भाग्यांक मूलांक ज्योतिष में कैसा होता है उसकी गणना केसी होती है।

भाग्यांक और मूलांक  हमारी लाइफ में बड़ा महत्व रखते हैं। 

कई बार हमें जन्म का समय या स्थान मालूम नहीं होता। 

ऐसे में कुंडली बना पाना कठिन हो जाता है।

 मूलांक उन लोगों के लिए एक सटीक आधार है। 

अपने बारे में जानने का और भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाने का अंक ज्योतिष एक सरल माध्यम हो सकता है।

भाग्यांक :-

भाग्यांक का उपयोग महत्वपूर्ण घटनाओं का समय या तिथि जानने के लिए किया जाता है। 

आज कल जो नाम का अक्षर बदलने का चलन चल रहा है ।

वह भी भाग्यांक के ही आधार पर किया जाता है।







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भाग्यांक की गणना थोड़ी विस्तृत होती है। 

यह वह अंक होता है ।

जो आपके जीवन में बार - बार किसी न किसी तरह आता ही है ।

और आपको अच्छे या बुरे रूप में प्रभावित करता है।

भाग्यांक निकलने के लिए जन्म तारीख, माह और सन लिखा जाता है ।

और फिर उनका योग किया जाता है। 

जैसे यदि आपकी जन्म तारीख, माह व सन 2-3-1970 है ।

तो आपका भाग्यांक 2+3+1+9+7+0 =22 = 2+2 = 4 होगा। 

यानि इस पूरी डीटेल्स के लिए भाग्यांक 4 होगा। 

विवाह, काम करने की जगह, भाग्यशाली शहर, लकी अंक आदि के बारे में भाग्यांक के द्वारा ही जाना जाता है।







मूलांक :-

मूलांक का अर्थ है आपके जन्म की तारीख।

यानि यदि आपका जन्म 2 मार्च को हुआ है तो आपका मूलांक 2 होगा। 

मूलांक हमारे स्वभाव, प्रकृति, गुण,दोष आदि के बारे बताता है। 

हमारे लिए जीवन में क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी, यह मूलांक से ही जाना जाता है।

यह आपके मित्र और शत्रुओं के बारे में भी बताता है।

आपके करियर, जीवनसाथी, कार्यक्षेत्र और भाग्योदय की भी जानकारी देता है। 

मूलांक 1 से 9 तक माने जाते हैं। 

जिन लोगों का जन्म 9 से अधिक संख्या वाली तारीख को हुआ है वे अपने जन्मदिनांक को आपस में जोड़कर मूलांक पा सकते हैं। 

जैसे जिनका जन्म 11 तारीख को हुआ है उनका मूलांक 2 होगा। 

( 1 + 1 = 2 )। 

इसी तरह अन्य मूलांक आपस में जोड़कर निकाले जा सकते हैं।

मूलांक 2 वालों को  नए अवसर...!

मूलांक 2 वालों को नौकरी के मिल सकते हैं नए अवसर,

वैदिक अंक ज्योतिष विधा शास्त्र में अंकों के माध्यम द्वारा गणित के नियमों का व्यावहारिक उपयोग करके मनुष्य के विभिन्न पक्षों, उसकी विचारधारा, जीवन के विषय इत्यादि का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।

वैदिक अंक ज्योतिष शास्त्र विद्या का अंक ज्योतिष में व्यक्ति के भविष्य का आकलन मुख्य रूप से उसके मूलांक के आधार पर किया जा सकता है, जो जन्म तिथि से जाना जाता है। 

अंकशास्त्र, सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति के जन्म की तारीख पर होने वाली संख्याओं के कुल योग का अध्ययन करता है। इसमें कुल मूलांक 1 से लेकर 9 तक होता है।  

सभी अंक किसी न किसी ग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

और इनसे ही मूलांक और भाग्यांक की गणना करके दैनिक अंक ज्योतिष भविष्यफल, साप्ताहिक अंकज्योतिष भविष्यफल, मासिक अंकज्योतिष भविष्यफल और वार्षिक अंकज्योतिष भविष्यफल के साथ ही आपके जीवन से जुड़ी तमाम घटनाओं के बारे में यहां हम आपको जानकारी देते हैं जिससे आपका जीवन सुखमय और समृद्ध बन सके। 

उदाहरण के लिए समझिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म 23 अप्रैल को हुआ है तो उसकी जन्म तारीख के अंकों का योग 2+3=5 आता है। यानि 5 उस व्यक्ति का मूलांक कहा जाएगा। 

अगर किसी की जन्मतिथि दो अंकों यानी 11 है तो उसका मूलांक 1+1= 2 होगा। वहीं जन्म तिथि, जन्म माह और जन्म वर्ष का कुल योग भाग्यांक कहलाता है। 

जैसे अगर किसी का जन्म 22-04-1996 को हुआ है तो इन सभी अंकों के योग को भाग्यांक कहा जाता है। 

2+2+0+4+1+9+9+6=33=6 यानी उसका भाग्यांक 6 है।

इस अंक ज्योतिष को पढ़कर आप अपनी दैनिक योजनाओं को सफल बनाने में कामयाब रहेंगे। 

जैसे दैनिक अंक ज्योतिष आपके मूलांक के आधार पर आपको यह बताएगा कि आज के दिन आपके सितारे आपके अनुकूल हैं या नहीं। 

आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है या फिर किस तरह के अवसर आपको प्राप्त हो सकते हैं। 

अंक ज्योतिष की भविष्यवाणी को पढ़कर आप दोनों ही परिस्थिति के लिए तैयार हो सकते हैं। 

तो चलिए अंक शास्त्र के माध्यम से जानते हैं आपका मूलांक, शुभ अंक और लकी कलर कौन सा है।

अंक 1 :

आपके लिए मुश्किलों भरा हो सकता है। कार्यक्षेत्र की गतिविधियों में व्यस्त रह सकते हैं। 

किसी पुराने काम को लेकर यात्राएं करनी पड़ सकती हैं। 

निवेश के लिए रुकना बेहतर रहेगा। 

वैवाहिक जीवन सामान्य रहेगा।

शुभ अंक-29 
शुभ रंग- गुलाबी

अंक 2 :

आपको नौकरी के नए अवसरों की प्राप्ति होगी। 

साझेदारी में काम करने से लाभ हो सकता है।  

जीवनसाथी से रिश्ता और मजबूत होगा। 

आप किसी वाहन की खरीदारी कर सकते हैं। 

आध्यात्मिक यात्रा का योग बनेगा।

शुभ अंक- 9 
शुभ रंग- केसरिया

अंक 3 :

आपको अपने व्यवहार पर पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है। 

आपकी किसी पुरानी गलती से पर्दा उठ सकता है। 

धार्मिक कामों के प्रति आपकी काफी रुचि रहेगी। 

अगर आप संतान के करियर को लेकर परेशान चल रहे थे, उस समस्या का हल होगा। निवेश में खुशखबरी सुनने को मिल सकती है।

शुभ अंक- 20
शुभ रंग-  लाल

अंक 4 :

आपको घर और नौकरी दोनों जगह सही तालमेल बनाना होगा। 

आपकी संवेदनशीलता आपको पुराने दिनों की याद करा सकती है। 

आप मानसिक रूप से बहुत सक्रिय हैं, इस लिए समस्याओं का समाधान आसानी से होगा। परिवार के सदस्यों का भरपूर साथ मिलेगा। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। 

शुभ अंक- 52 
शुभ रंग- सिल्वर

अंक 5 :

निवेश में धन लाभ होने से आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। 

घर कोई नया वाहन आ सकता है। 

आपको जीवनसाथी के मन में चल रही उलझनों को लेकर बातचीत करनी पड़ सकती है। 

भाग्य आपका पूरा साथ देने वाला है। 

शुभ अंक- 2 
शुभ रंग- क्रीम

अंक 6 :

बिजनेस में आपको पार्टनरशिप में नुकसान होगा। 

खर्चों के बढ़ने से मन परेशान हो सकता है। 

आप किसी लंबी दूरी की यात्रा पर जाने की प्लानिंग कर सकते हैं। 

बचत की योजनाएं सफल होंगी।

शुभ अंक- 25 
शुभ रंग- गुलाबी

अंक 7 :

आज भाग्य का पूरा साथ मिलेगा। आत्मविश्वास में वृद्धि होने पर मन प्रसन्न रहेगा। 

नौकरी पेशा व्यक्तियों को मनचाही सफलता मिल सकती है। 

कोई पैतृक संपत्ति से जुड़ा मामला हल हो सकता है। 

घर के वरिष्ठ सदस्यों का सहयोग प्राप्त होगा। 

शुभ अंक- 9 
शुभ रंग- केसरिया

अंक 8 :

कार्यक्षेत्र में किसी नए प्रोजेक्ट का हिस्सा बन सकते है। 

नौकरी की तालाश कर रहे लोगों को अभी और मेहनत करनी होगी। 

धार्मिक यात्रा पर जा सकते हैं। 

जीवनसाथी के लिए आप कोई सरप्राइज गिफ्ट लेकर आएंगे। 

आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।

शुभ अंक-29 
शुभ रंग- गुलाबी

अंक 9 :

नौकरी में बदलाव की योजना बना रहे लोगों के लिए दिन अच्छा रहेगा। 

संतान पक्ष की ओर से आपको कोई खुशखबरी सुनने को मिल सकती है। 

घर में किसी महंगी वस्तु को लेकर आ सकते हैं। 

कारोबार में धन लाभ की प्राप्ति संभव है। 

शुभ अंक- 8
शुभ रंग- हरा

         !!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
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" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
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।। श्री यजुर्वेद के अनुसार जातक की कुंडली के इस योग में होती है लव मैरिज / પાપ ગ્રહ રાહુ વર્ષ 2025માં કુંભ રાશિમાં પ્રવેશ કરશે. ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
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।। श्री यजुर्वेद के अनुसार जातक की कुंडली के इस योग में होती है लव मैरिज / પાપ ગ્રહ રાહુ વર્ષ 2025માં કુંભ રાશિમાં પ્રવેશ કરશે. ।।


जातक की कुंडली के इस योग में होती है लव मैरिज


यजुर्वेद में ज्योतिष शास्त्र अध्ययन में बताया गया है कि सप्तम स्थान विवाह का होता है। 

हिंदू धर्म में 8 प्रकार के विवाह माने गये है ब्रह्मा विवाह को सर्वश्रेष्ट तथा पैशाच विवाह को निकृष्ट विवाह की श्रेणी में रखा गया है। 

इन में गंधर्व विवाह भी विवाह का एक प्रकार है। 






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गंधर्व विवाह को ही प्रेम विवाह कहा जाता है। 

प्रेम विवाह में वर कन्या अपनी मर्जी से विवाह करते है ।

ज्योतिषाचार्य पं. प्रभु राज्यगुरु  ने बताया कि जन्म कुंडली का सप्तम स्थान विवाह स्थान होता है ।










जब सप्तम या सप्तमेष का सम्बंध 3,5,9,11 और 12वें भाव के मालिक के साथ बनता हैं तब जातक प्रेम विवाह करता है। 

इन सम्बंधों में दृष्टी युति के अतिरिकत त्रिकोण तथा केंद्र सम्बंधों को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। 

सप्तमेश यदि पंचम स्थान के मालिक के साथ 3, 5 ,7, 11 और 12 वें भाव में स्थित हो तो जातक प्रेम विवाह अवश्य करता है। 

पंचम स्थान प्रेम सम्बन्ध तथा मित्रों का माना जाता है ।

ऐसे में सप्तमेष का सम्बंध पंचमेश से हो जाये तो व्यक्ति के प्रेम विवाह करने के योग बनते है.!!


પાપ ગ્રહ રાહુ વર્ષ 2025માં કુંભ રાશિમાં પ્રવેશ કરશે. 


પાપ ગ્રહ રાહુ વર્ષ 2025માં કુંભ રાશિમાં પ્રવેશ કરશે. આ રાશિમાં રાહુ ગ્રહના આગમનથી મેષ સહિત આ ત્રણ રાશિના જાતકોને દરેક ક્ષેત્રમાં સફળતા મળવાની સાથે ધનલાભ થઈ શકે છે.


વૈદિક જ્યોતિષ શાસ્ત્રમાં રાહુને પાપી, છાયા ગ્રહ માનવામાં આવે છે. પરંતુ તેનું મહત્વ ઘણું વધારે છે. 

રાહુ ગ્રહ છેલ્લા કેટલાક સમયથી ગુરુ ગ્રહની મીન રાશિ મીનમાં બિરાજમાન છે. 

પરંતુ નવા વર્ષના 18 મેના રોજ સાંજે 5.08 વાગ્યે તે કુંભ રાશિમાં પ્રવેશ કરશે. 

રાહુ ગ્રહ આ કુંભ રાશિમાં લગભગ 18 મહિના સુધી રહેશે. 

આવી સ્થિતિમાં તેની અસર 12 રાશિઓના જીવનમાં લાંબા સમય સુધી રહેશે. 

કેટલીક રાશિઓને શનિની રાશિમાં રાહુ ગ્રહના ગોચરથી ફાયદો થશે અને અમુક રાશિના જાતકોએ સાવધાન રહેવાની જરૂર છે. 

આવો જાણીએ કુંભ રાશિમાં રાહુ ગોચર કઇ કઇ રાશિના જાતકો માટે શુભ રહેશે.

વૈદિક જ્યોતિષ શાસ્ત્ર અનુસાર રાહુ ગ્રહ હંમેશા વક્રી ગતિ કરે છે. આ કારણે તે મેષ રાશિમાં નહીં પણ કુંભ રાશિમાં પ્રવેશ કરશે.


મેષ રાશિ


રાહુ ગ્રહનું કુંભ રાશિમાં ગોચર મેષ રાશિના જાતકો માટે ફાયદાકારક સાબિત થઈ શકે છે.

રાહુ આ રાશિના અગિયારમાં ભવમાં પ્રવેશ કરશે. 


આવી સ્થિતિમાં આ રાશિના જાતકોને ઈચ્છિત પરિણામ મળી શકે છે. 

આ સાથે લાંબા સમયથી અટકેલા કામને પૂર્ણ કરી શકાશે. 

આર્થિક સ્થિતિમાં નોંધપાત્ર સુધારો થવાનો છે. 

સમાજમાં માન સન્માનમાં વધારો થવાનો છે. 

નવા લોકો સાથે મુલાકાત થઇ શકે છે. 

તમે તેમની સાથે સમય પસાર કરવાનું પસંદ કરી શકો છો. 

પરિવારમાં તમને વધુ મહત્વ મળશે. 

તમે શેર બજાર દ્વારા ઘણા પૈસા કમાઇ શકો છો. 

શેરબજારમાં નાણાંનું રોકાણ કરતા પહેલા તમારે ધ્યાનથી વિચારવું જોઈએ. 

કાર્યક્ષેત્રમાં સફળતા મળવાના યોગ છે. 

તમારા પગારમાં વધારા સાથે પ્રમોશન મળી શકે છે.


સિંહ રાશિ


સિંહ રાશિના જાતકો માટે રાહુ ગ્રહનું કુંભ રાશિમાં ગોચર ફાયદાકારક સાબિત થઈ શકે છે.

કરિયરની દ્રષ્ટિએ આ રાશિના જાતકો માટે નવું વર્ષ ખૂબ જ સારું રહેવાનું છે. 


પ્રમોશનની સાથે પગાર વધારો પણ કરવામાં આવી રહ્યો છે. 

આ સાથે હવે પરિવારમાં સમસ્યાઓનો અંત આવી શકે છે. 

આ સાથે તમને તમારા જીવનસાથીનો સંપૂર્ણ સહયોગ મળશે, 

જેથી તમે ઘણા અવરોધોને સરળતાથી પાર કરી શકશો. 

જીવનમાં સુખ - શાંતિમાં વૃદ્ધિ થશે. 

કોર્ટ કેસોમાં સફળતા મળી શકે છે. 

વિદેશ વેપારમાં લાભ મળી શકે છે.


તુલા રાશિ


તુલા રાશિના જાતકો માટે રાહુ ગ્રહનું કુંભ રાશિમાં ગોચર ફાયદા કારક સાબિત થઈ શકે છે.

આ રાશિના પાંચમા ભાવમાં રાહુ રહેશે. 

આવી સ્થિતિમાં, આ રાશિના જાતકોને સારા પરિણામ મળવાની પૂરી સંભાવનાઓ જોવા મળી રહી છે. 

આ સાથે જ શિક્ષણ ક્ષેત્રે પણ ઘણો ફાયદો થઇ શકે છે. 

લવ લાઈફ સારી બનશે. 

તમારા જીવનસાથી સાથે તમારો સારો સમય પસાર થશે. 

આ સાથે જ દાંપત્ય જીવનમાં ચાલી રહેલી સમસ્યાઓનો હવે અંત આવી શકે છે. 

રોકાણ દ્વારા તમે અઢળક કમાણી કરી શકો છો, 

સાથે જ સ્વાસ્થ્યનું પણ ખાસ ધ્યાન રાખવાની જરૂર છે.


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पितृ पक्ष श्राद्ध सन् 2025


अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए आश्विन कृष्ण पक्ष में पितृ -तर्पण एवं श्राद्धकर्म करना परम आवश्यक है। 


जिससे स्वास्थ्य, समृद्धि, आयु, सुख - शान्ति, वंशवृद्धि एवं उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है। 


श्रद्धापूर्वक किये जाने के कारण ही इसका नाम श्राद्ध है।


भाद्रपद पूर्णिमा पितृ पक्ष आरम्भ वि. सं० 2082 आश्विन कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष में आत्मीय व्यक्ति की जो तिथि आए, उस तिथि में पार्वण श्राद्ध करने का विधान है । 


पार्वण श्राद्ध में पिता, पितामह, सपत्नीक अर्थात् माता, दादा और परदादी सहित छ: जनों का श्राद्ध होता है।


 पूर्वाह्णे मातृकं श्राद्धमपराह्णे तु पैतृकम् ।।

एकोदि्दष्टं तु मध्याह्ने प्रातर्वृद्धि निमित्तकम् ।।


मृत्यु तिथि यदि दो दिन अपराह्ण- असमान रूप से व्याप्त हो या एक दिन अधिक और दूसरे दिन कम समय के लिये व्याप्त करे तो अधिक अपराह्न काल वाले दिन श्राद्ध किया जा सकता है। 


अपराह्ण -द्वये चामा यदि स्यात् तत्रयाऽधिका।

सा ग्राह्या यदि तुल्या स्यादग्रे वृद्धौ परा स्मृता।।


इस वर्ष अश्विन कृष्ण तृतीया/चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 10 सितम्बर दिन बुधवार को किया जायेगा।


पूर्वाह्णो वै देवानानं मध्याह्ने मनुष्याणामपराह्ण पितृणां-श्रुति पूर्वाह्णे दैविकं श्राद्धमपराह्णे तु पार्वणम्।।


भाद्रपद पूर्णिमा प्रोष्ठपदी महालय श्राद्ध प्रारम्भ 07 सितम्बर दिन रविवार को


प्रतिपदा तिथि श्राद्ध 08 सितम्बर दिन सोमवार को


द्वितीया तिथि श्राद्ध 09 सितम्बर दिन मंगलवार को


तृतीया तथा चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 10 सितम्बर 2025 दिन बुधवार को किय जायेगा।


पंचमी तिथि श्राद्ध 11 सितम्बर दिन गुरुवार,


षष्ठी तिथि श्राद्ध 12 सितम्बर दिन शुक्रवार,   

    

सप्तमी तिथि 13 सितम्बर दिन शनिवार


अष्टमी तिथि श्राद्ध 14 सितम्बर रविवार,      


नवमी तिथि श्राद्ध 15 सितम्बर दिन सोमवार, 


दशमी 16 सितम्बर दिन मंगलवार,


एकादशी तिथि श्राद्ध 17 सितम्बर दिन बुधवार,


द्वादशी तिथि श्राद्ध 18 सितम्बर दिन गुरुवार,


त्रयोदशी तिथि श्राद्ध 19 सितम्बर दिन शुक्रवार, अश्विन कृष्ण त्रयोदशी में पितृ श्राद्ध का विशेष महात्म्य है। 


चतुर्दशी तिथि श्राद्ध 20 सितम्बर दिन शनिवार,     


आश्विन / महालय अमावस सर्वपितृश्राद्ध 21 सितम्बर दिन रविवार, 


सुयोग्य श्रोत्रिय आदि ब्राह्मणों के न मिलने पर श्राद्ध के लिए मध्यम ब्राह्मण मातामहादि संबंधियों को ही श्राद्ध में निमंत्रित करना चाहिए  


एतान् मातामहादीन् दश मुख्यश्रोत्रियाऽऽद्यसम्भवे भोजयेत्।

मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।

दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्।। 


अर्थात्—  नाना,  मामा, भांजे,  ससुर, गुरु, दौहित्र ( पुत्रीका पुत्र ), दामाद, बंधु , ऋत्विक  और अपने यजमान को भी देवकार्य एवं पितृ कार्य में भोजनीय ब्राह्मण के रूप में भोजन करावे श्राद्ध में भोजन के लिए भान्जा मिले तो दस ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है।


🌻🌿🏵🪷🥀🙏💐🪔🪴🌳

         !!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। पितृदोष प्रेत बाधा दोष और श्रापित दोष कुंडली ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। पितृदोष प्रेत बाधा दोष और श्रापित दोष कुंडली  ।।


पितृदोष प्रेत बाधा दोष और श्रापित दोष कुंडली


★★जातक की कुंडली मे पितृदोष ,  प्रेत बाधा दोष और श्रापित कुंडली के योग ।

जातक की जन्म कुंडली मे पितृदोष को सहज समझने वाला योग नही समझा जा सकता इसके परिणाम जटिल ही गिने जाते है।

इसके बारे शास्त्र सम्मत विस्तारपूर्ण विवरण जानने को मिलना ओर बहुत सी स्वभाविक व सार्वजनिक हो चुकी कम्पलेन्टस जो जीवन के हर काम मे हिचकोले देकर सम्पूर्ण होने में अटकले ओर चिड़चिड़ापन देता है।







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मेनली राहु ग्रह के तीनो त्रिकोनो यानी लगन,पँचम ओर नवम से तगड़ा पितृ दोष जो सब रिश्तों से मिले जुले पुर्वजो की निराशा का अवलोकन देता है।

खासम खास भी पितृ दोष भी होते है जो प्रायः किसी एक रिशते से ही सम्बंधित होते है।

सूर्य + राहु = पिता,दादा,परदादा की पुर्वजो द्बारा अवज्ञा,जो आज तक परछाई की तरह पीछा किये किसी बड़े परिवारिक सदस्य से बेवजह हानि ही देता  है।

चन्द्र + राहु = माता,दादी,परदादी का पुर्वजो का इश्चा के विरुद्ब किया ।

एसा महत्वपुर्ण काम जो आज तक मानसिक तनाव देकर पजल व नर्वस किये बगैर ।

आज तक भी कदम आगे ही करने देने मे रोक करे।

मंगल + राहु = भाई की जायदाद या पैसा पुर्वजो से हड़पने पर,जो आजतक पराक्रम को दबाये ।

आराम ही आराम में दिलचस्पी देकर तन,मन के बल को तोड़ टालमटोल से जिन्दगी के मुकामो को निकाल देता है।

बुध + राहु = ऐसा पितृ दोष जो पुर्वजो द्बारा बहन,बेटी ओर बुआ को बनता सम्मान न देने और दुख पहुचाने से बनता है ।








इस का परिणाम आज तक भी ऐन समय दिमाग को चककर देकर बुद्बि को नाश कर गलत फैसला देने से भविष्य धुमिल होने वाला योग निर्मित होता है।

गुरु + राहु = पुर्वजो द्बारा धार्मिक चन्दा,प्रोप्टी पर कब्जा या विद्बान,गुरु को धोखा या दुख देने से उतपन्न हुआ पितृ दोष है ।

जो आज तक भी ब्राहमण या गुरु पीर का आर्शीवाद पूरा नही होने देता।

शुक्र + राहु = किसी भी स्त्री या पत्नी भी हो लगातार सताये जाने से मिली बददुआ से जुड़ा पितृ दोष जिसका असर आज तक भी पत्नी या स्त्रियो से विरोधभास बिना कारण दिलाये रखता है ।

ओर नकारात्मक फल दिलाता है।

शनि + राहु = पुर्वजो से अधीनस्थ कर्मचारियो की अमानत में खयानत या मजदुरी का हक न देने से बनने वाला योग है ।

जो आज भी नौकरों, मजदुरो से ठीक व्यहार से भी नुकसान ही देता है ओर ऐसे नुकसान देता है ।

जिसकी कल्पना ही नही की जा सकती।

पित्रदोष की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध एवं पितृदोष निवारण निवारण पूजन अवश्य करावे ।

ऊपर बताए गई अपनी बुरी आदत हो अपने बुरे कामों को सुधार लेना भी इन दोनों से बचने का बहुत बढ़िया साधन है...!

*********

कब से शुरू होंगे पितृपक्ष 2025? जानें तिथि :

पितृ पक्ष 2025 के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे कर्म किए जाते हैं....! 

इस समय पितर धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा रखते हैं...! 

इस अवधि में पवित्र नदियों में स्नान करना और जरूरतमंदों को दान देना विशेष फलदायी माना जाता है...! 

पितृ पक्ष में विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है और पितरों की कृपा जीवन में सुख - शांति लाती है....! 

इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 7 सितंबर 2025, रविवार को हो रही है....! 

भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि 7 सितंबर को देर रात 01:41 बजे प्रारंभ होगी और इसी दिन रात 11:38 बजे समाप्त हो जाएगी...! 

ऐसे में 7 सितंबर से ही पितृ पक्ष की विधिवत शुरुआत मानी जाएगी....! 

पितृ पक्ष का समापन 21 सितंबर 2025 को सर्व पितृ अमावस्या के दिन होगा, पितृ पक्ष 2025 की तारीखें निम्नलिखित हैं।


रविवार, 7 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध
सोमवार, 8 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध
मंगलवार, 9 सितंबर- द्वितीया श्राद्ध
बुधवार, 10 सितंबर- तृतीया श्राद्ध, चतुर्थी श्राद्ध
गुरुवार, 11 सितंबर- पंचमी श्राद्ध, महा भरणी
शुक्रवार, 12 सितंबर - षष्ठी श्राद्ध
शनिवार, 13 सितंबर- सप्तमी श्राद्ध
रविवार, 14 सितंबर- अष्टमी श्राद्ध
सोमवार, 15 सितंबर- नवमी श्राद्ध
मंगलवार, 16 सितंबर- दशमी श्राद्ध
बुधवार, 17 सितंबर- एकादशी श्राद्ध
गुरुवार, 18 सितंबर- द्वादशी श्राद्ध
शुक्रवार, 19 सितंबर- त्रयोदशी श्राद्ध, मघा श्राद्ध
शनिवार, 20 सितंबर- चतुर्दशी श्राद्ध
रविवार, 21 सितंबर- सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध


पितृ पक्ष का महत्व - पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, एक 16 दिनों की अवधि है जो हिंदू धर्म में पूर्वजों को समर्पित है....! 

यह भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलता है....! 

इस दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं....! 

इन दिनों पितर पृथ्वी पर अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा लेकर आते हैं.....! 

जो संतान श्रद्धा भाव से उनका स्मरण और तर्पण करती है....! 

उन्हें पितरों की कृपा प्राप्त होती है, इससे पितृ दोष दूर होता है और परिवार में सुख - शांति बनी रहती है....! 

पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है....! 

इस काल में गंगा स्नान, ब्राह्मण भोज और दान करना पुण्यदायी होता है....! 

पितरों की संतुष्टि से वंश में समृद्धि, संतान सुख और कुल की उन्नति संभव होती है.....!
 
इस लिए पितृ पक्ष को श्रद्धा और आस्था से मनाना अत्यंत आवश्यक है।

********

ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्र (भाग १) : 

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में २७  नक्षत्रों में ६  नक्षत्र गंड मूल नक्षत्रों की श्रेणी में माने गये हैं-

चंद्र मण्डल से एक लाख योजन ऊपर नक्षत्र मण्डल है।

अश्वनी,- श्लेषा,- मघा -,ज्येष्ठा,- मूल और रेवती।

उपरोक्त नक्षत्रों में उत्पन्न जातक – 

जातिका गंड मूलक कहलाते हैं....!

इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातक स्वयं व् कुटुम्बी जनों के लिये अशुभ माने गये हैं।

''जातो न जीवतिनरो मातुरपथ्यो भवेत्स्वकुलहन्ता ''

लेकिन पहले यह जानना परम आवश्यक है कि गंड मूल किसे कहते हैं....! 

गंड कहते हैं जहाँ एक राशि और नक्षत्र समाप्त हो रहे हो उसे गंड कहते हैं।

मूल कहते हैं –

जहाँ दूसरी राशि से नक्षत्र का आरम्भ हो उसे मूल कहते हैं।

राशि चक्र और नक्षत्र चक्र दोनों में इन ६ नक्षत्रो पर संधि होती है और संधि समय को जितना लाभकारी माना गया है....! 

उतना ही हानिकारक भी है...!

संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं....! 

इसी प्रकार गंड मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से दुष्परिणाम देने वाले होते हैं और राशि चक्र में यह स्थिति तीन बार आती है।

अब यह समझने का प्रयास करे कि कैसे इन ६ नक्षत्रो को गंड मूल कहा गया है।

१ - आश्लेषा नक्षत्र और कर्क राशि का एक साथ समाप्त होना और यही से मघा नक्षत्र और सिंह राशि का प्रारम्भ।

२ - ज्येष्ठा नक्षत्र और वृश्चिक राशि का समापन और यही से मूल नक्षत्र और धनु राशि का प्रारम्भ।

३ - रेवती नक्षत्र और मीन राशि का समापन और यही से अश्वनी नक्षत्र और मेष राशि का प्रारम्भ।

यहाँ तीन गंड नक्षत्र हैं....!  

आश्लेषा ,ज्येष्ठा ,रेवती।

और तीन मूल नक्षत्र हैं....! 

मघा, मूल और अश्वनी।

जिस प्रकार एक ऋतु का जब समापन होता है और दूसरी ऋतु का आगमन होता है....! 

तो उन दोनों ऋतुओं का मोड स्वास्थ्य के लिये उत्तम् नहीं माना गया है....! 

इसी प्रकार नक्षत्रों का स्थान परिवर्तन जीवन और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक माना गया है।

गण्डमूल / मूल  नक्षत्र  :

इस श्रेणी में ६ नक्षत्र आते है !

१. रेवती, २. अश्विनी, ३. आश्लेषा, ४. मघा, ५. ज्येष्ठा, ६. मूल  यह ६ नक्षत्र

मूल संज्ञक / गण्डमूल संज्ञक नक्षत्र होते है !

रेवती, आश्लेषा, ज्येष्ठा का स्वामी बुध है ! 

अश्विनी, मघा, मूल का स्वामी केतु है !

इन्हें २ श्रेणी में विभाजित किया गया है -

बड़े मूल व छोटे मूल। मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा बड़े मूल कहलाते है....! 

अश्वनी, रेवती व मघा छोटे मूल कहलाते है। 

बड़े मूलो में जन्मे बच्चे के लिए २७ दिन के बाद जब चन्द्रमा उसी नक्षत्र में जाये तो शांति करवानी चाहिए ऐसा पराशर का मत भी है....! 

तब तक बच्चे के पिता को बच्चे का मुह नहीं देखना चाहिए ! 

जबकि छोटे मूलो में जन्मे बच्चे की मूल शांति उस नक्षत्र स्वामी के दूसरे नक्षत्र में करायी जा सकती है....! 

अर्थात १० वे या १९ वे दिन में !

यदि जातक के जन्म के समय चंद्रमा इन नक्षत्रों में स्थित हो तो मूल दोष होता है ; 

इसकी शांति नितांत आवश्यक होती है !

जन्म समय में यदि यह नक्षत्र पड़े तो दोष होता है !

दोष मानने का कारण यह है की नक्षत्र चक्र और राशी चक्र दोनों में इन नक्षत्रों पर संधि होती है ( चित्र में यह बात स्पष्टता से देखि जा सकती है ) !

और संधि का समय हमेशा से विशेष होता है ! 

उदाहरण के लिए रात्रि से जब दिन का प्रारम्भ होता है तो उस समय को हम ब्रम्हमुहूर्त कहते है। 

और ठीक इसी तरह जब दिन से रात्रि होती है तो उस समय को हम गदा बेला / गोधूली
कहते है ! 

इन समयों पर भगवान का ध्यान करने के लिए कहा जाता है -

जिसका सीधा सा अर्थ है की इन समय पर सावधानी अपेक्षित होती है !

संधि का स्थान जितना लाभप्रद होता है उतना ही हानि कारक भी होता है !

संधि का समय अधिकतर शुभ कार्यों के लिए अशुभ ही माना जाता है !

गण्डमूल में जन्म का फल :

गण्डमूल के विभिन्न चरणों में दोष विभिन्न लोगो को लगता है....! 

साथ ही इसका फल हमेशा बुरा ही

हो ऐसा नहीं है  !

अश्विनी नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - पिता के लिए कष्टकारी

द्वितीय पद में - आराम तथा सुख केलिए उत्तम

तृतीय पद में - उच्च पद

चतुर्थ पद में - राज सम्मान

आश्लेषा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - यदि शांति करायीं जाये तो शुभ

द्वितीय पद में - संपत्ति के लिए अशुभ

तृतीय पद में - माता को हानि

चतुर्थ पद में - पिता को हानि

मघा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - माता को हानि

द्वितीय पद में - पिता को हानि

तृतीय पद में - उत्तम

चतुर्थ पद में - संपत्ति व शिक्षा के लिए उत्तम

ज्येष्ठा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - बड़े भाई के लिए अशुभ

द्वितीय पद में - छोटे भाई के लिए अशुभ

तृतीय पद में - माता के लिए अशुभ

चतुर्थ पद में - स्वयं के लिए अशुभ

मूल  नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - पिता के जीवन में परिवर्तन

द्वितीय पद में - माता के लिए अशुभ

तृतीय पद में - संपत्ति की हानि

चतुर्थ पद में - शांति कराई जाये तो शुभ फल

रेवती नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :

प्रथम पद में - राज सम्मान

द्वितीय पद में - मंत्री पद

तृतीय पद में - धन सुख

चतुर्थ पद में - स्वयं को कष्ट

अभुक्तमूल :

ज्येष्ठा की अंतिम एक घडी तथा मूल की प्रथम एक घटी अत्यंत हानिकर हैं....!

इन्हें ही अभुक्तमूल कहा जाता है, शास्त्रों के अनुसार पिता को बच्चे से ८ वर्ष तक दूर रहना चाहिए ! 

यदि यह संभव ना हो तो कम से कम ६ माह तो अलग ही रहना चाहिए ! 

मूल शांति के बाद ही बच्चे से मिलना चाहिए !

अभुक्तमूल पिता के लिए अत्यंत हानिकारक होता है !

यह तो था नक्षत्र गंडांत इसी आधार पर लग्न और तिथि गंडांत भी होता है।

लग्न गंडांत :- 

मीन - मेष, कर्क - सिंह, वृश्चिक - धनु लग्न की आधी - २ प्रारंभ व अंत की घडी कुल २४ मिनट लग्न गंडांत होता है !

तिथि गंडांत :- 

५, १०, १५  तिथियों के अंत व ६, ११, १ तिथियों के प्रारम्भ की २ - २ घड़ियाँ तिथि गंडांत है रहता है !

जन्म समय में यदि तीनों गंडांत एक साथ पड़ रहे है तो यह महा - अशुभ होता है।

नक्षत्र गंडांत अधिक अशुभ, लग्न गंडांत मध्यम अशुभ व तिथि गंडांत सामान्य अशुभ होता है....! 

जितने ज्यादा गंडांत दोष लगेंगे किसी कुंडली में उतना ही अधिक अशुभ फल कारक होंगे।

गण्ड का परिहार :

१.  गर्ग के मतानुसार

रविवार को अश्विनी में जन्म हो या सूर्यवार बुधवार को ज्येष्ठ, रेवती, अनुराधा, हस्त, चित्रा, स्वाति हो तो नक्षत्र जन्म दोष कम होता है !

२.  बादरायण के मतानुसार गण्ड नक्षत्र में चन्द्रमा यदि लग्नेश से कोई सम्बन्ध, विशेषतया दृष्टि सम्बन्ध न बनाता हो तो इस दोष में कमी होती है !

३. वशिष्ठ जी के अनुसार दिन में मूल का दूसरा चरण हो और रात में मूल का पहला चरण हो तो माता - पिता के लिए कष्ट होता है इसलिए शांति अवश्य कराये!

४. ब्रम्हा जी का वाक्य है की चन्द्रमा यदि बलवान हो तो नक्षत्र गण्डांत व गुरु बलि हो तो लग्न गण्डांत का दोष काफी कम लगता है !

५. वशिष्ठ के मतानुसार अभिजीत मुहूर्त में जन्म होने पर गण्डांतादी दोष प्रायः नष्ट हो जाते है ! 

लेकिन यह विचार सिर्फ विवाह लग्न में ही देखें, जन्म में नहीं !
 
निम्नलिखित विशेष परिस्थितियों में गण्ड या गण्डांत का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है ( लेकिन फिर भी शांति अनिवार्य है ) !

इन नक्षत्रों में जिनका जन्म हुआ हो तो उस नक्षत्र की शान्ति हेतु जप और हवन अवश्य कर लेनी चाहिए --

१ अश्वनी के लिये ५०००  मन्त्र जप।

२ आश्लेषा के लिये १०००० मन्त्र जप।

३ मघा के लिये १००००  मन्त्र जप।

४ ज्येष्ठा के लिये ५०००  मन्त्र जप।

५ मूल के लिये ५०००  मन्त्र जप।

६ रेवती के लिये५०००  मन्त्र जप।

इन नक्षत्रों की शान्ति हेतु ग्रह, स्व इष्ट, कुल देवताओं का पूजन ,रुद्राभिषेक तथा नक्षत्र तथा नक्षत्र के स्वामी का पूजन अर्चन करने के बाद दशांश हवन किसी सुयोग्य ब्राह्मण से अवश्य करवाए ।


         !!!!! शुभमस्तु !!!

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
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वैदिक ज्योतिष शास्त्र का पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र क्या है ?

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...