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जय द्वारकाधीश
।। ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 4।।
ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म - 4
श्राद्ध - तर्पण विषयक शंका - समाधान...!
|| श्राद्ध की परिभाषा ||
श्राद्ध की परिभाषा, शास्त्रीय प्रमाण, पितृयज्ञ का स्वरूप तथा श्राद्ध और तर्पण का धार्मिक महत्त्व ;
भारतीय सनातन धर्म में श्राद्ध और तर्पण को पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और धार्मिक कर्तव्य की अभिव्यक्ति माना गया है।
वेद, स्मृतियों, पुराणों तथा धर्मनिबन्ध ग्रन्थों में पितृयज्ञ, पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन मिलता है।
पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धासे किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं -
श्रद्धया पितॄन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्। श्रद्धासे ही श्राद्ध शब्दकी निष्पत्ति होती है-
श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्', श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम्',' श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छ्राद्धम्' तथा 'श्रद्धया इदं श्राद्धम् '।
अर्थात् अपने मृत पितृगण के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले कर्मविशेष को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है।
इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं, जिसका वर्णन मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों, पुराणों तथा वीरमित्रोदय, श्राद्धकल्पलता, श्राद्धतत्त्व, पितृदयिता आदि अनेक ग्रन्थोंमें प्राप्त होता है।
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इन कर्मों का उद्देश्य केवल किसी परम्परा का पालन करना नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों का स्मरण करना, उनके प्रति सम्मान प्रकट करना और धर्मशास्त्रों में बताए गए कर्तव्यों का यथाशक्ति पालन करना भी है।
इस लेख में श्राद्ध और तर्पण के विषय को शास्त्रीय आधार पर समझाया गया है।
इस में किसी काल्पनिक कथा को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
जहाँ किसी शास्त्र का सिद्धान्त बताया गया है, वहाँ उसके उपलब्ध ग्रन्थीय प्रमाण का उल्लेख किया गया है।
साथ ही, जहाँ किसी कथन का निश्चित मूल श्लोक या अध्याय प्रमाणित नहीं है, वहाँ उसे किसी ग्रन्थ के नाम से निश्चित रूप में उद्धृत करने से बचना आवश्यक है।
श्राद्ध की शास्त्रोक्त परिभाषा ;
श्राद्ध शब्द की व्युत्पत्ति सामान्यतः श्रद्धा से मानी जाती है।
पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक और विधिपूर्वक किया जाने वाला धार्मिक कर्म श्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध की प्रचलित परिभाषा इस प्रकार दी जाती है—
श्रद्धया पितॄन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्।
भावार्थ: पितरों को उद्देश्य बनाकर श्रद्धा के साथ विधिपूर्वक जो कर्म किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं।
इस परिभाषा का आशय श्राद्ध के मूल भाव को समझाना है।
इसे किसी विशिष्ट प्राचीन ग्रन्थ का अक्षरशः प्रमाणित श्लोक तभी कहना चाहिए, जब उसके मूल ग्रन्थ और सन्दर्भ की पुष्टि हो।
श्राद्ध में तीन बातें विशेष महत्त्व रखती हैं—
श्रद्धा: अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति आदर, स्मरण और कृतज्ञता।
पितृ-उद्देश्य: कर्म को पितरों के निमित्त समर्पित करना।
विधि: अपने कुल, परम्परा और धर्मशास्त्र के अनुसार उचित विधि से कर्म करना।
इस प्रकार श्राद्ध का आधार केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि श्रद्धा और धार्मिक कर्तव्य का समन्वय है।
श्राद्ध को पितृयज्ञ क्यों कहा गया है ?
सनातन धर्म में यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना ही नहीं है।
धर्मशास्त्रीय परम्परा में देवताओं, ऋषियों, पितरों, मनुष्यों और अन्य प्राणियों के प्रति कर्तव्य निभाने के विभिन्न रूप भी बताए गए हैं।
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में गृहस्थ के पंचमहायज्ञों का वर्णन प्राप्त होता है।
इन में पितरों के निमित्त किया जाने वाला कर्म पितृयज्ञ कहलाता है।
मनुस्मृति 3.70 में पंचमहायज्ञों का उल्लेख है—
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥
भावार्थ: अध्ययन-अध्यापन ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, भूतों के लिए बलि भूतयज्ञ है और अतिथि-सत्कार नृयज्ञ है।
यह श्लोक पितरों के प्रति तर्पण के महत्त्व को स्पष्ट करता है।
इस से यह भी समझ आता है कि गृहस्थ जीवन में पितरों का स्मरण और उनके निमित्त कर्म करना धर्मशास्त्रीय कर्तव्य-व्यवस्था का अंग है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि पितृयज्ञ और श्राद्ध परस्पर सम्बन्धित हैं, किन्तु दोनों शब्दों का प्रयोग हर प्रसंग में बिल्कुल एक ही विधि के लिए हो, ऐसा मानना उचित नहीं।
पितृयज्ञ व्यापक कर्तव्य का बोध कराता है, जबकि श्राद्ध पितरों के निमित्त किए जाने वाले विशिष्ट धार्मिक कर्मों के लिए प्रयुक्त होता है।
श्राद्ध और तर्पण में क्या अन्तर है ?
श्राद्ध और तर्पण दोनों पितरों के निमित्त किए जाने वाले धार्मिक कर्म हैं, लेकिन इनका स्वरूप और विधि अलग - अलग हो सकती है।
तर्पण का सामान्य अर्थ तृप्ति के उद्देश्य से जल अर्पित करना है।
पितृकर्म में जल के साथ तिल आदि का प्रयोग भी निर्धारित विधि के अनुसार किया जाता है।
तर्पण में पितरों का स्मरण करके उनके निमित्त जल समर्पित किया जाता है।
श्राद्ध अपेक्षाकृत व्यापक कर्म है।
इस में परम्परा और विधि के अनुसार पितरों का आवाहन, संकल्प, पिण्डदान, अन्नदान, ब्राह्मण - सत्कार, दक्षिणा तथा अन्य निर्धारित क्रियाएँ सम्मिलित हो सकती हैं।
प्रत्येक श्राद्ध में इन सभी क्रियाओं का एक जैसा विधान हो, यह आवश्यक नहीं है।
मनुस्मृति 3.70 में तर्पण को स्पष्ट रूप से पितृयज्ञ कहा गया है।
इस लिए यह कहना उचित है कि तर्पण पितृयज्ञ का एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जबकि श्राद्ध पितरों के निमित्त किए जाने वाले विधिपूर्वक धार्मिक कर्मों का व्यापक स्वरूप है।
महर्षि पराशर के अनुसार 'देश, काल तथा पात्र में हविष्यादि विधिद्वारा जो कर्म तिल ( यव ) और दर्भ ( कुश ) तथा मन्त्रों से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाय, वही श्राद्ध है।
देशे काले च पात्रे च विधिना हविषा च यत्।
तिलैर्दर्भेश्च मन्त्रैश्च श्राद्धं स्याच्छूद्धया युतम् ।।
महर्षि बृहस्पति तथा श्राद्धतत्त्वमें वर्णित महर्षि पुलस्त्य के वचनके अनुसार- 'जिस कर्मविशेष में दुग्ध, घृत और मधु से युक्त सुसंस्कृत ( अच्छी प्रकारसे पकाये हुए ) उत्तम व्यंजन को श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्य से ब्राह्मणादि को प्रदान किया जाय, उसे श्राद्ध कहते हैं ।
संस्कृतं व्यञ्जनाद्यं च पयोमधुघृतान्वितम् ।
श्रद्धया दीयते यस्माच्छ्राद्धं तेन निगद्यते ॥
इसी प्रकार ब्रह्मपुराण में भी श्राद्ध का लक्षण लिखा है-
'देश, काल और पात्र में विधिपूर्वक श्रद्धा से पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मण को दिया जाय,उसे श्राद्ध कहते हैं।'
देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्।
पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ॥
श्राद्धकर्ता का भी कल्याण जो प्राणी विधिपूर्वक शान्तमन होकर श्राद्ध करता है...!
वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है तथा फिर संसार - चक्र में नहीं आता।
योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्याद् वै शान्तमानसः ।
व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः॥
प्रश्न 1 : क्या यह सत्य है कि श्री राम और माता सीता ने श्राद्ध पूजा की थी ?
उत्तर : हाँ गरुड़ पुराण प्रेत खण्ड 10.31.51 में यह कहा गया है : -
"हे गरुड़जी !
मैं आपको बताऊँगा कि कैसे एक बार सीता ने एक ब्राह्मण के शरीर में पूर्वजों, उसके ससुर, दादा को देखा ।
और परदादा - ससुर को ।
पिता के कहने पर राम वन चले गए ।
जब वे पवित्र केंद्र पुष्कर पहुँचे, तो उन्होंने अपनी पत्नी सीता के साथ पेड़ों से एकत्रित पके फल सीता के साथ श्राद्ध किया ।
जब सूर्य आकाश के बीच में पहुँचा तो राम द्वारा आमंत्रित ऋषियों ने स्वयं को प्रस्तुत किया ।
जब सीता ने ऋषियों को देखा तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई ।
राम के निर्देश पर उन्होंने उन्हें भोजन कराया ।
फिर अचानक वह ब्राह्मणों के बीच से दूर हो गई ।
स्वयं को झाड़ियों के पीछे ढँककर वह छिप गई ।
तब यह जानकर कि सीता अकेली चली गई हैं, राम चिंतित थे और विचार में खो गए थे ।
उन्हों ने सोचा कि वह ब्राह्मणों को भोजन दिए बिना इतनी जल्दी क्यों चली गई ।
उन्होंने मन ही मन सोचा "शायद उन्हें लज्जा आ रही थी, मैं उन्हें ढूँढ़ लूँगा" ।
ऐसा सोचकर उन्होंने स्वयं ब्राह्मणों को भोजन दिया ।
जब ब्राह्मण चले गए तो सीता लौट आईं ।
तब श्री राम ने उनसे कहा :-
“जब ऋषि यहाँ वन में आए तो आप क्यों चले गयीं ।
मुझे आपके अचानक चले जाने का कारण बताएं" तब माता सीता अपना चेहरा नीचे करके खड़ी हो गई ।
उनकी आँखों से बहते आँसुओं के साथ उन्होंने अपने ईश्वर से इस प्रकार बात की ।
"भगवान सुनो, मैंने यहाँ एक चमत्कार देखा ।
मैंने तुम्हारे पिता को शाही पोशाक पहने ब्राह्मणों के सामने देखा ।
मैंने दो बुज़ुर्गों को एक जैसे वेश में देखा ।
तुम्हारे पिता को देखकर मैं उनके सामने से हट गई ।
छाल और खाल पहने हुए, मैं उन्हें भोजन के साथ कैसे परोस सकता थी ?
मैं कैसे उन्हें घास के पात्र में भोजन दे सकता थी, जिसमें दास भी नहीं खाते थे ?
मैं पसीने और गंदगी से भरा हुई, उनके सामने कैसे जा सकती थी कि उन्होंने मुझे पहले कभी उस दयनीय स्थिति में नहीं देखा था ?
मुझे लज्जा आ रही थी और मैं उनकी उपस्थिति से दूर हो गई ।
हे स्वामी !
इस प्रकार हे गरुड़ !
मैंने आपको बताया है कि सीता ने पूर्वजों को कैसे देखा ।
प्रश्न 2 : क्या श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्राद्ध ( पिंड ) पूजा की थी ?
उत्तर : हाँ श्री चैतन्य महाप्रभु जो श्री राधा और कृष्ण के अवतार हैं...!
ने श्राद्ध पूजा की थी और इसकी पुष्टि चैतन्य चरितामृत आदि लीला अध्याय 17 श्लोक 8 में की गई है ।
"इसके बाद भगवान गया गए, वहाँ उनका साक्षात्कार श्रील ईश्वर पुरी से हुआ" ।
श्रील प्रभुपाद द्वारा अभिप्राय "श्री चैतन्य महाप्रभु अपने पूर्वजों को सम्मान जनक आहुति देने के लिए गया गए थे ।
इस प्रक्रिया को पिण्डदान कहते हैं ।
वैदिक समाज में किसी के संबंधी, विशेष रूप से किसी के पिता या माता की मृत्यु के बाद, व्यक्ति को गया जाना चाहिए ।
और वहाँ श्री विष्णु के चरण कमलों को प्रसाद अर्पण करना चाहिए ।
इस लिए सैकड़ों और हजारों पुरुष प्रतिदिन इस तरह के प्रसाद, या श्राद्ध के लिए गया में इकट्ठा होते हैं ।
इस सिद्धांत का पालन करते हुए, भगवान चैतन्य महाप्रभु भी अपने मृत पिता को पिंड देने के लिए वहाँ गए ।
सौभाग्य से वह वहाँ ईश्वर पुरी से मिले ।
प्रश्न 3 : क्या हमें भगवान सूर्य ( सूर्य ) को अपना दैनिक जल ( जल ) चढ़ाने की अनुमति है ?
उत्तर : हाँ
प्रश्न 4 : क्या इस समय में कोई अपना जन्मदिन मना सकता है ?
उत्तर : हाँ यह ठीक है ।
निश्चित रूप से रूढ़िवादी वृद्ध लोगों के साथ यह ठीक नहीं होगा...!
परन्तु एक छोटे बच्चे को समझाने की कोशिश करें कि "बेटे क्षमा करें मैं आपका जन्मदिन नहीं मना सकता क्योंकि यह पितृ पक्ष है"।
यह बालक बड़ा होकर पितृ पक्ष से घृणा करेगा ।
हमें समय के साथ आगे बढ़ना है ।
प्रश्न 5 : हम कितने निश्चित हैं कि हम जो भोजन करते हैं वह हमारे पूर्वजों को जाता है ?
उत्तर : गरुड़ पुराण प्रेत खण्ड 19. 26-27 में श्री गरुड़ जी पूछते हैं :-
"हे श्री विष्णु !
घर में सम्बन्धियों द्वारा मृतक के पक्ष में चीजें उपहार में दी जाती हैं ।
वे मृतक तक कैसे पहुँचती हैं और उन्हें कौन प्राप्त करता है" ?
श्री विष्णु ने उत्तर दिया "हे गरुड़ !
वरुण देव ( समुद्रों के प्रभारी देव ) उन उपहारों को प्राप्त करते हैं और उन्हें मुझे सौंप देते हैं ।
मैं उन्हें सूर्यदेव को देती हूँ, और सूर्यदेव से मृत व्यक्ति उन्हें प्राप्त करता है" ।
इस लिए उपरोक्त श्लोक से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि आप जो कुछ भी अपनी ओर से देते हैं या जो भोजन आप अपने पूर्वजों को देते हैं...!
वह भोजन / उपहार उस आत्मा को जाता है, चाहे वह किसी भी रूप में हो ।
प्रश्न : मेरे मन में सदा ये संशय रहता है की मनुष्यों द्वारा पितरों का जो तर्पण किया जाता है...?
उसमें जल तो जल में ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उस से तृप्त कैसे होते हैं ?
इसी प्रकार पिंड आदि का सब दान भी यहीं देखा जाता है।
अतः हम यह कैसे कह सकते हैं की यह पितर आदि के उपभोग में आता है ?
उत्तर : पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है की वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं...!
दूर की पूजा भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं...!
इस के सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुचते हैं...!
पांच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति – इन नौ तत्वों का बना हुआ उनका शरीर होता है...!
इस के भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं...!
इस लिए देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं।
शब्द तत्व से रहते हैं तथा स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं और किसी को पवित्र देख कर उनके मन में बड़ा संतोष होता है...!
जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है....!
वैसे ही देवयोनियों का भोजन अन्न का सार तत्व है सम्पूर्ण देवताओं की शक्तियां अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं।
अतः वे अन्न और जल का सार तत्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है।
प्रश्न : श्राद्ध का अन्न तो पितरों को दिया जाता है, परन्तु वे अपने कर्म के अधीन होते हैं...?
यदि वे स्वर्ग अथवा नर्क में हों, तो श्राद्ध का उपभोग कैसे कर सकते हैं ?
और वैसी दशा में वरदान देने में भी कैसे समर्थ हो सकते हैं ?
उत्तर : यह सत्य है की पितर अपने अपने कर्मों के अधीन होते हैं...!
परन्तु देवता, असुर और यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चार वर्णों के चार मूर्त – ये सात प्रकार के पितर माने गए हैं...!
ये नित्य पितर हैं, ये कर्मों के अधीन नहीं, ये सबको सब कुछ देने में समर्थ हैं।
वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं उनके अधीन अत्यंत प्रबल इकतीस गण होते हैं।
इस लोक में किया हुआ श्राद्ध उन्ही मानव पितरों को तृप्त करता है।
वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पूर्वजों को जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो...!
जाकर तृप्त करते हैं।
इस प्रकार अपने पितरों के पास श्राद्ध में दी हुई वस्तु पहुचती है...!
और वे श्राद्ध ग्रहण करने वाले नित्य पितर ही श्राद्ध कर्ताओं को श्रेष्ठ वरदान देते हैं।
प्रश्न : जैसे भूत आदि को उन्हीं के नाम से ‘इदं भूतादिभ्यः” कह कर कोई वस्तु दी जाती है....?
उसी प्रकार देवता आदि को संक्षेप में क्यों नहीं दिया जाता है ?
मंत्र आदि के प्रयोग द्वारा विस्तार क्यों किया जाता है ?
उत्तर : सदा सबके लिए उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिए...!
उचित प्रतिष्ठा के बिना दी हुई कोई वास्तु देवता आदि ग्रहण नहीं करते घर के दरवाजे पर बैठा हुआ कुत्ता, जिस प्रकार ग्रास ( फेंका हुआ टुकड़ा ) ग्रहण करता है...!
क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है ?
इसी प्रकार भूत आदि की भाँती देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते वे पवित्र भोगों का सेवन करने वाले तथा निर्मल हैं...!
अतः अश्रद्धालु पुरुष के द्वारा बिना मन्त्र के दिया हुआ जो कोई भी हव्य भाग होता है...!
उसे वे स्वीकार नहीं करते यहाँ मन्त्रों के विषय में श्रुति भी इस प्रकार कहती है -
” सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान पुरुष जो जो कार्य मन्त्र के साथ करता है...!
उसे वह देवताओं के द्वारा ही संपन्न करता है।
मंत्रोच्चारणपूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओं द्वारा ही देता है।
मन्त्रपूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओं द्वारा ही ग्रहण करता है...!
इस लिए मंत्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे बिना मन्त्र के जो कुछ किया जाता है...!
वह प्रतिष्ठित नहीं होता “इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रों द्वारा ही सदा दान करना चाहिए।
प्रश्न : कुश, तिल, अक्षत और जल – इन सब को हाथ में लेकर क्यों दान दिया जाता है?
मैं इस कारण को जानना चाहता हूँ।
उत्तर : प्राचीन काल में मनुष्यों ने बहुत से दान किये, और उन सबको असुरों ने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया।
तब देवताओं और पितरों ने ब्रह्मा जी से कहा – स्वामिन !
हमारे देखते देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं।
अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायेंगे।”
तब ब्रह्मा जी ने सोच विचार कर दान की रक्षा के लिए एक उपाय निकल।
पितरों को तिल के रूप में दान दिया जाए, देवताओं को अक्षत के साथ दिया जाए तथा जल और कुश का सम्बन्ध सर्वत्र रहे।
ऐसा करने पर दैत्य उस दान को ग्रहण नहीं कर सकते।
इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उस पर दैत्य लोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं और देवता तथा पितर दुखपूर्वक उच्ह्वास लेते हुए लौट जाते हैं।
भगवद्गीता में पितरों के प्रति श्रद्धा का उल्लेख ;
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण विभिन्न उपासनाओं और उनके उद्देश्यों का वर्णन करते हैं।
गीता 9.25 का मूल श्लोक है—
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥ ९.२५॥
भावार्थ: देवताओं की उपासना में लगे लोग देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों के निमित्त व्रत और उपासना करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों की उपासना करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और भगवान की उपासना करने वाले भगवान को प्राप्त होते हैं।
यह श्लोक पितृ-उपासना के धार्मिक स्थान को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
श्रीमद्भगवद्गीता में पितरों के प्रति समर्पित उपासना का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
हालाँकि, इस श्लोक को श्राद्ध की प्रत्येक विधि, तिथि या सामग्री का निर्देश समझना उचित नहीं होगा।
श्राद्ध के विस्तृत विधि - विधान के लिए धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और श्राद्धविषयक निबन्ध ग्रन्थों का अध्ययन आवश्यक है।
श्राद्ध में श्रद्धा का वास्तविक महत्त्व ;
श्राद्ध शब्द में श्रद्धा का भाव प्रधान है।
इस का अर्थ यह नहीं कि केवल मन में श्रद्धा रखकर प्रत्येक निर्धारित धार्मिक विधि को अनावश्यक मान लिया जाए।
इसका आशय यह है कि कर्म करते समय श्रद्धा, आदर और कर्तव्यबोध बना रहे।
पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के कई रूप हैं—
दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों का स्मरण करना।
उनके निमित्त धर्मशास्त्रसम्मत श्राद्ध और तर्पण करना।
अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र अथवा अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना।
परिवार की धार्मिक परम्पराओं का सम्मान करना।
पूर्वजों से प्राप्त सदाचार, ज्ञान और संस्कारों को आगे बढ़ाना।
इनमें से धार्मिक कर्मों का स्वरूप व्यक्ति के कुलाचार, परम्परा और शास्त्रीय विधि के अनुसार निर्धारित होता है।
श्राद्ध को केवल किसी विशेष दिन भोजन कराने या दान देने तक सीमित कर देना उसके व्यापक धार्मिक भाव को संकुचित करना होगा।
दूसरी ओर, दान या किसी अन्य कर्म को श्राद्ध का पूर्ण विकल्प घोषित करने के लिए भी विशिष्ट शास्त्रीय प्रमाण आवश्यक है।
वैसे दान से दाता को कोई फल नहीं मिलता।
इस लिए सभी युगों में इसी प्रकार ( तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ ) दान दिया जाता है।
अगर श्राद्ध करनेके लिये किसीके पास में कुछ भी न हो तो वह क्या करे ?
अगर किसी के पास श्राद्ध करने के लिए धन न हो, तो उसे अपनी क्षमतानुसार कुछ भी दान करना चाहिए, जैसे दूध, फल या सब्जियां।
अगर यह भी संभव न हो, तो आप कुशा ( एक प्रकार की घास ) का पिंड बनाकर गाय को खिला सकते हैं या नदी किनारे से मिट्टी का पिंड बना कर दान कर सकते हैं।
यदि ये भी संभव न हो तो अपने हाथ उठाकर पितरों से संतुष्ट होने की प्रार्थना करें।
अगर किसी के पास में कुछ भी न हो, घर में खाने के लिये अन्न भी न हो तो पितरों के नाम से गाय को हरी - हरी घास देनी चाहिये।
इससे भी पितरों की तृप्ति होती है।
अगर घास भी देने की शक्ति न हो तो दोनों हाथ ऊपर उठाकर....!
अपनी काँखें दिखाकर प्रार्थना करे कि 'मैं भूखा हूँ, मेरे पास खाने के लिये भी कुछ नहीं है...!
मुझे क्षमा करें' ऐसा कहकर दण्डवत् प्रणाम करे तो इससे भी पितरों की तृप्ति होती है।
आज आश्विन मास कृष्ण पक्ष वर्षा ऋतू षष्ठी मंगलवार भरणी /कृत्तिका नक्षत्र है :
आज षष्ठी की श्राद्ध होगी
आज स्वर्ग की भद्रा रात्रि ८\१५ के बाद...!
सर्वार्थ सिद्ध योग दिन में ६ \ ३३ के बाद रवि योग दिन दिन में ६ \ ३३ के बाद तीन गुना शुभ अशुभ त्रिपुष्कर योग रात्रि ८\४५ के बाद कल सप्तमी की श्राद्ध होगी...!
इसी प्रकार श्राद्ध की जानकारी प्रति दिन दे दी जायेगी
गृहो ंका राशि में संचरण
सूर्य / सिंह
चंद्र / मेष
वृष में दिन में १\ ७ पर
मंगल / मेष
बुध / कन्या
गुरु / धनु
# शुक्र / कर्क
शनि मकर
#राहु मिथुन
# केतु / धनु
# नोट # चिन्ह वक्री की पहचान है
चरण शरण में आय के, धरूं तिहारा ध्यान
संकट से रक्षा करो
संकट से रक्षा करो, पवनपुत्र हनुमान
दुर्गम काज बनाय के, कीन्हें भक्त निहाल
अब मोरी विनती सुनो
अब मोरी विनती सुनो, हे अंजनि के लाल
हाथ जोड़ विनती करूं, सुनो वीर हनुमान
कष्टों से रक्षा करो
कष्टों से रक्षा करो, राम भक्ति देहुँ दान पवनपुत्र हनुमान। ॐ हनुमते नमः।
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पितृपक्ष और श्राद्ध का सम्बन्ध ;
हिन्दू परम्परा में भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक की अवधि को अनेक पंचांगों में पितृपक्ष अथवा महालय पक्ष के रूप में माना जाता है।
क्षेत्रीय पंचांगों और परम्पराओं के अनुसार इसके आरम्भ तथा अनुष्ठानों में कुछ भिन्नताएँ हो सकती हैं।
इस अवधि में दिवंगत माता-पिता, पितामह-पितामही तथा अन्य पितरों के निमित्त तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परम्परा है।
श्राद्ध की तिथि निर्धारित करते समय सामान्यतः निम्न बातों पर ध्यान दिया जाता है—
दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु के समय से सम्बन्धित तिथि।
उस तिथि के लिए स्थानीय पंचांग में निर्धारित श्राद्ध - विधान।
परिवार का कुलाचार और परम्परा।
विशेष परिस्थितियों में धर्मशास्त्र और कर्मकाण्ड के जानकार विद्वान का मार्गदर्शन।
सभी पितरों का श्राद्ध किसी भी दिन समान विधि से किया जा सकता है, ऐसा सामान्यीकरण नहीं करना चाहिए।
वार्षिक श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, एकोद्दिष्ट श्राद्ध और महालय श्राद्ध जैसे कर्मों के अलग - अलग प्रसंग और विधान हैं।
अतः केवल सामान्य तिथि - सूची के आधार पर सभी परिस्थितियों में एक ही नियम लागू करना उचित नहीं है।
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पिण्डदान का धार्मिक महत्त्व ;
पिण्डदान श्राद्धकर्म की प्रसिद्ध विधियों में से एक है।
इस में निर्धारित सामग्री से पिण्ड बनाकर विधिपूर्वक पितरों के निमित्त अर्पित किए जाते हैं।
पिण्डदान का विस्तृत वर्णन विभिन्न धर्मशास्त्रीय और पुराणिक परम्पराओं में मिलता है।
अलग - अलग श्राद्धों में पिण्डों की संख्या, सामग्री, समर्पण-विधि तथा सम्बन्धित मन्त्र भिन्न हो सकते हैं।
पिण्डदान का धार्मिक अर्थ पितरों के प्रति समर्पण और उनके निमित्त निर्धारित कर्म का निर्वाह है।
इसे करते समय शास्त्रसम्मत विधि और कुलाचार का पालन करना महत्त्वपूर्ण माना गया है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पिण्डदान से सम्बन्धित प्रत्येक प्रचलित मान्यता को सभी ग्रन्थों में समान रूप से वर्णित मानना ठीक नहीं। किसी विशेष विधान का प्रमाण देते समय सम्बन्धित ग्रन्थ, अध्याय और श्लोक का उल्लेख करना चाहिए।
क्या केवल जल देने से श्राद्ध पूरा हो जाता है ?
यह श्राद्ध–तर्पण से सम्बन्धित एक सामान्य शंका है।
इसका उत्तर श्राद्ध के प्रकार और परिस्थिति पर निर्भर करता है।
मनुस्मृति 3.70 में तर्पण को पितृयज्ञ कहा गया है।
इससे तर्पण की धार्मिक मान्यता सिद्ध होती है, लेकिन इस एक श्लोक से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रत्येक प्रकार के श्राद्ध में केवल जल अर्पित करना ही पूर्ण विधि है।
इसी प्रकार, यह कहना भी उचित नहीं कि हर परिस्थिति में एक ही विस्तृत कर्मकाण्ड अनिवार्य है।
धर्मशास्त्रों में अलग - अलग प्रसंगों और परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न विधियों का विधान मिलता है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति वार्षिक श्राद्ध, महालय श्राद्ध या किसी विशेष पितृकर्म के विषय में जानना चाहता है, तो उसे उसी कर्म का प्रामाणिक विधान देखना चाहिए।
शास्त्रीय सिद्धान्त यह है कि किसी एक कर्म के विधान को बिना प्रमाण सभी प्रकार के श्राद्ध पर लागू नहीं करना चाहिए।
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क्या श्राद्ध न करने से पितरों का कोप होता है ?
इस प्रश्न का उत्तर देते समय शास्त्रीय विधान और लोकमान्यता में अन्तर समझना आवश्यक है।
धर्मशास्त्रों में पितृयज्ञ और श्राद्ध को महत्त्व दिया गया है।
इन कर्तव्यों के पालन के लिए प्रेरणा भी दी गई है।
किन्तु इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि परिवार में होने वाला प्रत्येक रोग, आर्थिक कठिनाई, दुर्घटना या अन्य दुःख श्राद्ध न करने के कारण ही उत्पन्न हुआ है।
इसी प्रकार, किसी व्यक्ति को भयभीत करके यह कहना कि उसके पितर उसका रक्त पी रहे हैं या प्रत्येक विपत्ति का कारण वही हैं, तब तक शास्त्र का निश्चित प्रमाणित सिद्धान्त नहीं कहा जाना चाहिए, जब तक सम्बन्धित मूल ग्रन्थ, अध्याय और श्लोक की पुष्टि न हो।
धर्मग्रन्थों में किसी विशेष कर्म के महात्म्य का वर्णन और किसी घटना का निश्चित कारण बताना दो अलग बातें हैं।
श्राद्ध का पालन श्रद्धा और कर्तव्यबोध से करना चाहिए, भय फैलाने अथवा प्रत्येक कठिनाई को पितृदोष मान लेने के आधार पर नहीं।
ज्योतिष में श्राद्ध का महात्म्य और पितृदोष की शंका ;
ज्योतिषीय परम्पराओं में पितृदोष शब्द का प्रयोग जन्मकुण्डली के कुछ ग्रहयोगों, पारिवारिक परिस्थितियों या पितृसम्बन्धी धार्मिक मान्यताओं के सन्दर्भ में किया जाता है।
अलग - अलग ज्योतिषीय ग्रन्थों और परम्पराओं में इसकी व्याख्या भिन्न हो सकती है।
इस विषय में तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए—
पहली बात:
पितृदोष के नाम पर बताए जाने वाले सभी ग्रहयोगों को एक ही प्राचीन शास्त्रीय नियम मानना उचित नहीं।
किसी योग को प्रमाणित करने के लिए सम्बन्धित ज्योतिषग्रन्थ और उसका मूल सन्दर्भ देना चाहिए।
दूसरी बात:
किसी व्यक्ति की कठिनाइयों का कारण केवल पितृदोष घोषित करना उचित नहीं।
जन्मकुण्डली की व्याख्या ज्योतिषीय परम्परा का विषय है; इसे वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कारण - निर्धारण के समान नहीं समझना चाहिए।
तीसरी बात:
श्राद्ध और तर्पण का धार्मिक महत्त्व समझने के लिए किसी भयावह भविष्यवाणी की आवश्यकता नहीं है।
मनुस्मृति में पितृयज्ञ का उल्लेख और भगवद्गीता में पितृव्रतों का वर्णन अपने आप में इन धार्मिक परम्पराओं के अध्ययन के लिए प्रामाणिक आधार प्रदान करते हैं।
अतः श्राद्ध को केवल ग्रहदोष दूर करने का उपाय बताने के बजाय पितृसम्मान, धार्मिक कर्तव्य और श्रद्धा के व्यापक सन्दर्भ में समझना अधिक उचित है।
श्राद्ध करने में असमर्थ व्यक्ति क्या करे ?
हर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य, निवास और पारिवारिक परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं होतीं।
इस लिए यदि किसी व्यक्ति को विधिपूर्वक श्राद्ध करने में कठिनाई हो, तो उसे बिना प्रमाण भयभीत नहीं करना चाहिए।
ऐसी स्थिति में अपने कुलाचार के जानकार विद्वान से यह पूछना उचित है कि उसकी परिस्थिति में कौन - सा विधान उपलब्ध है।
धर्मशास्त्रीय परम्पराओं में विभिन्न कर्मों के लिए अलग - अलग परिस्थितियों और पात्रताओं का विचार किया जाता है।
जहाँ दान का विधान हो, वहाँ अपनी क्षमता के अनुसार दान करना चाहिए।
धार्मिक कर्म के नाम पर ऋण लेना, अपनी आवश्यकताओं को संकट में डालना या किसी के दबाव में अनावश्यक खर्च करना श्राद्ध के मूल भाव को समझने का उचित तरीका नहीं है।
यहाँ भी किसी विशिष्ट विकल्प को सभी श्राद्धों के लिए समान रूप से मान्य घोषित करने से पहले शास्त्रीय प्रमाण देखना आवश्यक है।
श्राद्ध से सम्बन्धित प्रमुख शास्त्रीय ग्रन्थ ;
श्राद्ध और पितृयज्ञ के अध्ययन में निम्नलिखित ग्रन्थ उपयोगी हैं—
मनुस्मृति: तृतीय अध्याय में गृहस्थ के कर्तव्यों और पंचमहायज्ञों का वर्णन है।
विशेष रूप से 3.70 में पितृयज्ञ को तर्पण कहा गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 9, श्लोक 25 में पितृव्रतों का उल्लेख है।
धर्मशास्त्रीय श्राद्ध-निबन्ध: वीरमित्रोदय, श्राद्धकल्पलता, श्राद्धतत्त्व और पितृदयिता जैसे ग्रन्थ श्राद्धविधि तथा उससे सम्बन्धित धर्मशास्त्रीय विचारों के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
इन के विशिष्ट नियम उद्धृत करते समय प्रामाणिक संस्करण और मूल पाठ की पुष्टि आवश्यक है।
पुराण: विभिन्न पुराणों में पितरों, श्राद्ध, तर्पण और दान से सम्बन्धित प्रसंग मिलते हैं।
किसी विशिष्ट फल या निषेध का उल्लेख करते समय पुराण का नाम, अध्याय और श्लोक देना चाहिए।
किसी भी धार्मिक लेख में केवल ग्रन्थ का नाम लिख देना पर्याप्त प्रमाण नहीं है।
मूल श्लोक, उसका सही पाठ और सन्दर्भ प्रस्तुत करने से पाठक स्वयं भी उसकी जाँच कर सकता है।
श्राद्ध सनातन धर्म की पितृसम्बन्धी धार्मिक परम्परा का महत्त्वपूर्ण अंग है।
इस का आधार श्रद्धा, पितरों के प्रति कृतज्ञता और विधिपूर्वक धार्मिक कर्तव्य का पालन है।
मनुस्मृति 3.70 में तर्पण को पितृयज्ञ कहा गया है, जबकि श्रीमद्भगवद्गीता 9.25 में पितृव्रतों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
ये दोनों प्रमाण पितरों के निमित्त किए जाने वाले धार्मिक कर्मों के अध्ययन में उपयोगी हैं।
श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान के विधान को समझते समय उनके अलग - अलग स्वरूपों, तिथियों और परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए।
किसी अप्रमाणित कथन को शास्त्रवचन बताना, हर दुःख को पितृकोप मानना अथवा भय के आधार पर धार्मिक कर्म करवाना उचित नहीं है।
श्रद्धा के साथ, शास्त्रीय प्रमाण को समझकर और अपनी सामर्थ्य के अनुसार पितृकर्म का पालन करना ही इस विषय का संतुलित धार्मिक दृष्टिकोण है।
हर हर महादेव हर...!! जय माताजी 🙏🌹 क्रमशः...
जय जय श्री राम राम राम..!!!
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बहुत सुंदर 🙏🙏🙏
ReplyDeleteSuperb
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